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फिर फिर वही गलतियां

अब फिर से गलती पर गलती होने लगी है। माना कि वादे किए हैं उनके अधिकारियों ने कि इस साल के अंत तक कम से कम सत्तर प्रतिशत भारतीयों के लिए टीके खरीदे जाएंगे, लेकिन यह नहीं बताया है उन्होंने कि ऐसा होगा कैसे, जब देहातों में इनको लगाने के लिए कोई व्यवस्था है ही नहीं।

पीएम मोदी ने देश को संबोधित किया। (स्रोत-पीएमओ ट्विटर)।

महामारी की दूसरी लहर गई नहीं है, लेकिन अभी से मोदी के भक्तों ने सोशल मीडिया पर उनको श्रेय देना शुरू कर दिया है कोरोना को हराने का। पिछले सप्ताह प्रधानमंत्री ने राष्ट्र को संबोधित करते हुए कहा कि केंद्र सरकार टीकों की खरीदारी की जिम्मेदारी वापस ले रही है अपने हाथों में। अपनी सरकार की एक बहुत बड़ी गलती को सुधारा ऐसा करके, लेकिन इस गलती को स्वीकारा नहीं। उल्टा इस गलती का दोष थोप दिया राज्य सरकारों पर यह कहते हुए कि कई मुख्यमंत्रियों ने पहले तो उनको चिट्ठियां लिख कर टीकों को बाजार से खरीदने का अधिकार मांगा था, सो उन्होंने दे दिया, लेकिन अब वही मुख्यमंत्री कहते हैं कि टीकों की खरीदारी सिर्फ भारत सरकार कर सकती है, सो नीति बदली जाएगी अगले हफ्ते से। प्रधानमंत्री ने इस बात को ऐसे कहा जैसे वे देश पर ऐसा करके उपकार कर रहे हैं। लेकिन सच कुछ और है।

राज्य सरकारें जब टीकों के अभाव के कारण बिल्कुल बेबस हो गई थीं, तब लगाई थी मुख्यमंत्रियों ने गुहार और केंद्र सरकार ने फौरान उनको इजाजत दे दी ताकि उसकी अपनी लापरवाही और नाकामी छिप जाए। सच तो यह है कि टीके खरीदने की जरूरत प्रधानमंत्री ने बहुत देर से महसूस की थी, इसलिए आज तक इनका सख्त अभाव है देश भर में। सच यह भी है कि प्रधानमंत्री ने अपने जिन अधिकारियों को टीकाकरण की नीति सौंपी थी, उन्होंने गलती पर गलती की थी, सो जब दूसरी लहर आई कोरोना की तो उनकी नाकामी दुनिया से छिपी नहीं सकी और पहली बार नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता कम होती दिखी और सवाल उठने लगे पहली बार उनकी काबिलियत पर। पहली बार लोगों को दिखने लगा कि हमारे छप्पन इंच की छाती वाले प्रधानमंत्री से भी गलतियां हो सकती हैं। तब तक कोरोना को हराने का श्रेय उन्होंने बड़े गर्व से लिया था।

अब फिर से गलती पर गलती होने लगी है। माना कि वादे किए हैं उनके अधिकारियों ने कि इस साल के अंत तक कम से कम सत्तर प्रतिशत भारतीयों के लिए टीके खरीदे जाएंगे, लेकिन यह नहीं बताया है उन्होंने कि ऐसा होगा कैसे, जब देहातों में इनको लगाने के लिए कोई व्यवस्था है ही नहीं। जिन गांवों में स्वास्थ्य केंद्र हैं वहां न डॉक्टर हैं, न नर्स और न ही कोई स्वास्थ्यकर्मी, जिनको प्रशिक्षित किया गया है अभी तक टीकाकरण के लिए।

