जवाबदेही के बजाय

जब तक भारतीय जनता पार्टी शासित राज्यों में बेहाल अस्पताल और श्मशान नहीं दिखने लगे, केंद्र सरकार के मंत्री और भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता चिलाते रहे कि विपक्षी राजनेता ‘पॉलिटिक्स’ खेल रहे हैं ऐसे समय जब संकट की घड़ी है देश के लिए। क्या जवाबदेही मांगना केंद्र सरकर से सियासत है?

coronavirus, covidबिस्तर की कमी के चलते मरीजों को अस्पताल में दाखिल होने से मना करता सुरक्षाकर्मी। (PTI)।

समय आ गया है उनसे जवाबदेही मांगने का, जिनकी जिम्मेवारी थी हमको इस महामारी से बचाने की। किसकी गलती है कि आॅक्सीजन के लिए तड़प-तड़प कर मरीज मरते दिखने लगे हैं? किसकी गलती है कि मरने के बाद भी श्मशानों के बाहर शवों की कतारें लग रही हैं घंटों तक और जब बारी आती है अंतिम संस्कार की तो कई शहरों में एक चिता में चार-पांच शव जलाए जा रहे हैं? किसकी गलती है कि टीकों की इतनी बड़ी कमी है कि आत्मनिर्भरता के नारे को ताक पर रख कर प्रधानमंत्री ने इजाजत दी है अब विदेशी टीकों को भारत में आने की?

सच पूछिए तो मैंने इतना बड़ा संकट कभी पहले नहीं देखी है देश में और दशक गुजारे हैं मैंने पत्रकारिता में। इन दशकों में एक सत्य, जिसे मैंने बहुत पहले स्वीकार कर लिया था, यह है कि सरकारी अधिकारियों से संवेदनशीलता की उम्मीद रखना बेकार है। इसके बावजूद मुझे हैरान कर दिया पिछले हफ्ते उन दो वरिष्ठ अधिकारियों ने, जिनको जिम्मेदारी दी गई थी टीकाकरण अभियान की ओर ध्यान देने और देश को करोना महामारी से लड़ने के लिए दवाई और अन्य साधन उपलब्ध कराने की, उनकी बातें सुन कर मुझे लगा कि इनके भीतर संवेदनशीलता शब्द है ही नहीं।

पहले बात करते हैं नीति आयोग के एक सदस्य की, जिनकी जिम्मेवारी थी टीकाकरण अभियान चलाने की देश भर में। याद कीजिए कि इसकी पूरी जिम्मेवारी केंद्र सरकार ने अपने हाथों में रखी थी पिछले हफ्ते तक। इसलिए जब दोनों टीके लगवा लेता है कोई, उसको केंद्र सरकार से प्रमाण पत्र दिया जाता है, जिस पर प्रधानमंत्री की तस्वीर होती है। पिछले हफ्ते जब उनसे एक पत्रकार ने टीकों के अभाव के बारे में पूछा तो उन्होंने सारा दोष डाल दिया आम जनता पर।

उन्होंने कहा कि आम लोगों में ‘अहंकार’ इतना था कि न मास्क पहनना जरूरी समझा लोगों ने और न ही एक दूसरे से कुछ दूरी बनाए रखने के नियम पालन किए, इसलिए महामारी अब तूफान बन गई है।
अफसोस कि उनसे यह नहीं पूछा गया कि जब अमेरिका की सरकार ने पिछले साल जुलाई में साठ करोड़ टीके खरीदे थे, भारत सरकार ने सिर्फ एक करोड़ खरीदे इतनी बड़ी जनसंख्या वाले देश के लिए। अहंकार का नशा किसको है? देश से माफी किसको मांगनी चाहिए?

