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वक्त की नब्ज: उसकी बात क्या जो है ही नहीं

रिहाना पर इतनी चर्चाएं और इतनी आलोचनाएं सुनने को मिलीं कि जिन भारतीयों ने इस गायिका का नाम तक नहीं सुना होगा कभी, वे भी जान गए कि इस नाम की एक गायिका है। इतनी चर्चाएं अगर हमने किसानों की समस्याओं पर की होती तो अब तक शायद दिल्ली की सीमाओं पर उनका महीनों लंबा विरोध प्रदर्शन समाप्त हो चुका होता।

Farmers protestशनिवार को मुंबई में आंदोलनकारी किसानों के समर्थन में रैली करते लोग।

आत्मनिर्भर, आत्मविश्वास, आत्मसम्मान जैसे शब्दों से मुझे कुछ समय से डर-सा लगने लगा है। जैसे ये कोई कमजोरी छिपा रहे हों। शायद इसलिए कि ऐसे शब्द पहले सुनने में आए प्रधानमंत्री से, जब पहले लॉकडाउन में लाखों की तादाद में प्रवासी मजदूर शहरों से अपने गांवों तक पैदल जाने के लिए मजबूर हुए थे। रेल और बस सेवाएं बिल्कुल बंद हो गई थीं चार घंटों के भीतर।

सो, कोई और चारा न था अचानक बेरोजगार और बेघर हुए इन लोगों के लिए। मोदी सरकार की छवि को इससे बहुत नुकसान पहुंचा था, बावजूद इसके कि उनके भक्तों और सरकारी प्रवक्ताओं ने यह कहना शुरू कर दिया था कि ‘मोदी न होते तो भारत में लाशों के ढेर होते’। इसके बाद जब पहली बार प्रधानमंत्री दिखे राष्ट्र को संबोधित करते हुए तो ‘आत्मनिर्भर’ शब्द उन्होंने बहुत बार अपने भाषण में कहा। इस शब्द से पैदा हुए हैं वे अन्य शब्द, जो इन दिनों बहुत सुनने को मिलते हैं राजनीतिक या आर्थिक मुद्दों की जब भी बात होती है।

पिछले सप्ताह लेकिन ये सारे शब्द बेमतलब से हुए, जब रिहाना नाम की मशूहर गायिका ने एक ट्वीट में हमारे देश के किसानों का समर्थन जताया सिर्फ यह कहते हुए कि इस पर हम बात क्यों नहीं कर रहे हैं। ट्वीट में तस्वीर थी दिल्ली की सीमाओं पर विरोध करते हुए किसानों की। रिहाना का नाम शायद निन्यानबे फीसद भारतीय जानते ही नहीं हैं, लेकिन इस ट्वीट का फौरन जवाब आया विदेश मंत्रालय से इतने तीखे शब्दों में जैसे कि वह एक गायिका न होकर विश्व के किसी शक्तिशाली देश की प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति हो।

इस गायिका के ट्वीट ने इतनी तकलीफ दी भारत सरकार को कि बुधवार की शाम तक सचिन तेंदुलकर और लता मंगेशकर जैसी जानीमानी हस्तियों ने ट्वीट करके रिहाना को डांटना शुरू कर दिया। संदेश एक ही था : भारत के अंदरूनी मामलों में किसी को अधिकार नहीं है हस्तक्षेप या बयानबाजी करने का। इसके बाद रिहाना के खिलाफ गृहमंत्री खुद मैदान में उतरे, जैसे कि इस गायिका ने भारत पर उसी तरह हमला किया हो जैसे चीन ने किया है।

क्या ऐसा करके इन सब मोदी समर्थकों ने यह साबित नहीं किया है कि आत्मविश्वास, आत्मसम्मान और आत्मनिर्भर शब्द सब खोखले हैं? जिन देशों में इन शब्दों का वास्तव में मतलब होता है उनके राजनेता कभी इन शब्दों का प्रयोग नहीं करते हैं, इसलिए कि ऐसा करने की उनको आवश्यकता नहीं महसूस होती है। उनकी शक्ति आती है उनके आर्थिक, सैनिक, राजनीतिक उपलब्धियों से। वे जानते हैं यह भी कि इंटरनेट ने विश्व की दूरियां इतनी कम कर दी हैं कि साबित हो गया है कि सारा विश्व अब वास्तव में ‘वसुधैव कुटुंबम्’ बन गया है।

