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चुनाव खर्च में समोसों की चिंता

अब हर राजनेता की समस्या यह है कि जिनसे पैसे लेते हैं चुनाव लड़ने के लिए उनको जीतने के बाद खुश रखना भी पड़ता है। सो, जीतने के बाद कई राजनेताओं का पहला काम होता है पैसा बनाना।

तस्वीर का इस्तेमाल प्रस्तुतिकरण के लिए किया गया है। (एक्सप्रेस प्रतीकात्म्क फोटो)

आदेश है उत्तर प्रदेश के चुनावों में प्रत्याशियों को कि सुबह के नाश्ते पर उनका खर्च सैंतीस रुपए से ज्यादा नहीं होना चाहिए। समोसे खाने का जी करे तो छह रुपए से ज्यादा अगर खर्चते हैं, तो मुश्किल हो सकती है। रही बात प्रचार के लिए गाड़ियों को किराए पर लेने की, तो यहां भी जिला चुनाव अधिकारियों ने तय कर लिया है कि कितना खर्चा होगा। स्थानीय देसी गाड़ियों पर कितना और विदेशी गाड़ियों पर कितना। मैंने जब इस सूची को पढ़ा पिछले हफ्ते, तो समझ में नहीं आया कि हंसूं या रोऊं।

ऐसा कह रही हूं इसलिए कि बहुत सारे चुनावों को देखने के बाद एक चीज जो मेरे लिए बिलकुल स्पष्ट हो गई है तो यह कि चुनाव आयोग चाहे जितना भी खर्चा कम करने के लिए उसूल बनाए, उससे कहीं ज्यादा खर्चते हैं चुनावों में भाग लेने वाले प्रत्याशी। न इस खर्चे पर चुनाव आयोग कोई पाबंदी लगा पाया है अभी तक और न ही राजनीतिक दलों के आला अधिकारी। राजनीतिक दलों से जो पैसा मिलता है प्रत्याशियों को, वह इतना कम होता है कि हर प्रत्याशी का आधा समय जाता है अपने अमीर दोस्तों से पैसा बटोरने में।

नरेंद्र मोदी की लाख कोशिशों के बाद भी यह पैसा सारा का सारा ‘ब्लैक’ होता है और नकद में रखा जाता है। कोई इत्तेफाक नहीं है कि चुनाव जब पास आते हैं तो अचानक ईडी (प्रवर्तन निदेशालय) को याद आता है कि विपक्षी राजनेताओं के घरों में छापे डालने की जरूरत है। पिछले सप्ताह पंजाब के मुख्यमंत्री के रिश्तेदारों के घरों में जब छापे पड़े, तो उन्होंने शिकायत खुल कर की कि ऐसा किया जा रहा है राजनीतिक मकसद से, आर्थिक मकसद से नहीं। मेरे दोस्तों में कई राजनेता हैं, सो कह सकती हूं बेझिझक कि इनमें से जो सबसे ईमानदार हैं उनको भी ‘ब्लैक मनी’ या कालाधन कहीं न कहीं से ढूंढ़ निकालना पड़ता है चुनाव लड़ने के लिए।

अब हर राजनेता की समस्या यह है कि जिनसे पैसे लेते हैं चुनाव लड़ने के लिए उनको जीतने के बाद खुश रखना भी पड़ता है। सो, जीतने के बाद कई राजनेताओं का पहला काम होता है पैसा बनाना। नरेंद्र मोदी जब प्रधानमंत्री बने थे, तो उन्होंने राजनीति में भ्रष्टाचार समाप्त करने की कसम खाई थी यह कहते हुए कि ‘न खाऊंगा न खाने दूंगा’। समस्या उनकी यह है कि जितने भी नेक उनके इरादे होंगे, वे जानते हैं अच्छी तरह कि उनके दल के हर सांसद, विधायक ने काले धन के बल पर चुनाव लड़ा है। कोई दूसरा तरीका है ही नहीं, इसलिए कि शान से जो प्रत्याशी घूमते नहीं हैं चुनाव प्रचार करने के लिए, उनकी तरफ मतदाता देखते ही नहीं हैं।

