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सरकार और कारोबार

सरकार का काम होना चाहिए शासन चलाना। सरकार का काम होना चाहिए उन बुनियादी सेवाओं पर ध्यान देना, जो अभी तक हम अपने नागरिकों को दे नहीं पाए हैं। जनता का पैसा निवेश होना चाहिए अच्छे स्कूलों और स्वास्थ्य सेवाओं में, न कि डूबते उद्योगों में।

NITI AAYOG Meetingप्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (फोटो-पीटीआई)

पिछले सप्ताह प्रधानमंत्री के लोकसभा वाले भाषण ने याद दिलाया कि मैं क्यों कभी उनके भक्तों में गिनी जाती थी। याद आया कि नरेंद्र मोदी ने कभी कहा था कि सरकार को बिजनेस करने का कोई अधिकार नहीं होना चाहिए। उद्योग लगाना और व्यापार उनको ही करना चाहिए जो इन चीजों के बारे में सरकारी अफसरों से बेहतर जानते हैं। अपनी इन बातों को मोदी प्रधानमंत्री बनने के बाद जैसे भूल से गए थे। या शायद राहुल गांधी के उस ‘सूट-बूट की सरकार’ वाले ताने से डर गए थे। नतीजा यह कि पिछले सात सालों में उन्होंने अपनी सरकार को उसी घिसे-पिटे ‘समाजवादी’ रास्ते पर रखा, जो सोनिया गांधी ने अपनी सरकार को रखा था। न किसी घाटे में चल रहे सरकारी उद्योग का निजीकरण हुआ और न ही प्रयास किया गया इन उद्योगों को कम से कम सरकारी अधिकारियों के हाथों से लेकर उनके हाथों में सौंपने का, जिनको अनुभव है बिजनेस का।

इसलिए बहुत अच्छा लगा मुझे जब प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में उनकी तारीफ की, जो देश के लिए धन पैदा करते हैं और साथ में यह भी कहा कि हर काम को सरकारी अफसर क्यों करें। यह बात मुझे निजी तौर पर अच्छी इसलिए लगी, क्योंकि मेरा मानना है कि भारत गरीब देशों की श्रेणी में से बहुत पहले निकल गया होता, अगर हमने अर्थव्यवस्था को सरकारी अफसरों के हवाले न किया होता।

ऐसा करने का देश के पहले प्रधानमंत्री ने ठीक सोचा, इसलिए कि उनके दौर में पूर्व सोवियत संघ की असलियत दुनिया नहीं जानती थी। नहीं जानती थी दुनिया कि सोवियत संघ का इतना बुरा हाल था कि रोजमर्रा की मामूली चीजें भी वहां नहीं बनती थीं। इतना ढका रहा यह देश उस लोहे के पर्दे के पीछे कि दुनिया अंदर झांक भी नहीं सकती थी। सिर्फ वे चीजें देख सकते थे हम, जो सोवियत संघ के तानाशाह हमको दिखाना चाहते थे। हम जानते थे कि अंतरिक्ष में सोवियत संघ अमेरिका से आगे निकल गया था और जानते थे कि परमाणु हथियारों का उनके पास भंडार था।

जवाहरलाल नेहरू जब सोवियत संघ गए तो उनको ऐसा लगा कि मजदूरों, किसानों और आम लोगों के लिए यह देश स्वर्ग बन गया है। वहां बड़े-बड़े सरकारी उद्योग देख कर उनको लगा कि भारत में गरीबी दूर करने का यही रास्ता है, सो उन्होंने अर्थव्यवस्था को पूरी तरह सरकारी अफसरों के हाथों में रखा। उनकी बेटी ने उनके रास्ते पर चलते हुए लाइसेंस राज कायम किया, जिसने निजी क्षेत्र को तकरीबन तबाह कर दिया था।