सो, जब अमेरिका के संसद पर ट्रंप के समर्थकों ने आक्रमण किया था पिछले महीने, दुनिया के तमाम अखबारों में इसकी चर्चा और आलोचना हुई। भारत में शायद ही ऐसा कोई अखबार या टीवी चैनल रहा होगा, जिसमें इस घटना का वर्णन और तस्वीरें न दिखी हों। किसी भी अमेरिकी राजनेता या सिलेब्रिटी ने जरूरत नहीं समझी भारत के खिलाफ बयानबाजी करने की। किसी ने नहीं कहा कि यह अमेरिका का अंदरूनी मामला है, सो इसमें किसी दूसरे देश के लोग दखल नहीं दे सकते हैं। ऐसा नहीं हुआ, इसलिए कि अमेरिका में आत्मविश्वास और आत्मसम्मान इतना है कि इसका जिक्र करने की न वहां के नागरिकों को जरूरत दिखती है और न राजनेताओं को।

हम हैं कि एक गायिका के बयान से इतने अपमानित हुए कि रिहाना पर इतनी चर्चाएं और इतनी आलोचनाएं सुनने को मिलीं कि जिन भारतीयों ने इस गायिका का नाम तक नहीं सुना होगा कभी, वे भी जान गए कि इस नाम की एक गायिका है। इतनी चर्चाएं अगर हमने किसानों की समस्याओं पर की होती तो अब तक शायद दिल्ली की सीमाओं पर उनका महीनों लंबा विरोध प्रदर्शन समाप्त हो चुका होता।

मोदी सरकार की समस्या यह है कि भारतीय मीडिया पर उनका नियंत्रण इतना पक्का हो गया है पिछले सात सालों में कि उनमें आलोचना सुनने की शक्ति ही नहीं रही है। जब भी विदेशों से आलोचना सुनने को मिलती है, उनकी प्रतिक्रिया यही होती है कि अंतरराष्ट्रीय षड्यंत्र हो रहा है हमारे खिलाफ। भारतीय जनता पार्टी के जानेमाने प्रवक्ताओं ने खुल कर कहा टीवी पर कि रिहाना का वास्ता खालिस्तनी लोगों से है।

रिहाना ऐसी छाई रही भारत में पिछले सप्ताह कि बहुत कम लोगों ने पंजाब के मुख्यमंत्री के उस बयान पर ध्यान दिया, जिसमें उन्होंने कहा था कि किसानों का आंदोलन शीघ्र समाप्त करने की गंभीर आवश्यकता है, इसलिए कि पाकिस्तान अभी से ड्रोन द्वारा हमारे पंजाब में असलहा और प्रचार के साधन भेजने की बदमाशी कर रहा है। समझ में नहीं आता कि प्रधानमंत्री को क्यों नहीं दिख रहा है अभी तक कि समाधान उनके सामने है।

कृषि कानून वापस लेने से अगर उनके आत्मसम्मान को चोट पहुंचती है, तो उनको किसी संसदीय समिति के पास क्यों नहीं भेज देते, किसानों को आश्वस्त करके कि उनकी सहमति और उनके सुझावों के बाद ही ये दोबारा सामने आएंगे?

पिछले सप्ताह साबित जो हुआ है वह यह कि भारत सरकार को अपने लोगों से बात करने में तकलीफ है, लेकिन विदेशी लोगों से नहीं। साबित यह भी हुआ है कि मीडिया पर कड़ा नियंत्रण रखने का सबसे बड़ा खतरा शासकों को होता है, आम नागरिकों को नहीं। किसानों के आंदोलन को लेकर शुरू से मीडिया ने सरकार का पक्ष लिया है, सो अंधा कर दिया है भारत सरकार को। प्रधानमंत्री को दिखता नहीं है कि उनकी छवि को किसानों के इस आंदोलन ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कितना नुकसान किया है।

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