सबसे बुरा हाल है उत्तर प्रदेश और बिहार में, लेकिन अच्छा हाल कहीं पर नहीं है। केंद्र सरकार को अभी से राज्य सरकारों की सहायता करनी चाहिए टीकाकरण की व्यवस्था देहातों में युद्ध स्तर पर करने के लिए। प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में इस तरफ इशारा तक नहीं किया। उनका अधिकतर भाषण अपनी पीठ थपथपाने में जाया हुआ, सो अब उनके भक्त और भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता लग गए हैं इस झूठ को फैलाने में कि जितनी तेजी से टीके लग रहे हैं भारत में, उतनी तेजी से विकसित देशों में भी नहीं लग रहे हैं।

इस तरह की बातें करना बेकार है, इसलिए कि यह कोई स्पर्धा नहीं, आपदा है। शहरों और महानगरों में स्वास्थ्य सेवाएं जैसी तैसी भी सही मौजूद हैं, लेकिन देहातों में ऐसा नहीं है। पिछले हफ्ते भैरवी जानी नाम की एक महिला ने मुंबई के एक कोरोना आइसीयू से प्रधानमंत्री को एक चिट्ठी लिखी ट्विटर पर, जिसमें उसने अपनी आपबीती बताई। इस महिला ने बताया कि पिथौरागढ़ के एक गांव में जब वह कोविड पॉजिटिव पाई गई थी, तो आसपास कोई अस्पताल नहीं था, जिसमें उसका इलाज हो सके, तो एक हवाई एंबुलेंस से उसे मुंबई लाना पड़ा। ऐसा कितने लोग कर सकते हैं?

जो हाल उसने अपने गांव की स्वास्थ्य सेवाओं का बताया, वह हाल उत्तर भारत में तकरीबन हर गांव में पाया जाता है। यानी न जांच करने का कोई अच्छा बंदोबस्त, न दो गज की दूरी रखने की कोई संभावना, न घरों में किसी बीमार को अलग रखना संभव, क्योंकि अक्सर ग्रामीण घरों में एक ही शौचालय होता है। जांच जब किसी की होती है तो कई दिन लग जाते हैं उसके नतीजे आने में। सो, तीसरी लहर जब आएगी और उसका आना तकरीबन पक्का है, तो हमारी तैयारी उतनी ही कमजोर होगी, जितनी दूसरी लहर के लिए थी।

ऊपर से देहातों में जब टीकाकरण अभियान युद्ध स्तर पर शुरू किया जाएगा, तो पाया यह जाएगा कि टीकों को लेकर इतने लोग वहमी हैं कि अभी से शुरू किया जाना चाहिए उनके वहमों को दूर करने के लिए पंचायतों में प्रचार। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री इन दिनों अपने प्रचार में लगे हुए हैं, लेकिन आम ग्रामीण लोगों के वहमों को दूर करने का प्रचार अभी शुरू ही नहीं हुआ है ऐसे प्रदेश में, जहां ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाएं न के बराबर हैं।

प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में कोविन ऐप की खूब प्रशंसा की। यहां तक कहा उन्होंने कि कई देश इसकी नकल करना चाहते हैं। शायद। लेकिन प्रधानमंत्री जी, क्या आप जानते नहीं हैं कि ग्रामीण भारत में अभी तक डिजिटल सेवाएं हैं ही नहीं। क्या करेंगे वे लोग, जिनके पास स्मार्टफ़ोन हैं ही नहीं? अमेरिका में आप किसी भी दवाइयों की दुकान में जाकर टीका लगवा सकते हैं, बल्कि आप अपने डॉक्टर से ही टीका लगवा सकते हैं।

हमारे यहां अभी तक वही केंद्रीयकरण चल रहा है, क्योंकि जिन अधिकारियों को प्रधानमंत्री ने रखा है अपने कोविड टास्क फोर्स में, उन्होंने साबित कर दिया है कि उन्होंने इतनी गलत नीतियां बनाई हैं कि फिलहाल यह महामारी उनसे कोई दस कदम आगे है। इनकी गलतियां इतनी गंभीर हैं कि लाखों लोग मारे गए हैं, लेकिन अभी तक इन अधिकारियों की न नौकरियां गई हैं और न कोई जांच हो रही है। ऐसा क्यों?

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