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असहमत आवाजें

दिशा रवि पर लगे राजद्रोह के आरोप ने याद दिलाया कि लोकतंत्र में इस तरह के कानून होने ही नहीं चाहिए। अंग्रेजों ने इस कानून को बनाया था ताकि महात्मा गांधी और तिलक जैसे स्वतंत्रता सेनानियों को जेल भेजा जा सके। इस कानून को स्वतंत्रता के बाद ही कूड़ेदान में फेंक देना चाहिए था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ, मालूम नहीं क्यों।

democracyदिशा रवि (Twitter/@disha_ravi)

जिस दिन दिशा रवि की जमानत हुई पिछले सप्ताह, उस दिन संयोग से मैंने कपिल मिश्रा का एक वीडियो देखा, जिसमें वे दिखते हैं कहते हुए ‘जेएनयू के गद्दारों को गोली मारो… को, जामिया के गद्दारों को गोली मारो… को, एएमयू के गद्दारों को गोली मारो… को’। वीडियो में उनका इंटरव्यू चल रहा है दो पत्रकारों के साथ, जिसमें पहले वे इनकार करते हैं कि उन्होंने ऐसा कभी बोला था। फिर जब उनके भाषण का वीडियो दिखाते हैं पत्रकार तब वे स्वीकार करते हैं कि उन्होंने ऐसा भाषण दिया था। आज तक उन पर राजद्रोह का कोई मुकदमा नहीं चला है, जबकि राजद्रोह का आरोप उन पर ही लगाया जा सकता है, जो हिंसा भड़काने की कोशिश करते हैं।

कपिल मिश्रा ही थे जिन्होंने पिछले साल के इन्हीं दिनों में इस किस्म के इतने भड़काऊ भाषण दिए थे कि कई लोग मानते हैं कि दिल्ली में जो दंगे हुए थे तेईस फरवरी से उनतीस फरवरी के बीच, उनके पीछे कपिल मिश्रा के इन भाषणों का सीधा रिश्ता है। भारतीय जनता पार्टी में इन दंगों के बाद उनकी इज्जत बढ़ी है, उनकी तरक्की हुई है और दिल्ली पुलिस ने उन पर हिंसा भड़काने का कोई आरोप नहीं लगाया है। उल्टा इन दंगों के ‘मास्टरमाइंड’ उन्होंने उमर खालिद और अन्य मुसलिम नौजवानों को ठहरा कर जेल भेज दिया है।

इन दंगों में जो तिरपन लोग मारे गए थे, उनमें ज्यादातर मुसलमान थे। इन दंगों में जिन घरों और दुकानों को लूटा और जलाया गया था वे ज्यादातर मुसलमानों की थीं। इन दंगों में मंदिरों की बेअदबी नहीं हुई, लेकिन मस्जिदों की जरूर हुई है। लेकिन दिल्ली पुलिस की मानें तो मुसलमानों ने अपने ही लोगों को मारा और अपने ही लोगों के घर जलाए।

राजद्रोह के मुकदमे मुसलमानों पर चल रहे हैं, कपिल मिश्रा जैसे लोगों पर नहीं। यही वजह है कि निष्पक्ष राजनीतिक पंडित मानते हैं कि दंगे करवाए थे भारतीय जनता पार्टी ने दिल्ली के चुनावों को जीतने के लिए। दिल्ली पुलिस की जवाबदेही देश के गृहमंत्री को है और जो लोग अमित शाह को जानते हैं अच्छी तरह, वे कहते हैं कि चुनाव जीतने की उनकी रणनीति है हिंदुओं और मुसलमानों में नफरत फैला कर हिंदू वोट बैंक बनाना।

क्या ऐसी रणनीति के तहत छब्बीस जनवरी वाली हिंसा हुई थी? जबसे किसानों का विरोध प्रदर्शन शुरू हुआ है दिल्ली की सीमाओं पर, भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता और प्रवक्ता कई बार कह चुके हैं कि विरोध के पीछे खालिस्तानी ताकतें हैं, जिन्होंने एक अंतरराष्ट्रीय साजिश रची है भारत को बदनाम करने के लिए। प्रधानमंत्री खुद जब असम गए थे आगामी चुनावों के लिए प्रचार शुरू करने, अपने भाषणों में कह चुके हैं कि योग और भारतीय चाय को बदनाम करने की अंतरराष्ट्रीय साजिश चल रही है। इसी तथाकथित साजिश में दिशा रवि की गिरफ्तारी हुई थी राजद्रोह का आरोप लगा कर।