अब बात करते हैं एम्स के एक शीर्ष अधिकारी की, जिनको सौंपा गया था काम करोना के इलाज के लिए तमाम साधन इकट्ठा करने का। उनसे जब पूछा गया पिछले हफ्ते आॅक्सीजन की देश भर में गंभीर कमी के बारे तो उन्होंने दोष डाला आम लोगों पर। कहा कि आॅक्सीजन को वे मरीज जाया कर रहे हैं जो घर में इलाज करवा रहे हैं और जो खून में आॅक्सीजन की थोड़ी-सी कमी दिखने पर आॅक्सीजन लेना शुरू कर देते हैं। सवाल यह उठता है कि क्या यही कारण है कि दिल्ली और मुंबई से लेकर हर छोटे शहर के अस्पतालों से रोज शिकायतें आ रही हैं आॅक्सीजन के अभाव की?

सच तो यह है कि शुरू से भारत सरकर के अधिकारियों और मंत्रियों ने इस महामारी को गंभीरता से नहीं लिया है। शुरू में निजामुद्दीन पुलिस थाने ने उन सब विदेशी मुसलमानों को गिरफ्तार किया जो तब्लीगी जमात के मरकज में शिरकत करने आए थे। उन पर आरोप लगाए गए कोरोना फैलाने के और कइयों ने महीने काटे जेल में। मामले जब अदालतों तक पहुंचे तो सारे झूठे साबित हुए।

इसके बाद जब प्रधानमंत्री को महामारी की गंभीरता समझ में आई तो चार घंटों की मोहलत देकर पूर्णबंदी लगा दिया उन्होंने इक्कीस दिनों के लिए देश भर में। इसमें हमने उनके कहने पर कई अजीब चीजें कीं। एक दिन तालियां और थालियां बजाईं तो एक दिन नौ अप्रैल को नौ बजे नौ मिनट के लिए हमने दिए जलाए थे। जब वैसे भी देश के ज्यादातर लोग अर्ध-शिक्षित और वहमी हैं तो ऐसा करने से क्यों न उनको लगे कि ईश्वर हमारे ऊपर रहम जरूर करेगा।

कुछ महीनों के लिए ईश्वर मेहरबान रहे भी और कोरोना की पहली लहर ने इतना कम नुकसान किया भारत में जान का कि हमको लगा कि हम जीत गए और करोना हार गया। प्रधानमंत्री ने जीत की घोषणा जनवरी में की भी और दरियादिली दिखा कर टीकों का निर्यात अस्सी देशों को किया।

टीकों की गंभीर कमी का पता लगा तो ‘टीकाकरण उत्सव’ मनाने का संदेश दे दिया। लेकिन न कुंभ के मेले को रोका गया और न ही उनकी बड़ी-बड़ी चुनाव सभाएं रोकी गईं। इसलिए आम लोगों को संदेश यही गया कि पिछली बार की तरह इस बार भी कुछ नहीं होने वाला है। अचानक जब ‘तूफान’ आया और हाल यह हुआ कि अब दुनिया का सबसे ज्यादा संक्रमित देश भारत बन गया है तो भारत सरकार के मंत्रियों ने दोष डालने की कोशिश की राज्य सरकारों पर। पूछने लगे कि तैयारी क्यों नहीं की गई पहले से। आॅक्सीजन और टीकों की कमियां क्यों हैं?

जब तक भारतीय जनता पार्टी शासित राज्यों में बेहाल अस्पताल और श्मशान नहीं दिखने लगे, केंद्र सरकार के मंत्री और भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता चिलाते रहे कि विपक्षी राजनेता ‘पॉलिटिक्स’ खेल रहे हैं ऐसे समय जब संकट की घड़ी है देश के लिए। क्या जवाबदेही मांगना केंद्र सरकर से सियासत है? अगर है तो विनम्रता से मैं अर्ज करना चाहती हूं कि इस खेल को मैं भी खेलना चाहूंगी पूरी हिम्मत से। इस खेल में हम सबको शामिल होना चाहिए, क्योंकि हम जिस बुरे समय से गुजर रहे हैं उसका सारा दोष अगर जाता है किसी को तो केंद्र सरकार को। उनके संवेदनहीन अहंकारी अधिकारियों को।

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