बंद दरवाजे, बेबस बच्चे

नासमझी केवल हमारे शासक नहीं, आम लोग भी दिखा रहे हैं। महाराष्ट्र में विपक्ष ने खूब हल्ला मचाया मंदिरों को खोलने और गणपति के दौरान सार्वजनिक कार्यक्रमों की इजाजत देने के लिए, लेकिन अभी तक किसी भी राजनेता ने स्कूलों को खुलवाने के लिए आवाज नहीं उठाई है। मंदिर नहीं खुलते हैं, तो भगवान का कोई नुकसान नहीं होगा और न ही श्रद्धालुओं का, क्योंकि पूजा घर बैठ कर भी हो सकती है। मगर पढ़ाई घर बैठ कर संभव है सिर्फ उन बच्चों के लिए, जो देश के सबसे महंगे निजी स्कूलों में पढ़ते हैं।

Jansatta Vaqt Ki Nabz
लंबे वक्त से स्कूल बंद रहने से बच्चे घरों में बोर हो रहे हैं। साथ ही स्कूलों में मिलने वाला सहभागिता का वातावरण भी नहीं मिल पा रहा है।

समुंदर किनारे के जिस गांव में मैंने कोविड का पूरा दौर बिताया, उसमें एक बड़ा-सा सरकारी स्कूल है, जो पिछले अठारह महीनों से बंद है। जहां कभी गांव की गलियों में दिखती थीं वर्दी पहने बच्चों की कतारें, अब नहीं दिखती हैं। मैंने जब एक स्थानीय व्यक्ति से पूछा कि बच्चों की पढ़ाई का क्या हो रहा है इन दिनों, तो उसने जवाब दिया कि ‘फोन’ पर पढ़ रहे हैं बच्चे। और जिनके पास स्मार्ट फोन नहीं हैं? ‘वो नहीं पढ़ सकते हैं जी। कैसे पढ़ेंगे जब स्कूल ही बंद पड़ा है इतने दिनों से?’

स्कूल जाने वाले बच्चों के अगर दो साल बेकार जाते हैं, तो उनके सारे जीवन पर इसका असर रहता है, और अगर किसी देश में करोड़ों बच्चे लिखना-पढ़ना भूल जाते हैं या सीखते ही नहीं, तो इसका असर देश के भविष्य में घाव बन कर रह जाता है। ऐसा घाव बन चुका है भारत में और इसका इलाज अभी तक हमारे शासक करने की कोशिश भी नहीं कर रहे हैं।

पिछले साल की पहली बंदी में बंद हो गए थे महाराष्ट्र में सारे स्कूल और अब तक नहीं खुले हैं। मुंबई में बड़े-बड़े निजी स्कूलों के सामने देखने को मिलती हैं आजकल पीली स्कूल बसों की कतारें, लेकिन स्कूलों के अंदर एक ऐसा सन्नाटा छाया हुआ है जो कभी नहीं स्कूलों में छाना चाहिए। महानगरों और शहरों में बच्चों के मां-बाप के पास अक्सर स्मार्ट फोन होते हैं और अमीर घरों के बच्चों के पास अक्सर होते हैं अपने निजी आइपैड, जिन पर वे दिन भर पढ़ाई कर सकते हैं। नुकसान उनका हुआ है सिर्फ खेल-कूद के मैदान में। पढ़ाई में नहीं। इसके बावजूद हाल में किए गए एक सर्वेक्षण के मुताबिक शहरों में रहने वाले नब्बे फीसद माता-पिता कहते हैं कि स्कूलों का खुलना बहुत जरूरी हो गया है। ग्रामीण क्षेत्रों में यह आंकड़ा सत्तानबे फीसद है।

सर्वेक्षण का नाम है ‘तालाबंदी : स्कूली शिक्षा पर आपातकालीन रिपोर्ट’। सर्वेक्षण किया है जानेमाने समाज सेवकों ने और जो आंकड़े सामने आए हैं, वे डरावने हैं। सुनिए इस सर्वेक्षण से कुछ आंकड़े। जिन चौदह सौ बच्चों को सर्वेक्षण में शामिल किया गया, उनमें से चौबीस फीसद शहरी बच्चे ऑनलाइन पढ़ रहे हैं और केवल आठ प्रतिशत ग्रामीण बच्चे। ग्रामीण क्षेत्रों में सैंतीस फीसद बच्चे बिलकुल नहीं पढ़ रहे हैं आजकल और शहरों में उन्नीस फीसद बच्चे बिलकुल पढ़ाई नहीं कर रहे हैं।

