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ये वो सहर तो नहीं

गंभीर समस्याएं और भी हैं। हमारे बच्चों के लिए अभी तक ऐसे स्कूल नहीं हैं, जिनको दुनिया के अच्छे स्कूलों में गिना जाए। कोविड के बावजूद अभी तक देश की स्वास्थ्य सेवाएं न आधुनिक हैं और न काफी हैं। आज भी जब कोई महामारी दस्तक देती है, तो वही पुराने दृश्य देखने को मिलते हैं अस्पतालों में, जो हम पिछले पचहत्तर सालों से देखते आए हैं।

ये वो सहर तो नहीं
Independence Day: भारत अपनी आजादी का जश्न मना रहा है। देश की आजादी के लिए ना जाने कितने रणबांकुरों ने अपने प्राणों की आहुति दी। भारत की ही तरह उसके पड़ोस के कई देशों ने अपनी आजादी के लिए लंबा संघर्ष किया। आइए डालते हैं भारत के पड़ोसी देशों की आजादी के नायकों पर एक नजर:

‘ये दाग-दाग उजाला, ये शब-गजीदा सहर, वो इंतिजार था जिसका ये वो सहर तो नहीं।’ हर साल पंद्रह अगस्त का दिन जब करीब आता है तो कोई न कोई फैज अहमद फैज की इन पंक्तियों को याद करता है, जिनको उन्होंने ‘सुबह-ए-आजादी’ नाम की नज्म में 1947 में लिखा था।

इस साल उनके शब्दों से मैंने ये लेख की शुरुआत इसलिए की है, क्योंकि आजादी के इस अमृत महोत्सव में भी वह सहर नहीं आई है, जिसके लिए इतने लोगों ने संघर्ष किया था, इतनी कुर्बानियां दी थीं। अफसोस के साथ, शर्म से सिर झुका कर स्वीकार करना पड़ता है कि आज भी भारत की गिनती है दुनिया के सबसे गरीब और पिछड़े देशों में।

मेरी न मानें, लेकिन प्रधानमंत्री मोदी की बात तो आपको माननी पड़ेगी। जिस दिन हमने पिछले हफ्ते भारत छोड़ो आंदोलन दिवस मनाया, उस दिन प्रधानमंत्री ने याद दिलाया अपने भाषण में कि हमको अब गरीबी को भारत छोड़ने के लिए लड़ाई लड़नी होगी, गंदगी को भारत छोड़ने के लिए लड़ाई लड़नी होगी, खुले में शौच करने की बुरी आदत को भारत छोड़ने के लिए लड़ाई लड़नी होगी, भ्रष्टाचार को भारत छोड़ने के लिए लड़ाई लड़नी होगी।

मोदी ने ये सब स्पष्ट शब्दों में स्वीकार किया, सो प्रधानमंत्री आपको सलाम। शायद वे पहले प्रधानमंत्री हैं इस देश के, जिन्होंने ऐसी बातों की तरफ हमारा ध्यान दिलाया है, जिनको अक्सर हमारे बड़े राजनेता बहुत छोटी, मामूली चीजें मानते हैं, लेकिन इन चीजों की अहमियत देश की सुरक्षा से कम नहीं है।

भारत का असली अमृत महोत्सव तब मनेगा, जब गरीबी, गंदगी, भ्रष्टाचार के खिलाफ हम लड़ाई जीतेंगे। अभी तक अगर जीते नहीं हैं, तो इसलिए कि पुराने जमाने के राजनेताओं के पांव कभी जमीन पर उतरते नहीं थे। उनको नहीं दिखा कि उनको शर्मिंदा होना चाहिए कि पीने के पानी जैसी जीवन की सबसे जरूरी चीज भी हम अपने लोगों को नहीं दे पाए हैं स्वतंत्रता के इतने सालों बाद।

अगर दुनिया के बाकी देशों में इस गंभीर समस्या का समाधान मिल चुका है तो भारत में क्यों नहीं? कड़वा सच यह है कि ऐसा सिर्फ इसलिए हुआ है, क्योंकि हमारे नेताओं ने इन चीजों की तरफ ध्यान दिया ही नहीं है। गरीबी हटाओ का नारा हमने पहले सुना था चालीस साल पहले, जब इंदिरा गांधी ने इस नारे के बल पर लोकसभा में पूर्ण बहुमत हासिल किया था। नारा अच्छा था, लेकिन नारा ही रहा है अभी तक।

