ताज़ा खबर
 

अमन की सूरत

पाकिस्तान के आम लोग दिल से चाहते हैं कि भारत के साथ दोस्ती हो जाए, ताकि आसानी से दोनों देशों के बीच आना-जाना रहे और आर्थिक रिश्ता मजबूत बने। ऐसा कहने के बाद लेकिन जिनसे भी बातें हुई हैं उन्होंने हमेशा यह भी कहा है कि ऐसा तभी हो सकता है, जब कश्मीर समस्या का हल हो जाएगा।

Indo pakभारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एवं पाकिस्‍तान के प्रधानमंत्री इमरान खान आपस में बातचीत करते हुए। फाइल फोटो।

एक अरसे बाद पाकिस्तान और भारत के बीच अमन-शांति के हल्के, धुंधले आसार दिखने लगे हैं। दोनों प्रधानमंत्रियों ने एक-दूसरे को पत्र लिखे हैं, जिनमें एक बार फिर बातचीत शुरू करने की आशा व्यक्त की है। कुछ दिनों के लिए पाकिस्तान ने भारत से कपास और शक्कर खरीदने की इच्छा जताई, लेकिन फिर बीच में आ गई वही पुरानी अनुच्छेद 370 की बात। जबसे भारत की संसद में अनुच्छेद 370 को रद्द किया गया 5 अगस्त, 2019 को तबसे पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने दुनिया में भारत के खिलाफ मुहिम चलाई यह साबित करने के लिए कि जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा हटाने के पीछे भारत की नीयत थी ऐसा दिखाना कि कश्मीर भारत का अटूट अंग बन गया है।

सच तो यह है कि जो विशेष प्रावधान थे अनुच्छेद 370 के, उनको धीरे-धीरे वैसे भी हटाने का काम किया गया है दशकों से, सो असली बदलाव सिर्फ यह आया है कि इस पूर्ववर्ती राज्य के दो हिस्से कर दिए गए हैं और उससे राज्य का दर्जा भी हटा दिया गया है। मेरी अपनी राय है कि हमारे इस इकलौते मुसलिम बहुल प्रांत को फिर से राज्य बना देना चाहिए, ताकि कश्मीरियों को थोड़ी-बहुत तसल्ली मिले, लेकिन मेरी राय यह भी है कि अगर पाकिस्तान के साथ फिर से वार्ता शुरू होती है, तो हमारी तरफ से स्पष्ट कर देना चाहिए कि कश्मीर की समस्या हमारी है, उनकी नहीं। इस पर आइंदा कोई बात नहीं होगी। बहुत बार बातचीत हुई है पाकिस्तान के साथ, लेकिन इस बात को चूंकि भारत के प्रवक्ता कभी साफ शब्दों में कहते नहीं हैं, इसलिए पाकिस्तान के राजनेता अपने लोगों को गुमराह करते रहते हैं कश्मीर लेकर रहने के झूठे वादे करके।

मैं जब भी पाकिस्तान गई हूं, मेरी कोशिश रही है लाहौर और कराची के गली-कूचों में घूम कर उन लोगों से बातें करने की, जिनकी आवाज अक्सर भारतीय पत्रकारों को सुनने को नहीं मिलती है। जब भी मैंने ऐसा किया है, पाया यही है कि पाकिस्तान के आम लोग दिल से चाहते हैं कि भारत के साथ दोस्ती हो जाए, ताकि आसानी से दोनों देशों के बीच आना-जाना रहे और आर्थिक रिश्ता मजबूत बने। ऐसा कहने के बाद लेकिन जिनसे भी बातें हुई हैं उन्होंने हमेशा यह भी कहा है कि ऐसा तभी हो सकता है, जब कश्मीर समस्या का हल हो जाएगा। मैंने जब उनसे पूछा कि हल कैसा हो सकता है, तो जवाब मिला है कि कश्मीर को पाकिस्तान का हिस्सा बनाना ही समाधान है। उनके राजनेता जानते हैं कि ऐसा कभी होगा नहीं, लेकिन कह नहीं सकते हैं इस बात को, क्योंकि पिछले सत्तर वर्षों से कहते आए हैं कि भारत और पाकिस्तान में अमन-शांति तभी कायम होगी, जब कश्मीर पाकिस्तान का हिस्सा बन जाएगा।

