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नफरत का कारखाना

अभी तक मुसलमानों के खिलाफ भारत में इस मुहिम पर टिप्पणी आई है पश्चिमी देशों से। मगर अब हर इस्लामी मुल्क में भारत बदनाम हुआ है, जहां लाखों भारतीय काम करते हैं और जहां से आती है हमारी आधे से ज्यादा विदेशी मुद्रा। उम्मीद है कि अब नफरत का यह कारखाना बंद होगा।

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प्रयागराज हिंसा: बच्‍चों को आगे कर चलाए गए पत्‍थर (Photo Source- PTI)

भारत जितना बदनाम हुआ है पिछले सप्ताह, शायद ही पहले कभी हुआ होगा। दुनिया के तकरीबन हर इस्लामी देश ने स्पष्ट किया कि किसी हाल में वे इस्लाम के रसूल का अपमान सहने को तैयार नहीं हैं। जिस समय भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ताओं के बयान को लेकर हंगामा हुआ, देश के उप-राष्ट्रपति कतर में थे और तय था पहले से कि कतर के अमीर उनके लिए खास दावत रखेंगे। जब उस दावत को अचानक रद्द कर दिया गया, तब जाकर अपने विदेश मंत्रालय में खतरे की घंटियां जोर से बजने लगीं और भारतीय जनता पार्टी को आदेश आया कि उन दोनों प्रवक्ताओं के खिलाफ सख्त कार्रवाई करनी पड़ेगी, जिन्होंने पैगंबर का अपमान किया था। तब तक इस्लामी मुल्कों में इतना गुस्सा फैल गया था कि दुकानों से भारतीय सामान का बहिष्कार शुरू हो गया था।

क्या यह सब न होता तो भारत सरकार माफी मांगती उन देशों से, जहां हमारे राजनयिकों को बुला कर फटकार लगाई गई थी? नहीं। बिलकुल नहीं। सबूत इसका नूपुर शर्मा ने खुद दिया, जब उन्होंने भाजपा समर्थक ओपइंडिया के संपादक और अपनी हमनाम, से कहा कि उनको आश्वासन मिला था पार्टी के आला नेताओं से कि उनको अपने बयान को लेकर कोई चिंता नहीं होनी चाहिए। सच बोल रही थीं भाजपा की ये प्रवक्ता, वरना इस्लाम के रसूल को अपमानित करने के फौरन बाद उनके खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए थी।

दस दिन तक नहीं हुई, तो इसलिए कि भारत सरकार ने शायद सोचा होगा कि जिस तरह मुसलमानों के खिलाफ अन्य कई साधुओं और साध्वियों के बयानों को इस्लामी देशों ने अनसुना किया है, वैसे इस बार भी होगा। विदेश मंत्रालय के आला अधिकारी शायद भूल गए होंगे कि जिसको हम बेअदबी कहते हैं, वह मुसलमानों के लिए शब्द है गुस्ताख-ए-रसूल, यानी रसूल को निजी तौर पर अपमानित करना।

जिस अंदाज में यह सब होने के बाद भारत सरकार की तरफ से क्षमा मांगी गई है, उसी से मालूम होना चाहिए कि वास्तव में कोई माफी नहीं मांगी गई है, गुस्ताखी के लिए सिर्फ एक बहाना दिया गया है।

भारत सरकार ने कहा है कि नूपुर शर्मा का बयान केवल ‘फ्रिंज’ किस्म के हिंदुओं की सोच को दर्शाता है, भारत की सोच को नहीं। नूपुर शर्मा निलंबित कर दी गई हैं फिलहाल, पार्टी से उनको निकाला नहीं गया है। शायद इस उम्मीद से कि हंगामा ठंडा होने के बाद उनको चुपके से वापस लिया जाएगा। ऐसा क्यों न हो

