सच के सामने

फिजूल की चीजों में उलझने के बदले हमारे राजनेताओं को अपना पूरा ध्यान देना चाहिए महामारी को काबू करने पर, लोगों का दर्द समझने में और ऑक्सीजन के इस गंभीर अभाव का हल ढूंढ़ने में।

Coronavirus, COVID-19 Vaccine, India Newsगुजरात के अहमदाबाद में कोरोना से मरने वाली महिला के अंतिम संस्कार की प्रक्रिया दौरान फूट-फूट कर रोते हुए परिजन। (फोटोः पीटीआई)

संकट के समय राजनेता अक्सर झूठ बोलते हैं। लेकिन उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने हद कर दी। जिस दिन उनके राज्य में अस्पतालों के दरवाजों पर लोग ऑक्सीजन न होने के कारण तड़प-तड़प कर दम तोड़ रहे थे, जिस दिन दो-तीन कोरोना के मरीज एक बिस्तर पर दिखे, जिस दिन राज्य के एक अस्पताल से तस्वीरें दिखीं मरीजों के बिस्तर के नीचे जमीन पर लेटे हुए, उस दिन वे टीवी पर दिखे यह कहते हुए कि उत्तर प्रदेश में ‘ऑक्सीजन, बिस्तर और रेमडेसिविर का कोई अभाव नहीं है’। उनके इस बयान के फौरन बाद उसी चैनल ने गाजियाबाद से तस्वीरें दिखाईं ऑक्सीजन लेने के लिए लंबी कतारों की। लोगों ने बताया कि कई-कई घंटे उनको इंतजार करना पड़ा है, क्योंकि उनके अस्पतालों में ऑक्सीजन बिल्कुल नहीं है।

मैंने जब ट्वीट किया कि मुख्यमंत्री को इस तरह झूठ नहीं बोलना चाहिए था इस समय, जब वैसे भी आम आदमी का भरोसा राजनेताओं में घट गया है तो उनके किसी समर्थक ने जवाब में ट्वीट कर पूछा कि अगर मुख्यमंत्री ने स्वीकार किया होता कि वास्तव में अस्पतालों में कोरोना के इलाज के सारे साधन घाटे में हैं, तो इसका क्या फायदा होता! अक्सर मैं इस किस्म के लोगों से मुंह नहीं लगती हूं सोशल मीडिया पर, लेकिन इस बार मैंने जवाब दिया यह कह कर कि संकट की इस घड़ी में राजनेताओं के घरों में स्थापित किए जाने चाहिए सहायता करने के लिए खास दफ्तर। ये खुले रहने चाहिए दिन-रात। इनके फोन नंबर हर अस्पताल में होने चाहिए, ताकि जहां ऑक्सीजन की कमी हो या किसी और चीज की तो अफसरों की जिम्मेवारी हो उन चीजों को युद्ध-स्तर पर पहुंचाने की। यह सुविधा हर मुख्यमंत्री के कार्यालय में होनी चाहिए।

योगी आदित्यनाथ ने जब देखा कि श्मशानों में चिताएं इतनी जलने लग गई हैं कि विदेशों में भी इन जलती चिताओं की तस्वीरें पहुंच गई हैं तो उन्होंने आदेश दिया कि पत्रकारों को श्मशानों में जाने पर प्रतिबंध लग गया है। ऐसा करना जरूरी हो गया था, क्योंकि कई दिलेर पत्रकारों ने श्मशानों में गिनती करनी शुरू कर दी थी लाशों की, इस बात को साबित करने के लिए कि सरकार की ओर से झूठ बोला जा रहा था। इसी तरह, मध्य प्रदेश से तस्वीर आई एक अस्पताल से एक एंबुलेंस की तेज रफ्तार से चलती हुई, जिसमें से एक लाश जब सड़क पर गिरी तब पता लगा कि कोई बीस लाशों को ले जाया जा रहा था इस वाहन में।

फिर आया हरियाणा के मुख्यमंत्री का बयान जिसमें उन्होंने आश्चर्यजनक संवेदनहीनता दिखाते हुए कहा कि मरने वालों की गिनती करना बेकार है, क्योंकि ऐसा करने से वे जिंदा नहीं हो जाएंगे। भारतीय जनता पार्टी के मुख्यमंत्रियों को झूठ बोलते हुए साबित हुआ पिछले सप्ताह कि भारत आंकड़ों को छिपाने का प्रयास कर रहा है। विदेशों में वैज्ञानिक और डॉक्टर कहने लग गए हैं कि दो लाख से कहीं ज्यादा लोग मरे हैं कोविड से अब तक।

ऐसा लगने लग गया है कि इस महामारी के साथ कंधा से कंधा मिला कर लड़ने के बदले हमारे राजनेता और उनके आला अधिकारी ज्यादा ध्यान दे रहे हैं प्रधानमंत्री की छवि को चमकाने में। दुनिया की इतने अखबारों ने महामारी की इस दूसरी लहर को इस तरह फैलने का सारा दोष डाला है उन पर। याद दिलाया जा रहा है कि मोदी ने न कुंभ को रोकने की कोशिश की जब तक बहुत देर नहीं हो चुकी थी। उन्होंने बंगाल में बड़ी-बड़ी आम सभाओं को देख कर यह भी कहा था कि इतनी बड़ी सभाओं को देख कर उनको खुशी हुई है।
विदेशी पत्रिकाएं और अखबार जरूरी काम कर रहे हैं, लेकिन सच यह है कि मीडिया अपने देश में डरी हुई है।

विदेशी पत्रकारों को भारत सरकार डरा नहीं सकती है, इसलिए इन दिनों खुल कर आलोचना हो रही है मोदी की व्यक्तिगत तौर पर। इन पर निगरानी रहती है हमारे दूतावासों की, इसलिए जब आस्ट्रेलियाई अखबार ने पिछले सप्ताह भारत सरकार की कड़ी निंदा की उसके संपादक को पत्र लिखा आस्ट्रेलिया में भारत सरकर के उप-राजदूत ने। पत्र का संदेश था कि अखबार झूठ बोल रहा है भारत के बारे में। मैंने पत्र पढ़ा तो हैरान रह गयी। झूठ कौन बोल रहा है दुनिया जानती है।

लेकिन इससे भी ज्यादा हैरान होने की बात यह है कि इन फिजूल की चीजों में उलझने के बदले हमारे राजनेताओं को अपना पूरा ध्यान देना चाहिए महामारी को काबू करने पर, लोगों का दर्द समझने में और ऑक्सीजन के इस गंभीर अभाव का हल ढूंढ़ने में। अगली अहम समस्या जो आने वाली है वह यह है कि टीकाकरण अभियान पूरी तरह रुकने वाला है, क्योंकि मुंबई और दिल्ली के टीकाकरण केंद्रों में अब टीके ही नहीं हैं। इसलिए जब भारत सरकार घोषणा करती है कि अगले हफ्ते से अठारह बरस के लोग भी टीका लगवा सकेंगे, तो क्या यह एक और झूठ नहीं साबित होगा? जिस सरकारी ऐप पर नाम दर्ज करना है, उस पर चौबीस घंटों में एक करोड़ से ज्यादा लोगों ने अपने नाम लिखवा दिए हैं, लेकिन उनको टीका कैसे मिलेगा, जब उनको भी नहीं मिल रहा है दूसरा टीका, जिन्होंने पहला लगवा लिया है? मुंबई के कई केंद्रों पर मार-पीट पर उतर आए थे लोग, घंटों इंतजार करने के बाद। इस संकट में सच को छिपाना आसान नहीं है।

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