सो, बड़ी-बड़ी गाड़ियों के काफिले जरूरी होते हैं, जरूरी होते हैं अपने साथ कई सारे कार्यकर्ता लेकर चलना और दिन भर उनके खाने-पीने का बंदोबस्त करना। इसके बाद आता है खर्चा आम सभाओं का, जो ओमीक्रान के इस काल में भी इतनी बड़ी होती हैं कि जब प्रधानमंत्री या कोई दूसरी बड़ी हस्ती आती है प्रचार करने तो ‘जन सैलाब’ नहीं दिखता है, तो शायद बिना भाषण दिए ही खिसक जाते हैं। जन सैलाब के लिए चाहिए बड़ी सारी टीवी सक्रीनों का इंतजाम और ये चीजें सस्ती नहीं होती हैं।

पुराने जमाने में इन ‘एक्सट्रा’ चीजों का खर्चा उठाया करते थे बाहुबली कहलाने वाले लोग, उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में, लेकिन जब बाहुबली सीख गए चुनाव प्रचार की बारीकियां और राजनीति में होने के आर्थिक लाभ, तो चुनावों में वे खुद खड़े होने लगे और अब कई बाहुबली बैठे दिखेंगे देश की विधानसभाओं में और संसद में भी।

सवाल यह है कि इन ऊंची सभाओं में पहुंचने के लिए इतना कष्ट क्यों उठाने को तैयार हैं इतने सारे लोग कि टिकट लेने के लिए कतारें लग जाती हैं राजनीतिक दलों के दफ्तरों पर? जवाब सीधा-सा है और वह यह कि माना जाता है कि जितनी आसानी से राजनीति में होने से धन कमाया जा सकता है, उतनी आसानी से किसी दूसरे क्षेत्र में नहीं।

रही बात जनता की सेवा की, तो वह भी कर देते हैं वे राजनेता जो वास्तव में देशभक्त होते हैं, लेकिन कड़वा सच तो यह है कि ऐसे फरिश्ते बहुत कम दिखते हैं भारत की वर्तमान राजनीतिक में। अक्सर ऐसे राजनेता ही दिखते हैं, जो चुनाव आने से बिल्कुल पहले याद करते हैं कि जनता की सेवा करने के लिए उनको चुना गया है, सो इन अंतिम दिनों में जनता के लिए उपहारों की बरसात होती है। अचानक नींव के पत्थर रखे जाते हैं नए स्कूलों और अस्पतालों के। अचानक लैप्टाप और स्मार्टफोन बांटे जाते हैं और युद्ध स्तर पर बनने लगती हैं ग्रामीण सड़कें।

क्या यह सब धोखा है? मतदाताओं के साथ ढोंग रचने का काम है यह? नहीं। कभी ऐसा हुआ करता था, लेकिन अब आम भारतीय समझ गए हैं कि किस तरह लाभ उठाया जा सकता है अपने प्रतिनिधियों से। समझ गए हैं इस देश के आम मतदाता कि राजनेताओं का चुनाव जीतने के बाद पैसा बनाना अब दस्तूर बन गया है अपने इस भारत महान में, सो जब बड़ी-बड़ी कोठियां बन जाती हैं उनके प्रतिनिधियों की, मतदाता आंखें मूंद लेते हैं और ध्यान देते हैं सिर्फ उस बात पर कि उनको लाभ कैसे मिल सकता है अपने विधायक या सांसद से।

वे दिन गए जब आम मतदाता इतना भोला हुआ करता था कि किसी की शक्ल देख कर अपना मत उसको दे दिया करता था। वे दिन भी गए जब प्रत्याशी शराब और पैसा बांट कर वोट हासिल करते थे। आज के दौर में मतदाता इतना समझदार हो गया है कि चुनाव अधिकारियों को समोसों की चिंता नहीं करनी चाहिए।

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