गैरजरूरी मुद्दे

संसद के इस सत्र में मुद्दे होने चाहिए थे कोविड को रोकने में मोदी सरकार की गलतियां, टीकों का अभाव, आर्थिक मंदी, बेरोजगारी का खतरनाक रफ्तार से बढ़ना। मगर इन मुद्दों को ताक पर रख कर हंगामा हुआ है पेगासस जासूसी को लेकर। आम लोगों के लिए यह इतना ही बेमतलब साबित होने वाला है, जितना 2019 के लोकसभा चुनावों में रफाल विमानों की खरीदारी में तथाकथित घोटाले का मुद्दा साबित हुआ था।

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राजधानी दिल्ली में कांग्रेस नेता सोनिया गांधी और टीएमसी नेता ममता बनर्जी की मुलाकात पर कई तरह की चर्चाएं चलने लगी हैं। (फोटो- इंडियन एक्सप्रेस)

विपक्ष के नेता कुछ ज्यादा दिखे पिछले सप्ताह। ममता बनर्जी दिल्ली पहुंचीं, यह कहने कि अगर भारतीय जनता पार्टी को हराना है, तो तमाम विपक्षी दलों को इकट्ठा होना होगा। उसी दिन राहुल गांधी के साथ अन्य विपक्षी राजनेताओं का हुजूम दिखा संसद के बाहर। बारिश में खड़े होकर राहुल गांधी ने इस समूह का प्रवक्ता बन कर पेगासस का मामला उठाया। अपने खास बचकाने अंदाज में कांग्रेस के युवराज ने कहा- ‘मोदी ने आपके फोन में हथियार डाल रखा है। इस हथियार का प्रयोग मेरे खिलाफ हुआ है।’ भूल गए थे वे शायद कि आम जनता के लिए यह इतना बड़ा मुद्दा नहीं है। भूल गए थे शायद कि कोविड की भयानक मौत से रंगी दूसरी लहर के बाद संसद का पहला सत्र चल रहा था और उनकी जगह सदन के अंदर होनी चाहिए थी, ताकि कोविड में मोदी सरकार की गंभीर गलतियों को उठा सकें उस जगह, जहां चर्चा हो सके। चर्चा होती लोकसभा में तो प्रधानमंत्री मुश्किल में पड़ते। टीकों के अभाव पर क्या कहते? क्या कहते ऑक्सीजन के अभाव से हुई अस्पतालों में मौतों पर?

इतनी कमजोरी दिखाई है विपक्ष के राजनेताओं ने कि दिल्ली की सड़कों पर इन दिनों बड़े-बड़े पोस्टर लग गए हैं, जिनमें प्रधानमंत्री के मुस्कराते चेहरे के साथ लिखे हैं ये शब्द: धन्यवाद मोदी। धन्यवाद मुफ्त टीकों के लिए। मगर टीके हैं कहां? कब मिलेंगे इतने टीके कि देश के सत्तर फीसद लोगों को लग सकें और हम उस तरह कोविड से मुकाबला कर सकें, जिस तरह विकसित पश्चिमी देश कर रहे हैं? इस तरह के सवाल अगर उठाते विपक्ष के राजनेता सदन के अंदर तो जनता को कम से कम इतना तो आश्वासन मिलता कि कोई है, जो सरकार की उनकी तरफ से चौकीदारी कर रहा है। संसद के बाहर बारिश में खड़े होकर ऐसे मुद्दों को उठाना, जिनसे जनता का कोई लेना-देना नहीं है, बिलकुल बेमतलब था।

उधर ममता दीदी से हमने सुना कि बहुत जरूरी है विपक्ष की एकता। इस बात को सुना तो ऐसा लगा मुझे कि कोई पुरानी पिक्चर चल रही है, जिसको मैं बहुत बार देख चुकी हूं। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री सोनिया और राहुल गांधी से मिलीं और उनसे मिलने दिल्ली के मुख्यमंत्री पहुंचे। याद आया मुझे कि नोटबंदी के बाद भी बिल्कुल इसी किस्म की हरकतें देखीं थी हमने। आम सभाएं हुईं दिल्ली में, इन्हीं लोगों के जोशीले भाषण सुनने को मिले, रिजर्व बैंक के दफ्तर के सामने इन्हीं राजनेताओं ने धरने दिए, लेकिन कुछ महीनों बाद जब उत्तर प्रदेश में विधानसभा के चुनाव हुए, तो भारतीय जनता पार्टी शान से जीती, बावजूद इसके कि आम लोगों को बैंकों के सामने कई-कई दिन लंबी कतारों में खड़े होकर भूखे-प्यासे रह कर अपने पुराने नोट बदलने पड़े थे। अब फिर से आ रहे हैं कुछ महीनों में उत्तर प्रदेश में चुनाव और अनुमान यही है कि भारतीय जनता पार्टी की सरकार फिर से बनेगी।