रही हमारी बात, तो हम जानते हैं कि असली रोड़ा अगर है कोई तो वह है जिहादी आतंकवाद। मुद्दा सिर्फ कश्मीर का होता तो 2008 में हमला मुंबई पर क्यों करवाया गया? सबूत हैं ढेर सारे कि अजमल कसाब और उसके नौ साथी सिर्फ प्यादे थे, जिनको चलाया जा रहा था पाकिस्तान में बैठे ऐसे लोगों द्वारा जिनका सीधा संपर्क था पाकिस्तान की सेना के साथ। सबूत सिर्फ हमने नहीं, अमेरिका ने भी पाकिस्तान के राजनेताओं और जरनैलों को दिए हैं। अमेरिका की किसी जेल में कैद है डेविड हेडली, जिसने मुंबई पर हमले का विस्तार से ब्योरा दिया है। इसके अलावा सबूत हैं वे रिकार्ड की गईं सेलफोन पर बातें कसाब और उनके साथियों की अपने आकाओं के साथ। लेकिन पाकिस्तान के प्रधानमंत्री आए हैं और गए हैं, और अब भी कहते रहते हैं कि असली समस्या सिर्फ कश्मीर है। इमरान खान तो इस हद तक गए थे अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद कि उन्होंने बार-बार कहा कि वे अपने आप को कश्मीर का राजदूत मानते हैं।

इसलिए अब अगर बातचीत का एक नया दौर शुरू होता है, तो कितनी दूर तक जाएगी यह बातचीत? मोदी सरकार की समस्या यह भी है कि हिंदुत्व की विचारधारा का प्रचार विस्तार से करने के प्रयास में उन्होंने पाकिस्तान को निशाना बनाया है इतना कि ऐसा कोई मोदी भक्त नहीं मिलेगा आपको जो पाकिस्तानी शब्द इस्तेमाल न करता हो गाली कि तरह। भक्तों को छोड़िए, भारत के गृहमंत्री ने भी कई बार कहा है कि शाहीनबाग में जो महिलाएं विरोध कर रही थीं नागरिकता कानून का, वे पाकिस्तान के इशारों पर कर रही थीं। भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता भी जब किसी को गाली देना चाहते हैं तो उसको पाकिस्तानी कहते हैं। ऐसे माहौल में कैसी होगी बातचीत?

ऊपर से यह भी पूछना जरूरी है कि इस समय क्यों बातचीत शुरू करने की नौबत आई है। क्या इसलिए कि चीन ने जो पिछले साल लद्दाख में हमला किया था उससे नरेंद्र मोदी और उनके सलाहकारों को चिंता होने लगी है कि हम इन दोनों दुश्मनों के खिलाफ एक साथ युद्ध करने के काबिल नहीं हैं? ऐसा मानते हैं कई सुरक्षा विशेषज्ञ। कारण जो भी हो, अगर अमन-शांति बहाल होने के आसार दिखने लगे हैं तो अच्छी बात है, धुंधले और दूर क्षितिज पर ही सही। इस पुरानी दुश्मनी के कारण न पाकिस्तान के शासक अपने लोगों को बुनियादी सुविधाएं- रोटी, कपड़ा, मकान, रोजगार- दे सके हैं और न ही हमारे शासक। हमसे आगे निकल सकता है बांग्लादेश अगर हम अपनी समस्याओं का समाधान नहीं ढूंढ़ पाएंगे।

पिछले सप्ताह जब मोदी बांग्लादेश गए थे तो ढाका की तस्वीरें देख कर मैं हैरान रह गई। मेरा वहां जाना हुआ था कोई तीस साल पहले, जब यह शहर एक विशाल झुग्गी-बस्ती जैसा दिखता था। आज एक सुंदर, आधुनिक महानगर बन गया है। ऐसा परिवर्तन न पाकिस्तान के किसी शहर में दिखता है न भारत में।

Next Stories
1 मोदी विचार और इसका खमियाजा
2 कितने पाकिस्तान
3 कउवा यज्ञ
ये पढ़ा क्या?
X