मोदी के भक्तों में अब मेरी गिनती नहीं है, लेकिन इसके बावजूद स्वीकार करती हूं कि मोदी पहले प्रधानमंत्री हैं, जिन्होंने गरीबी हटाने के लिए गरीबों को औजार देने का प्रयास किया है। गरीबी हटी नहीं है अगर तो कम से कम वे औजार दिए हैं, जिनसे गरीबी हटने की संभावना है। बैंकों में खाते तकरीबन अब भारत के हर नागरिक के खुल गए हैं। गरीबों के लिए सीधा पहुंचता है राहत का पैसा।

कोविड के दौर में हर गरीब के घर में मुफ्त राशन पहुंचाने का काम हुआ और बिजली-पानी की पुरानी समस्याओं का भी हल ढूंढ़ने का पूरा प्रयास हुआ है और हो भी रहा है। मगर गंभीर समस्याएं और भी हैं। हमारे बच्चों के लिए अभी तक ऐसे स्कूल नहीं हैं, जिनको दुनिया के अच्छे स्कूलों में गिना जाए। कोविड के बावजूद अभी तक देश की स्वास्थ्य सेवाएं न आधुनिक हैं और न काफी हैं।

आज भी जब कोई महामारी दस्तक देती है, तो वही पुराने दृश्य देखने को मिलते हैं अस्पतालों में, जो हम पिछले पचहत्तर सालों से देखते आए हैं। तीन-तीन मरीज एक पलंग पर लेटे हुए या मैले फर्शों पर। अस्पतालों के बाहर वही लंबी कतारें और अस्पतालों के शौचालयों में इतनी गंदगी कि सेहतमंद आदमी भी बीमार हो जाए।

इन पचहत्तर वर्षों में कई देश, जो हमसे गरीब थे, हमसे इतना आगे निकल गए हैं कि देख कर हैरान रह जाते हैं मेरे जैसे लोग। दो देश ऐसे हैं, जिनकी तरक्की मैंने अपनी आंखों से देखी है। एक है थाईलैंड और दूसरा दुबई। पहली बार जब मैंने ये देश देखे थे अस्सी के दशक में तो हमसे पिछड़े थे।

बैंकाक के मुकाबले मुंबई वास्तव में न्यूयार्क दिखता था। दुबई उस समय एक छोटा-सा मछुवारों का शहर था, जिसकी खासियत थी कि यह तस्करों का अड्डा हुआ करता था। आज दुबई या बैंकाक जैसा एक भी शहर भारत में नहीं है। मैंने कई बार अपने से सवाल पूछा है कि इन देशों की तरक्की का राज क्या है, तो जवाब एक ही मिलता है, उनके राजनेताओं ने उन ‘छोटी’ चीजों पर बहुत ध्यान दिया है, जिनको हमारे राजनेताओं ने दशकों तक अनदेखा किया है।

आज भी हमारी राज्य सरकारें और केंद्र सरकार कारोबार करने पर ज्यादा ध्यान देती हैं, शायद इसलिए कि इन चीजों से बनते हैं वे पैसों के ढेर, जो हमने हाल में बंगाल के उस मंत्री के दोस्त के घर में देखे थे। ऐसा अगर आज भी हो रहा है, तो शायद इसलिए कि मोदी भूल गए हैं वह बात, जो कभी कहा करते थे प्रधानमंत्री बनने से पहले, यानी सरकार का काम बिजनेस करना नहीं है।

इस बात को उन्होंने याद रखा होता तो आज मुमकिन है कि बेरोजगारी की जो अति-गंभीर समस्या है देश भर में, शायद न होती, क्योंकि निजी उद्योग के क्षेत्र में ही अब क्षमता है रोजगार पैदा करने की। सरकारी नौकरियां अब उन्हीं क्षेत्रों में पैदा होनी चाहिए, जिनका लक्ष्य है जनता के लिए वे बुनियादी सेवाएं उपलब्ध कराना, जो अभी उपलब्ध नहीं हुई हैं। अफसोस की बात है कि इस पंद्रह अगस्त को भी याद आएंगे फैज के वे शब्द। ‘वो इंतिजार था जिसका ये वो सहर तो नहीं’।

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