सच क्या है और झूठ क्या

ऑक्सीजन की कमी से लोग मरे थे अस्पतालों में, हम सब जानते हैं। हमने घर बैठे अपने टीवी पर देखी थीं वे दिल दहलाने वाली तस्वीरें, जिनमें लोग घुट-घुट कर दम तोड़ रहे थे अस्पतालों के दरवाजों पर। भुलाना मुश्किल है उनके परिजनों का दर्द, जब ऑक्सीजन सिलिंडर के देर से मिलने के कारण उनके मां या पिता, भाई या बहन अस्पतालों के आइसीयू में सांस न ले पाने की वजह से मरे थे।

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आधुनिक लोकतंत्र में तकनीक को एक वरदान के रूप में देखा जा रहा था। लेकिन धीरे-धीरे बाजार के एकाधिकार के जरिए तकनीक पर भी कब्जा बढ़ता गया।

जब शासक सत्य से डरने लगते हैं तो अक्सर असत्य का सहारा लेते हैं। कुछ ऐसा ही हो रहा है इन दिनों अपने भारत महान में। सच से इतना डरने लगे हैं हमारे शासक कि न सिर्फ उससे मुंह मोड़ रहे हैं, उसको पूरी तरह दफनाने की मुहिम शुरू हो गई है। जिस अखबार ने कोविड की दूसरी लहर में सत्य पर रोशनी डालने का सबसे ज्यादा प्रयास किया, उनके दफ्तरों में पिछले सप्ताह पहुंच गए भारत सरकार के टैक्स वाले। ऐसा पहली बार नहीं हुआ है नरेंद्र मोदी के राज में। दैनिक भास्कर तो बहुत बड़ा अखबार है, बहुत ताकतवर है, तो उसको सच बोलने के लिए दंडित करना थोड़ा-बहुत समझ में आता है। लेकिन कई छोटे-मोटे डिजिटल मीडिया वालों के साथ भी ऐसा हुआ है, ताकि संदेश जाए स्पष्ट शब्दों में मीडिया को कि सत्य वही है, जो सरकार कहे।

ऑक्सीजन की कमी से लोग मरे थे अस्पतालों में, हम सब जानते हैं। हमने घर बैठे अपने टीवी पर देखी थीं वे दिल दहलाने वाली तस्वीरें, जिनमें लोग घुट-घुट कर दम तोड़ रहे थे अस्पतालों के दरवाजों पर। भुलाना मुश्किल है उनके परिजनों का दर्द, जब ऑक्सीजन सिलिंडर के देर से मिलने के कारण उनके मां या पिता, भाई या बहन अस्पतालों के आइसीयू में सांस न ले पाने की वजह से मरे थे। भुलानी मुश्किल हैं वे कतारें ऑक्सीजन केंद्रों के बाहर, जिनमें घंटों तक इंतजार कर रहे थे लोग और उनकी बारी आने तक ऑक्सीजन खत्म हो जाया करता था। लेकिन संसद में जब पिछले हफ्ते मंत्रीजी से पूछा गया ऑक्सीजन के अभाव के बारे में, तो जवाब मिला कि किसी राज्य सरकार से ऑक्सीजन के अभाव के कारण मौतें होने की कोई शिकायत नहीं मिली है। तो क्या भारत सरकार के अधिकारी अंधे थे?

भारत के कोविड आंकड़ों पर अब दुनिया को शक होने लगा है। भारत सरकार के आंकड़ों के मुताबिक कोविड से मौतें चार लाख के करीब हुई हैं। लेकिन जब हॉर्वर्ड विश्वविद्यालय ने अपनी तरफ से जांच की, तो उन्होंने पाया कि कम से कम चार करोड़ मौतें हुई होंगी कोविड से, इसलिए कि आमतौर पर जितनी मौतें होती हैं अपने देश में उनसे कम से कम इतनी मौतें ज्यादा हुई हैं। भारत सरकार की तरफ से जवाब अभी तक यही मिला है कि ये सब झूठ है। भारत की छवि खराब करने की अंतरराष्ट्रीय साजिश है। यह ‘साजिश’ चल रही है तबसे जब विदेशी अखबारों में छपी थीं गंगा किनारे अर्ध-दफनाई हुई लाशों और श्मशानों में दिन-रात जलती चिताओं की तस्वीरें। मोदी भक्त इन दिनों कहने लगे हैं कि यह ‘साजिश’ हिंदुओं के खिलाफ है, इसलिए कि उनके विदेशी दोस्त उनसे पूछते हैं कि कोविड से सिर्फ हिंदू क्यों मरे हैं, मुसलमान क्यों नहीं। एक भक्त ने ट्वीट किया कि उसने जब अपने दोस्त से पूछा कि ऐसा क्यों कह रहा है, तो उसने जवाब दिया कि उसने सिर्फ श्मशानों की तस्वीरें देखी थी, कब्रस्तानों की नहीं।