भारतीय जनता पार्टी के सारे प्रवक्ता टीवी पर मुसलमानों और इस्लाम के खिलाफ रोज बोलते हैं और उनके खिलाफ कभी कोई कार्रवाई नहीं हुई है। नूपुर ने चूंकि अपने साथियों से थोड़ा आगे बढ़ कर सीधा इस्लाम के रसूल की बेअदबी की थी, उनसे माफी मंगवाई गई है अपनी गलती पर, लेकिन इस माफीनामे में भी उन्होंने अपनी सफाई दी है कि उनसे महादेव का अपमान बर्दाश्त नहीं हुआ। बात कर रही थीं वाराणसी की ज्ञानवापी मस्जिद विवाद की। यानी हाल में मिले उसकी, जिसको हिंदू पक्ष शिवलिंग कह रहा है और मुसलिम पक्ष फव्वारा।

न उनकी माफी पर विश्वास किया जा सकता है और न भारत सरकार की माफियों पर। इसलिए कि दुनिया जानती है कि जबसे नरेंद्र मोदी का ‘न्यू इंडिया’ बना है, तबसे खुली छूट है मोदी भक्तों को मुसलमानों और इस्लाम का हर दूसरे दिन अपमान करने की।

इस मुहिम में केंद्रीय मंत्री शामिल हैं और कई टीवी पत्रकार भी। कोविड जब आया देश में तो इसका दोष पहले उन मौलवियों पर डाल दिया गया था, जो दिल्ली में एक वार्षिक इस्लामी सम्मेलन के लिए आए थे। कई जेलों में बंद कर दिए गए महीनों तक और अफवाहें फैलाई गईं कि मुसलिम मरीज अस्पतालों में जान-बूझ कर थूक रहे हैं बीमारी फैलाने के लिए।

नागरिकता कानून में संशोधन के खिलाफ जब मुसलमान सड़कों पर विरोध जताने निकले थे, तो उन पर गद्दारी का इल्जाम खुल कर लगाया था मोदी के मंत्रियों ने और देश के गृहमंत्री ने खुद।

इसके अलावा गरीब मुसलिम ठेलेवालों पर हमले हुए हैं कई शहरों में और गोश्त बेचने वालों पर पाबंदियां लगाई गई हैं। नफरत का माहौल ऐसा बना है कि शाहरुख खान भी बच न सके हैं। जब लता मंगेशकर के अंतिम संस्कार पर गए आखिरी विदाई देने, तो दुआ पढ़ कर उन्होंने अपना मास्क उतारा, ताकि हवा उनकी दुआ ऊपर ले जाए। इसके फौरन बाद हिंदुत्ववादियों ने अफवाहें फैलार्इं कि देश के इस अति-लोकप्रिय अभिनेता ने लताजी के शव पर थूका था।

मुसलमानों के खिलाफ हर तरह से नफरत की मुहिम चलाई गई है। इसमें अहम भूमिका रही है भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ताओं की, और कुछ टीवी चैनलों की, जो हैं तो प्राइवेट, लेकिन असल में दिन-रात मोदी की प्रशंसा में लगे रहते हैं। नाम उनके आप सब जानते हैं, सो इतना कहना काफी है कि इनकी सूची लंबी है।

ऐसा न होता तो जब नूपुर शर्मा ने पैगंबर के निजी जीवन पर टिप्पणी की थी अभद्र तरीके से, तो जिस कार्यक्रम में उन्होंने अपनी बात कही, उसकी ऐंकर का क्या फर्ज नहीं था, कम से कम इतना तो कहना कि नूपुर की बात से वे सहमत नहीं हैं। टोकना ही काफी होता, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। आप इन समाचार चैनलों को हर शाम देखते हैं, तो आपने भी कई बार देखा होगा कि वे किस तरह नफरत फैलाने का काम करते हैं।

अभी तक मुसलमानों के खिलाफ भारत में इस मुहिम पर टिप्पणी आई है पश्चिमी देशों से। मगर अब हर इस्लामी मुल्क में भारत बदनाम हुआ है, जहां लाखों भारतीय काम करते हैं और जहां से आती है हमारी आधे से ज्यादा विदेशी मुद्रा। उम्मीद है कि अब नफरत का यह कारखाना बंद होगा।

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