शर्मनाक हादसा और रहस्यमय चुप्पी

अपनी प्रचार मशीन पर अब शायद प्रधानमंत्री को इतना विश्वास हो गया है कि जानते हैं कि विषय बदल जाएगा और कुछ ही दिनों में लोग भूल जाएंगे कि उत्तर प्रदेश की एक धूलभरी पगडंडी पर एक केंद्रीय मंत्री के बेटे ने पैदल चलते हुए, निहत्थे किसानों को ऐसा कुचला जैसे वे किसान न होकर शिकार हों।

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उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले में रविवार को मारे गए किसानों की मौत पर रोते-बिलखते परिवार। (फोटो- विशाल श्रीवास्तव- इंडियन एक्सप्रेस)

लिखने बैठी तो मेरे लैप्टाप के स्क्रीन पर छप से गए लखीमपुर खीरी के वे विडियो, जो मैंने इतनी बार देखे हैं कि मन में जैसे फिल्म चल रही हो, जो बंद करने पर भी बंद नहीं होती है। आपने भी शायद देखे होंगे सोशल मीडिया पर वे सारे विडियो और आपका भी दिल दहल गया होगा। आखिरी वाला सबसे डरावना था, इसलिए कि उसमें सफाई से दिखता है तेजी से चलता हुआ गाड़ियों का काफिला, जो सीधे चढ़ जाता है पैदल चलते हुए किसानों पर, जो उसको देख भी नहीं सके होंगे, इसलिए कि उनके पीछे से आता है।

फिर दिखते हैं इस विडियो में कि किस तरह गाड़ियां मरे हुए और अधमरे लोगों के ऊपर से निकल जाती हैं, जैसे इंसान न मरे हों, जंगली जानवर हों। सच पूछिए तो मैंने पत्रकारिता के इस लंबे सफर में इतनी भयानक तस्वीरें पहले कभी नहीं देखी हैं।

कई दंगे देखे हैं, कई लाशें 1984 वाले सिखों के संहार में, लेकिन आंखों के सामने इंसानों की हत्या होते सिर्फ तब देखी है, जब किसी मुठभेड़ में पुलिस की गोली से कोई हथियारबंद आतंकवादी मारा गया है। इंसानों को कुचलते हुए मैंने कभी नहीं देखा है।

तस्वीरें इतनी भयानक थीं कि भारतीय जनता पार्टी की प्रचार मशीन फौरन हरकत में आ गई, यह साबित करने कि काफिले पर हमला पहले किसानों ने किया था लाठियों और पत्थरों से और मंत्रीजी की गाड़ियां बेकाबू हो गई थीं और इसलिए चार किसान मारे गए, जिनमें दो उन्नीस साल के नौजवान थे।

मैंने जब उस आखिरी, बिलकुल स्पष्ट विडियो का जिक्र किया सोशल मीडिया पर तो भाजपा के ट्रोल टूट पड़े मुझ पर यह कहने कि मैं जानबूझ कर झूठ बोल रही हूं, सिर्फ इसलिए कि मुझे मोदी से ‘नफरत’ है। अजीब बात इस ट्रोल सेना की यह है कि प्रधानमंत्री का नाम अक्सर वे खुद लाते हैं हर बहस में और फिर एतराज करते हैं कि मोदी का नाम घसीटा जाता है हर हादसे में, जैसे कि दोष हमेशा उन्हीं का हो।

इस बार दोष उनका इतना जरूर है कि उनके गृह राज्यमंत्री का काफिला था और उनकी तरफ से अभी तक एक शब्द नहीं निकला है निंदा का और न ही इस मंत्री से उन्होंने इस्तीफा मांगा है। मंत्रीजी ने स्वीकार किया है कि गाड़ियां उस काफिले में उनकी हैं, लेकिन इसके बाद लगे रहे हैं इस बात को साबित करने में कि उनका बेटा उस काफिले में मौजूद नहीं था।

