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लापरवाही का संक्रमण

साबित यह भी हो गया है कि इस तरह की पूर्णबंदी से संक्रमण को नुकसान कम होता है और अर्थव्यवस्था को ज्यादा। अभी से प्रवासी मजदूर भागने लग गए हैं मुंबई छोड़ कर बेरोजगार और बेघर होकर एक बार फिर।

Coronavirus, India News, National Newsकोरोना के बढ़ते मामलों के बीच जम्मू की सब्जी मंडी में सोमवार को भारी भीड़ देखने को मिली। (फोटोः पीटीआई)

टीकाकरण उत्सव मनाया हमने पिछले सप्ताह प्रधानमंत्री के कहने पर। उत्सव शुरू होते ही मालूम हुआ कि संक्रमण की इस दूसरी लहर आग की तरह फैलने लगी है देश भर में। महानगरों के अस्पतालों में उनको भी जगह नहीं मिल रही है, जिनके पास निजी अस्पतालों के पूरे पैसे देने की क्षमता है। टीकाकरण उत्सव के दौरान जिनको टीका लगवाने का अधिकार था, उनको भी नहीं मिल सके, इसलिए कि टीके हैं ही नहीं कई अस्पतालों और टीकाकरण केंद्र्रों में। इन बुरी खबरों के बाद आई सबसे बुरी खबर। कब्रिस्तानों और श्मशानों के बाहर कतारें लग गई हैं, बिल्कुल उस तरह जैसे हमने अमेरिका, ब्राजील और इटली में देखी थीं पिछले साल जब कोरोना की पहली लहर फैलने लगी थी।

उस पहली लहर में अपने देश में संक्रमण को हमने इतनी सफलता से रोका था कि एक महीने पहले मैंने खुद इसी जगह लिखा था कि कोरोना को हम हरा पाए हैं इतनी सफलता से कि जान का नुकसान हमारे यहां सबसे कम हुआ है। ऐसा कर सके थे हम, बावजूद इसके कि कई विशेषज्ञों ने कहा था कि भारत को सबसे ज्यादा नुकसान होने वाला है इस महामारी से, क्योंकि हमारी सरकारी स्वास्थ्य सेवाएं इतनी कमजोर हैं। तो इस एक महीने में क्या हुआ है जिसने साबित किया है कि अब कोरोना बेकाबू हो गया है देश भर में। एक कारण शायद यह है कि हमने अपनी कामयाबी का जश्न कुछ ज्यादा जल्दी मनाया था। लेकिन सबसे बड़ा कारण यह है कि जिनकी जिम्मेवारी थी टीकाकरण की प्रक्रिया सफलता से करवाने की, उन्होंने अपना काम ठीक से बिल्कुल नहीं किया है।

आंकड़े इसको साबित करते हैं। इस साल के पहले महीने में अमेरिका ने टीके की साठ करोड़ खुराक अपने लोगों के लिए उपलब्ध किए थे और इनका पूरा पैसा दिया था। उस देश की आबादी है तीस करोड़। इसी दौरान भारत सरकार ने सिर्फ एक करोड़ टीके की खुराक आॅर्डर किए थे एक सौ तीस करोड़ की आबादी वाले अपने देश के लिए। ऐसा किया बावजूद इसके कि दुनिया के साठ फीसद टीके बनते हैं भारत में। प्रधानमंत्री खुद कई बार कह चुके हैं गर्व से कि भारत विश्व की फार्मेसी बन सकता है।

उन्हें हमारी आत्मनिर्भरता पर इतना विश्वास था कि जब दो देसी टीके तैयार हुए, उन्होंने अस्सी देशों को भेज डाला, जहां टीके नहीं बनते हैं। कुछ देशों को तो हमने मुफ्त में दे दीं हैं। फिर बड़े गर्व से प्रधानमंत्री ने कहना शुरू कर दिया कि टीकाकरण का सबसे बड़ा कार्यक्रम भारत में किया जा रहा है। जब जानकारी मिली टीकों के सख्त अभाव की तो देश के स्वास्थ्य मंत्री ने दावा किया कि कोई अभाव नहीं है और विपक्षी राज्य सरकारें सिर्फ राजनीतिक खेल खेल रही हैं।

