भक्तों की जमात

किसानों के खिलाफ नफरत और झूठे इल्जाम फैलाने में प्रधानमंत्री के भक्तों की टोली सबसे आगे थी। किसान आंदोलन को लेकर जितना जहर भक्तों ने उगला, अद्भुत था। मजे की बात यह है कि भक्तों की इस टोली में वही चेहरे रोज दिखते हैं टीवी चैनलों की चर्चा और ट्विटर पर।

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Photo-PTI)

प्रधानमंत्री की धमाकेदार कृषि कानूनों वाली घोषणा से पहले ही दिखने लगा था कि उनकी दिशा कोई और है और उनके भक्तों की कोई और। या शायद यह कहना बेहतर होगा कि उन्होंने अपनी प्राथमिकताएं बदल डाली हैं और इसकी खबर भक्तों तक नहीं पहुंची है। पिछले कुछ महीनों में स्पष्ट हो गया है कि सरकार की प्राथमिकता न सिर्फ देश को विकास और संपन्नता की दिशा में लेकर जाने की है, बल्कि इस दिशा में तेजी से चलने की है। मेरे कुछ उद्योगपति दोस्त कहते हैं कि आजकल जब वे वित्त मंत्री से या आर्थिक नीतियों से जुड़े मंत्रालय संभालने वाले किसी मंत्री से मिलते हैंतो वे एक नया और अच्छा बदलाव पाते हैं।

कहते हैं कि पहले जब इन मंत्रियों से मिलते थे, तो ये इनकी शिकायतें और सुझाव सुनने को तैयार तक नहीं थे। उल्टा रोब जमाते थे। उनको नसीहत दिया करते थे कि देश के लिए काम करना चाहिए, अपने निजी लाभ के लिए नहीं। इस तरह की बातचीत इतनी बार हुई कि मीडिया में भी इसका जिक्र कई बार हो चुका है। अब वही मंत्री अपना बर्ताव बदल चुके हैं।

मेरे एक दोस्त के शब्दों में, ‘अब जब हम इनसे मिलने जाते हैं तो हमसे पूछते हैं कि ‘ईज आफ डूइंग बिजनेस’ के लिए उनके क्या सुझाव हैं।’ बल्कि प्रधानमंत्री के अपने भी कई बयान पेश आए हैं जिनमें वे खुद कहते हैं कि उनकी इच्छा है कि विकास की रफ्तार बढ़े और उसके रास्ते में जो अटकलें हैं, उनको दूर करने के लिए उनके पास सुझाव भेजे जाएं।

समस्या प्रधानमंत्री की यह है कि उनके भक्तों तक उनका यह अच्छा और अति-लाभदायक सुझाव पहुंचा नहीं है अभी तक, सो उनका ध्यान अभी भी अटका रहा है उस ‘हिंदुत्व’ को बचाने में जो उनके लिए राष्ट्रीयता के बराबर है। एक मसखरे ने अमेरिका में अपने एक शो में कुछ बातें क्या कह दीं कि पिछले पूरे हफ्ते उसके पीछे पड़ी रही भक्तों की पूरी जमात।

कुछ ऐसे हैं जो लंबे-लंबे पोस्ट लिख कर कह रहे हैं कि वीर दास गद्दार है। कुछ ऐसे हैं जो टीवी चैनलों की चर्चाओं में गालियां देने में लगे हैं। एक महाभक्त ने वीर दास की तुलना इन शब्दों में की है सोशल मीडिया पर, ‘वीर दास एक ऐसा पाद है जो लिफ्ट में बदबू बन जाता है बिना किसी को जाने कि वह आया कहां से था।’

इस तरह की भद्दी भाषा सबसे ज्यादा नुकसान करती है प्रधानमंत्री का, इसलिए कि जब उनके महाभक्त इस तरह की भाषा बोलते हैं तो ऐसा साबित करने की कोशिश करते हैं कि इस किस्म की बातें करने के लिए उनको प्रधानमंत्री की इजाजत मिली हुई है। अजीब बात यह है कि जब प्रधानमंत्री विकास की बातें करते हैं या इशारा देते हैं कि वे खुश नहीं हैं क्योंकि उनकी नीतियों को यथार्थ में बदलने में उनके अपने अफसर बाधा बन रहे हैं, तो उनके भक्त चुप्पी साधे रहते हैं। ऐसा करके क्या वे साबित नहीं कर रहे हैं कि प्रधानमंत्री उनकी सहायता चाहते हैं सिर्फ गालियां देने और नफरत फैलाने में?