योगी आदित्यनाथ ने अपने गुरु मोदी की नकल करते हुए असत्य को सत्य में बदलने का काम किया है। उत्तर प्रदेश सरकार के प्रचार के मुताबिक इस राज्य में कोविड की दूसरी लहर को रोकने में इतने कामयाब रहे योगी आदित्यनाथ कि न किसी अस्पताल में बिस्तरों की कमी थी, न आॅक्सीजन की और न ही गंगाजी के किनारे लाशें दफनाई गई थीं। सब झूठा प्रचार है जी, सब विपक्ष द्वारा फैलाया गया झूठा प्रचार।

योगी की प्रशंसा में इन दिनों हर बड़े टीवी चैनल पर देखने को मिलती हैं लंबी-लंबी फिल्में, जिनको बनाया है उत्तर प्रदेश सरकार ने, यह साबित करने के लिए कि जबसे योगी बने हैं मुख्यमंत्री तबसे उत्तर प्रदेश में इतनी तेजी से विकास हुआ है कि अब ‘यूपी नंबर वन’ है। पिछले हफ्ते मुझे विपक्ष के एक समर्थक ने बताया चुपके से कि योगी अपने प्रचार पर दो हजार करोड़ रुपए खर्च कर रहे हैं, सो जीत अगले साल आने वाले चुनावों में शायद उन्हीं की होगी।

रही बात 2024 में होने वाले लोकसभा चुनावों की, तो मोदी के भक्त अभी से प्रचार करने लगे हैं सोशल मीडिया पर कि मोदी जीतेंगे एक बार फिर, क्योंकि उनको हराने वाला राजनेता दूर क्षितिज पर भी नहीं दिख रहा है। मैं अब मोदी की भक्त नहीं हूं, लेकिन इस बात से असहमति जताना मुश्किल है, क्योंकि वास्तव में पिछले सप्ताह विपक्ष के राजनेताओं की हरकतें देख कर ऐसा लगा मुझे जैसे ये लोग दो बार आम चुनावों में बुरी तरह हारने के बाद भी कुछ नहीं सीखे हैं।

इस बात को खासतौर पर कहा जा सकता है कांग्रेस पार्टी के लिए, जिसके बिना विपक्ष की एकता कोई मतलब नहीं रखती है, क्योंकि यही एक राजनीतिक दल है, जिसका राष्ट्रीय स्तर पर अस्तित्व है। मगर ऐसा लगता है कि 2014 के आम चुनाव हारने के बाद कांग्रेस के आला नेता भूल गए हैं कि जनता के सामने कौन-से मुद्दे हैं, जिनको उठाने से वे साबित कर सकेंगे एक बार फिर कि उनको आम आदमी का दर्द समझ में आता है।

संसद के इस सत्र में मुद्दे होने चाहिए थे कोविड को रोकने में मोदी सरकार की गलतियां, टीकों का अभाव, आर्थिक मंदी, बेरोजगारी का खतरनाक रफ्तार से बढ़ना। मगर इन मुद्दों को ताक पर रख कर हंगामा हुआ है पेगासस जासूसी को लेकर। आम लोगों के लिए यह इतना ही बेमतलब साबित होने वाला है, जितना 2019 के लोकसभा चुनावों में रफाल विमानों की खरीदारी में तथाकथित घोटाले का मुद्दा साबित हुआ था। विपक्ष की समस्या यह है कि कांग्रेस के बिना विपक्ष ही नहीं है राष्ट्रीय स्तर पर और कांग्रेस इतनी दिशाहीन है कि अभी तक तय ही नहीं कर पाई है कि उसका असली अध्यक्ष कौन है और उसका अस्तित्व क्या है।

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