जब तक प्रधानमंत्री ने ‘टीकाकरण उत्सव’ का एलान नहीं किया था, तब तक भारत सरकार के आला अधिकारी कहते रहे कि टीके की कोई कमी नहीं है कहीं पर भी। लेकिन अब जब टीका लगवाने के लिए लंबी-लंबी कतारें लग गई हैं, अब सब चुप हो गए हैं। गलती पर गलती की है भारत सरकार के उन आला अफसरों ने, जिनको सौंपा गया था टीकाकरण अभियान। इन गलतियों में से शायद सबसे बड़ी गलती रही है यह कि सीरम इंस्टीट्यूट से जबर्दस्ती करके टीके इतने सस्ते दामों पर उपलब्ध की गई कि अब उनकी क्षमता ही नहीं है अपना उत्पादन बढ़ाने की। कई करोड़ भारतीय हैं जो टीके के पूरे दाम देने के काबिल हैं, लेकिन उनको भी सस्ते में टीके लगाए गए हैं।

भारत सरकार के किसी भी आला अधिकारी ने अभी तक स्वीकार नहीं किया है कि देश में टीकों का सख्त अभाव है, लेकिन पिछले सप्ताह इजाजत दी गई है ‘स्पूतनिक-वी’ नाम के रूसी टीके को। अन्य विदेशी टीकों को भी अब इजाजत मिलने वाली है, लेकिन उनका आना तभी संभव होगा, जब भारत सरकार उनको इजाजत देती है एक खुराक को दो सौ रुपए से ज्यादा में बेचने की। सवाल यह है कि इस साल के बजट में जो टीकाकरण के लिए तिरपन हजार करोड़ रुपए रखे गए थे, वह पैसा कहां गया? सीरम इंस्टीट्यूट तीन हजार करोड़ रुपए मांग रहा है उत्पादन बढ़ाने के लिए, लेकिन अभी तक भारत सरकर इतनी छोटी रकम भी दे नहीं पाई है।

स्थिति इतनी गंभीर हो गई है कि संक्रमण अब पूरे देश में आग की तरह फैलने लग गया है। उत्तर प्रदेश और बिहार में माना जा रहा है कि सबसे बड़ी समस्या होने वाली है, इसलिए कि इन राज्यों में सबसे तेजी से फैल रहा है। रही महाराष्ट्र की बात तो यहां अब तकरीबन पूरी तरह पूर्णबंदी लागू हो चुकी है अगले दो हफ्तों के लिए, लेकिन साबित यह भी हो गया है कि इस तरह की पूर्णबंदी से संक्रमण को नुकसान कम होता है और अर्थव्यवस्था को ज्यादा। अभी से प्रवासी मजदूर भागने लग गए हैं मुंबई छोड़ कर बेरोजगार और बेघर होकर एक बार फिर।

वर्तमान हालात का कुछ दोष जनता का भी है। क्या जरूरत थी शादियों के बड़े-बड़े जश्न मनाने की? क्या जरूरत थी इतनी संख्या में कुंभ मेले में जाने की? क्या जरूरत है तीर्थयात्राओं की ऐसे समय, जब घर से निकलना ही खतरे से खाली नहीं है? लेकिन ऐसा कहने के बाद यह भी कहना जरूरी है कि जब बंगाल में दिखते हैं देश के सबसे बड़े राजनेता बड़े-बड़े आम जलसे करते हुए और गर्व से कहते हुए कि जनसैलाब देख कर उनको खुशी होती है तो आम आदमी इससे क्या सीख लेता होगा? यही न कि करोना तो है ही नहीं, सब झूठ है। इस तरह के बयान दिए भी हैं लोगों ने जब कुंभ में उनसे टीवी पत्रकारों ने सवाल किए।

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