दिल्ली पुलिस को इस साजिश पर इतना यकीन था कि इस बाईस साल की लड़की को गिरफ्तार करके बंगलुरू से दिल्ली लाया गया। इस गिरफ्तारी के बाद गृहमंत्री का बयान आया कि नौजवान भी आतंकवादी हो सकते हैं और भारतीय जनता पार्टी की ट्रोल सेना सक्रिय हुई सोशल मीडिया पर यह कहने कि अजमल कसाब नौजवान था और बुरहान वानी भी।

दिशा रवि की तुलना इन आतंकवादियों से की भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ताओं ने भी और दिशा पर मुकदमा चलाया उन ‘गोदी मीडिया’ टीवी चैनलों ने, जो अक्सर ऐसा करते हैं। दिल्ली पुलिस ने इन चैनलों को मुकदमा चलाने के लिए सामग्री दी, सो दिशा का ‘मीडिया ट्रायल’ हुआ।

स्पष्ट हो गया इस दौरान कि इसको दोषी ठहराना चाहते थे भारत सरकार के सबसे ताकतवर मंत्री। इन सब बातों को ध्यान में रखा जाए तो न्यायाधीश धर्मेंद्र राणा की बहादुरी अंधेरे में चमकते दीपक जैसे लगती है। इस न्यायाधीश ने दिशा को जमानत देते समय साफ शब्दों में कहा कि उनको दिशा के उस ‘टूलकिट’ में एक भी बात नहीं दिखी, जिससे कहा जा सके कि उसने हिंसा भड़काने की कोशिश की थी। साथ में यह भी कहा कि मतभेद का अधिकार देता है भारत का संविधान और मतभेद को किसी हाल में राजद्रोह नहीं कहा जा सकता है। ऋग्वेद का हवाला देते हुए याद दिलाया इस न्यायाधीश ने कि हमारे शास्त्र भी कहते हैं कि हर तरफ से हमको सुनाई देने चाहिए अलग-अलग विचार।

न्यायाधीश धर्मेंद्र राणा की बातें वैसे भी अहमियत रखतीं, लेकिन इस समय और भी महत्त्वपूर्ण हैं, क्योंकि इस तरह की बहादुरी बहुत कम दिखती है हमारी अदालतों में। इतने सारे फैसले गए हैं सरकार के पक्ष में कि ऐसा लगने लगा है आम नागरिकों को कि सरकार के साथ मतभेद रखना या पंगा लेना बेकार है। ऐसा सिर्फ उन लोगों को नहीं लग रहा है जो राजनीतिक मतभेद रखते हैं मोदी सरकार से, उनको भी लगने लगा है जो सरकार से किसी आर्थिक मामले में उलझे हुए हैं। इसलिए न्यायाधीश धर्मेंद्र राणा की जितनी तारीफ की जाए, कम होगी। उन्होंने दिखाया है कि आज भी कुछ लोग हैं इस देश में जो न्यायालयों को सरकारी औजार नहीं बनने देंगे।

दिशा रवि पर लगे राजद्रोह के आरोप ने याद दिलाया कि लोकतंत्र में इस तरह के कानून होने ही नहीं चाहिए। अंग्रेजों ने इस कानून को बनाया था ताकि महात्मा गांधी और तिलक जैसे स्वतंत्रता सेनानियों को जेल भेजा जा सके। इस कानून को स्वतंत्रता के बाद ही कूड़ेदान में फेंक देना चाहिए था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ, मालूम नहीं क्यों। लेकिन मोदी के दौर में इसका इतना दुरुपयोग हुआ है कि अब समय जरूर आ गया है इसको कूड़ेदान में फेंक डालने का।

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