स्कूलों को बंद रखने का नतीजा है कि शहरों में बयालीस प्रतिशत बच्चे ऐसे हैं, जो सिर्फ थोड़े-बहुत शब्द पढ़ सकते हैं और गांवों में अड़तालीस प्रतिश्त बच्चे पढ़ना तकरीबन भूल चुके हैं। सर्वेक्षण के मुताबिक पचहत्तर फीसद बच्चे पढ़ना भूले हैं, सिर्फ इसलिए कि उनके स्कूल बंद रहे हैं। सर्वेक्षण पंद्रह राज्यों में किया गया था और हर जगह पाया गया है कि लगभग आधे बच्चे पढ़ना भूल चुके हैं।

सर्वेक्षण के मुताबिक जो बच्चे निजी स्कूलों में पढ़ रहे थे मार्च, 2020 में वे स्कूल छोड़ गए हैं, क्योंकि इन स्कूलों ने ऑनलाइन पढ़ाई के लिए वही फीस रखी है, जो असली पढ़ाई के लिए होती थी। गरीब मां-बाप न इतनी बड़ी रकम दे सकते हैं और न ही उनकी क्षमता है समार्टफोन को बार-बार रीचार्ज कराने की। गरीब परिवारों के लिए एक समस्या यह भी है कि उनके बच्चों को अब दोपहर का भोजन नहीं मिलता है। इसके बदले कुछ राज्यों में व्यवस्था की गई है बच्चों को थोड़ा-बहुत अनाज देने की, लेकिन जो दावे कर रही हैं राज्य सरकारें बच्चों को नकद मुआवजा देने की, सर्वेक्षण के मुताबिक ऐसा पंद्रह प्रतिशत से कम ग्रामीण बच्चों को मिला है और ग्यारह फीसद शहरी बच्चों को।

पौष्टिक भोजन का अभाव पूरा किया जा सकता है, लेकिन शिक्षा का अभाव कैसे पूरा होगा? स्कूलों के बंद रहने का परिणाम अभी से दिखने लगा है, वह यह आंकड़ा साबित करता है : 2011 में 10-14 साल की उमर के बच्चों में जहां साक्षरता अट्ठासी से अट्ठानबे फीसद हुआ करती थी, आज गिर कर पचहत्तर प्रतिशत तक आ गई है शहरों में और सड़सठ फीसद गांवों में। दलित और आदिवासी बच्चों में यह आंकड़ा इकसठ प्रतिशत तक गिर गया है।

अगले सप्ताह प्रधानमंत्री के इकहत्तरवें जनमदिन की खुशी में ‘धन्यवाद मोदी’ के कई कार्यक्रम करने जा रही है भारतीय जनता पार्टी, लेकिन अफसोस कि इनमें से एक भी शिक्षा से जुड़ा नहीं है। क्यों नहीं नरेंद्र मोदी के जनमदिन की खुशी में स्कूलों को खोला जाए? कम से कम गांवों में ऐसा अगर होता है, तो वास्तव में ‘धन्यवाद मोदी’ कहेंगे इस देश के बच्चे। उन विकसित देशों में जहां इंटरनेट और ऑनलाइन सेवाएं हमसे कहीं ज्यादा अच्छी हैं, वहां स्कूल अब खुल गए हैं, क्योंकि शिक्षा की अहमियत वहां के शासक हमसे ज्यादा समझते हैं।

हमारी समस्या यह है कि नासमझी केवल हमारे शासक नहीं, आम लोग भी दिखा रहे हैं। महाराष्ट्र में विपक्ष ने खूब हल्ला मचाया मंदिरों को खोलने और गणपति के दौरान सार्वजनिक कार्यक्रमों की इजाजत देने के लिए, लेकिन अभी तक किसी भी राजनेता ने स्कूलों को खुलवाने के लिए आवाज नहीं उठाई है। मंदिर नहीं खुलते हैं, तो भगवान का कोई नुकसान नहीं होगा और न ही श्रद्धालुओं का, क्योंकि पूजा घर बैठ कर भी हो सकती है।

मगर पढ़ाई घर बैठ कर संभव है सिर्फ उन बच्चों के लिए, जो देश के सबसे महंगे निजी स्कूलों में पढ़ते हैं। इनकी तादाद इतनी थोड़ी है कि देश के भविष्य पर कोई खास असर नहीं पड़ेगा। आवश्यकता है उन करोड़ों बच्चों के लिए स्कूल शुरू करने की, जो देहातों में सरकारी स्कूलों में पढ़ते हैं। ये बच्चे अगर पढ़ना-लिखना भूल जाते हैं तो हम भूल सकते हैं समृद्ध भारत का वह सुंदर सपना, जो मोदी ने हमें दिखाया था।

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