जब इन सब चीजों के बाद मालूम हुआ कि पेगासस नामक एक डिजिटल जासूसी ऐप द्वारा कई जाने-माने भारतीय पत्रकारों और अन्य हस्तियों के फोन हैक किए गए हैं, तो गृहमंत्री ने फिर से उस तथाकथित अंतरराष्ट्रीय साजिश पर दोष डाला। कहा मंत्रीजी ने कि इस साजिश का खुलासा जानबूझ कर संसद के इस सत्र के एक दिन पहले हुआ था, तो इससे साबित होता है कि भारत के खिलाफ कितनी बड़ी साजिश हो रही है। मंत्रीजी को शायद जानकारी नहीं थी कि कई देशों में पेगासस का असर दिखा है और इस जासूसी पर सवाल कई विदेशी सरकारें भी उठा रही हैं।

गृहमंत्री के बाद बयान आया प्रधानमंत्री का। मोदी ने अपने सांसदों को संबोधित करते हुए आदेश दिया उन्हें कि उनका फर्ज बनता है आम लोगों के बीच जाकर विपक्ष के ‘झूठे’ प्रचार का जवाब देना। लोगों को समझाना है कि सब कुछ ठीक चल रहा है देश में, लेकिन मोदी को बदनाम करने के लिए बहुत बड़ी साजिश चल रही है विपक्ष की तरफ से। मैंने जब इस बयान को सुना तो यकीन हो गया कि ठान लिया है प्रधानमंत्री ने यह साबित करने का कि उनकी सरकार ने कोई भी गलती नहीं की है कोविड के दूसरे भयानक दौर में। न ऑक्सीजन की कोई कमी रही, न ज्यादा लोग मरे, न गंगाजी के किनारे लाशें दफनाई गई थीं, न गांवों में कोविड फैला था। यह सब झूठा प्रचार है।

तो फिर दैनिक भास्कर के दफ्तरों पर क्यों छापे पड़े पिछले सप्ताह? क्या इसलिए नहीं कि हिंदी अखबारों में इस अखबार ने सबसे ज्यादा प्रयास किया था कोविड की तबाही को दिखाने का? क्या इसलिए नहीं कि अस्पतालों में अव्यवस्था की सबसे ज्यादा आलोचना इस अखबार में दिखी? आयकर विभाग के छापे अक्सर हथियार की तरह इस्तेमाल करने लगी है भारत सरकार। दैनिक भास्कर के अलावा कई अन्य मीडिया वाले निशाने पर रहे हैं, जबसे कोविड के दौर ने मोदी के ‘अच्छे दिनों’ को बुरे दिनों में तब्दील किया है। पहले दौर में जब अचानक बंदी के कारण लाखों प्रवासी मजदूर अपने गांवों तक पैदल जाने पर मजबूर हुए, तो उस समय भी भारत सरकार ने अपनी कोई गलती नहीं स्वीकार की थी। दूसरे दौर में जब हजारों लोग मरने लगे, तो उसको भी स्वीकार नहीं किया जा रहा है। टीकों का गंभीर अभाव जब सामने आया तो इसको भी स्वीकार करने को तैयार नहीं है भारत सरकार।

सब झूठा प्रचार है जी, मोदी को बदनाम करने के लिए। सो, सच क्या है और झूठ क्या, शायद जनता इतनी भोली है कि समझ नहीं पाएगी। मालूम पड़ेगा अगले साल जब उत्तर प्रदेश में चुनाव होंगे।

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