इसके बावजूद अस्सी फीसद भारतीय गरीब और आशिक्षत रहे उनके दौर में। मध्यवर्ग तभी पैदा होने लगा जब नरसिंह राव ने लाइसेंस राज समाप्त किया प्रधानमंत्री बनने के बाद। उस समय उनके वित्तमंत्री थे डॉक्टर मनमोहन सिंह, जिनको श्रेय मिलता है आर्थिक सुधारों का दौर शुरू करने का।

जैसे जैसे निजी उद्योग क्षेत्र की शक्ति बढ़ती रही वैसे वैसे भारत में प्रगति होती रही और वह दौर समाप्त होता गया, जब इस देश के नौजवानों के लिए तरक्की का एक ही रास्ता हुआ करता था और वह था सरकारी नौकरी प्राप्त करना। भारत और भी आगे निकल गया होता अभी तक अगर सोनिया गांधी हमको वापस उस समाजवादी रास्ते पर न ले गई होतीं, जिसमें गरीबी हटाने का एक ही उपाय होता है और वह है बड़ी-बड़ी समाज कल्याण योजनाओं द्वारा गरीबों में खैरात बांटना। मनरेगा जैसी योजनाओं का मोदी ने खुल कर कभी विरोध किया था लोकसभा में, लेकिन फिर उनको अपना कर बेहतर बनाने का काम किया।

रही बात अपनी सरकार को बिजनेस से दूर रखने की तो यहां भी उन्होंने अपने पहले कार्यकाल में कुछ नहीं किया। एयर इंडिया जैसी दशकों से घाटे में चलने वाली कंपनी को भी सरकारी हाथों में रखा। सो, जनता का पैसा इन सरकारी कारखानों और कंपनियों में डूबता रहा। अब पहली बार उस पुराने मोदी की झलक दिखने लगी है, जो कहा करते थे कि सरकार को बिजनेस से दूर रहना चाहिए।

निजी तौर पर उम्मीद करती हूं कि मोदी इस रास्ते पर चलते रहें ताकि अर्थव्यवस्था पर जो मंदी छा गई थी कोविड के आने से पहले, वह दूर होने लगे। मोदी ने ठीक कहा है कि निजी उद्योग न होते तो शायद भारत में एक नहीं दो वैक्सीन तैयार नहीं होतीं। ठीक कहा उन्होंने कि हमको सम्मान करना चाहिए अपने निजी क्षेत्र का।

समस्या उनकी अब सिर्फ यह है कि बहुत लोगों को उनकी सरकार की नीयत पर शक होने लगा है, इसलिए कि उनको ऐसा लगता है कि कुछ मुट्ठी भर उद्योगपति हैं, जिन पर उनकी सरकार खास मेहरबान है। राहुल गांधी ने लोकसभा में ‘हम दो हमारे दो’ कह कर इशारा इसी तरफ किया है, लेकिन किसानों से भी यह बात बहुत सुनने को मिलती है।

उनसे जब पूछा जाता है कि इन कृषि कानूनों में उनको कौन-सी ऐसी बात दिखती है जिसे देख कर उनको अपनी रोजी-रोटी खोने का डर सताता है, तो स्पष्ट शब्दों में कहते हैं कि उनको शक है कि ‘अंबानी-अडानी’ के हाथों में दिया जा रहा है उनका भविष्य।

यह बात सही हो या न हो, ऐसी छवि बन चुकी है मोदी सरकार की। समस्याएं आएंगी बहुत सारी अगर वे डटे रहते हैं अपनी सरकार को बिजनेस करने से दूर रखने के लिए, लेकिन उनको इस रास्ते पर चलते ही रहना चाहिए। सरकार का काम होना चाहिए शासन चलाना। सरकार का काम होना चाहिए उन बुनियादी सेवाओं पर ध्यान देना, जो अभी तक हम अपने नागरिकों को दे नहीं पाए हैं। जनता का पैसा निवेश होना चाहिए अच्छे स्कूलों और स्वास्थ्य सेवाओं में, न कि डूबते उद्योगों में।

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