इतने में सोशल मीडिया पर मोदी भक्त और भाजपा की प्रचार मशीन ऐसे हावी हो गई थी कि विषय बदल डाला। विषय बन गया किसान आंदोलन में खालिस्तानियों के घुस जाने का। विषय बन गया इस घटना का राजनीतिकरण। विषय बन गया प्रियंका गांधी की गिरफ्तारी और कुछ टीवी चैनल तो ऐसे थे, जिन्होंने लखीमपुर खीरी की तस्वीरें कम दिखाईं और प्रियंका गांधी की गिरफ्तारी की ज्यादा, जिनमें सबसे ज्यादा देखने को मिली वह तस्वीर, जिसमें प्रियंका गांधी हाथ में झाड़ू लिए अपने कैदखाने का फर्श साफ कर रही हैं।

एक अति-चतुर, संवेदनहीन भाजपा प्रचारक ने तो मजाक करते हुए कह दिया कि अच्छी बात है कि प्रियंका जुड़ गई हैं स्वच्छ भारत अभियान के साथ। भूल गए ये महाशय कि आठ लोग मारे गए थे इस हादसे में, जिनमें तीन उनकी पार्टी के कार्यकर्ता थे।

रही बात घटना के राजनीतिकरण की, तो ऐसा क्यों न हो? क्यों न विपक्ष के राजनेता लखीमपुर जाएं पीड़ित परिवारों के साथ अफसोस करने? लेकिन यह योगी का दौर है, सो जिस तरह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने लोगों को हाथरस जाने से रोका था, शायद सोचा होगा कि इस बार भी रोक सकेंगे। विषय बदलने की कोशिश उन्होंने भी की। मरने वालों के अंतिम संस्कार हुए नहीं थे कि योगी दिखे प्रधानमंत्री का स्वागत लखनऊ में करते हुए एक विशाल सम्मेलन में।

मोदी खुद ऐसे पेश आए जैसे कुछ हुआ ही नहीं था, सो अपने भाषण में उन्होंने शहरीकरण की बातें की और मुस्कराते हुए बातें की उन लोगों से, जिनको उनकी सरकार की गरीब कल्याण योजनाओं से लाभ पहुंचा है। फिर ट्विटर पर दिखे उनके कई ट्वीट, कभी नवरात्रि की शुभकामनाएं देते हुए, तो कभी अपने किसी साथी को जन्मदिन की बधाई देते हुए। इन शब्दों के लिखे जाने तक उनकी तरफ से, न उनके गृहमंत्री की तरफ से लखीमपुर-खीरी का नाम सुनने को मिला है।

अपनी प्रचार मशीन पर अब शायद प्रधानमंत्री को इतना विश्वास हो गया है कि जानते हैं कि विषय बदल जाएगा और कुछ ही दिनों में लोग भूल जाएंगे कि उत्तर प्रदेश की एक धूलभरी पगडंडी पर एक केंद्रीय मंत्री के बेटे ने पैदल चलते हुए, निहत्थे किसानों को ऐसा कुचला जैसे वे किसान न होकर शिकार हों।

हो सकता है कि उत्तर प्रदेश के चुनावों में इस शर्मनाक घटना का कोई असर नहीं होगा और योगी एक बार फिर बन जाएं मुखमंत्री। ऐसा कह रहे हैं कई राजनीतिक पंडित। लेकिन मालूम नहीं क्यों मुझे इसका विश्वास नहीं हो रहा है। मालूम नहीं क्यों, मुझे विश्वास उलटा इस बात का होने लगा है कि यह घटना इतनी दर्दनाक थी कि इसको भुलाना मुश्किल होगा जब तक न्याय न सिर्फ होता है, उसको होने का अहसास भी होता है।

न्यायिक जांच का वादा किया तो है योगी ने और मुआवजा देने का भी वादा किया है पीड़ित परिवारों को, लेकिन दुनिया जानती है कि न्यायिक जांच अक्सर काम करती है मोहलत उनको देने का, जिनका दोष होता है इस तरह की घटनाओं में। अक्सर जब तक जांच समिति अपना फैसला सुनाती है, लोग भूल गए होते हैं कि हुआ क्या था।

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