किसानों के खिलाफ नफरत और झूठे इल्जाम फैलाने में प्रधानमंत्री के भक्तों की टोली सबसे आगे थी। किसान आंदोलन को लेकर जितना जहर भक्तों ने उगला, अद्भुत था। मजे की बात यह है कि भक्तों की इस टोली में वही चेहरे रोज दिखते हैं टीवी चैनलों की चर्चाओं और ट्विटर पर। न इनमें कोई नया चेहरा दिखता है कभी और न ही इनसे कोई ऐसी बातें सुनने को मिलती हैं जिनसे साबित हो जाए कि वास्तव में वे समझ पाए हैं कि प्रधानमंत्री चाहते हैं कि परिवर्तन और विकास का उनका पुराना नारा फिर से प्राथमिकता की फेहरिस्त में ऊपर आए। भक्तों को लगता यही है कि प्रधानमंत्री सिर्फ हिंदुत्व के नाम पर देश को बांटना चाहते हैं। हिंदुओं और मुसलमानों में जो नफरत फैलाने का काम उनके भक्त कर रहे हैं, वह चरमसीमा पर है।

जो लोग प्रधानमंत्री का प्रचार संभाले हुए हैं और जिनकी कोशिश रही है कि दुनिया उनको अच्छी नजरों से देखे, उनको विश्वगुरु समझे, शायद देख नहीं रहे हैं कि प्रधानमंत्री के आलोचक उनके दुश्मन इतने नहीं, जितने उनके भक्त। इस तरह की भक्ति वैसे भी नुकसानदेह होती है, लेकिन जब किसी राजनेता के लिए की जाती है तो और भी ज्यादा। ऐसा लगने लगता है कि जनता की सेवा करने के बदले वे एक सम्राट के रूप में पेश आना चाहते हैं। सो प्रधानमंत्री की छवि एक राजनेता की नहीं, एक महाराजा की बन गई थी।

प्रधानमंत्री के भक्तों में कई ऐसे लोग हैं जिनको न राजनीति की समझ है, न आर्थिक मुद्दों की। इसलिए जब उनकी प्रशंसा भी करते हैं तो इस तरह जैसे किसी ने उनको आदेश दिया है ऊपर से ढिंढोरा पीटने का। इससे अच्छे तो प्रधानमंत्री के आलोचक हैं जो अपनी तरफ से कई बार ध्यान दिलाने की कोशिश करते हैं उन चीजों की तरफ, जो गलत हो रही हैं। गलतियां तो हर प्रधानमंत्री के शासनकाल में होती हैं, लेकिन उनका सुधार तब ही संभव होता है जब उनके ऊपर कोई रोशनी डाले।

नरेंद्र मोदी के दूसरे कार्यकाल में उनके आलोचक कोविड की दूसरी लहर में गलतियों पर ध्यान नहीं खींचते, तो सुधार न होते। बिल्कुल ऐसा अब हुआ है उन तीन कृषि कानूनों को लेकर। आलोचक उनको बहुत पहले से कहते आए हैं कि अगर किसान महीनों से उनका विरोध करते रहे हैं तो उनकी बातों में कुछ दम जरूर होगा। रही बात भक्तों की, तो उन्होंने कोई कसर नहीं छोड़ी किसानों को बदनाम करने में। प्रधानमंत्री के दुश्मन कौन हैं, यह उनको तय करना होगा।

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