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तीरंदाज: भीड़ हांकने का हुनर

ग्रीक दार्शनिक सुकरात का कहना था कि सार्वजनिक जीवन में सफल होने के लिए बहुत जरूरी है कि नायक उत्तेजित गतिविधि में लिप्त रहे और जनता को हांकने के लिए आक्रामक तेवर बनाए रहे। राजनीति परिभाषित रूप में झुंड बनाने की प्रक्रिया है और झुंड तभी बनेगा जब लोग भयभीत हों।

प्रतीकात्मक फोटो प्रतीकात्मक फोटो

एक अकेला कुत्ता सैकड़ों भेड़ों को कैसे हांक लेता है? 2014 में ब्रिटेन और स्वीडेन के वैज्ञानिकों ने इस रहस्य पर से पर्दा उठाने के लिए एक रोचक अध्ययन किया था। वैसे तारीख की शुरुआत से ही श्वान और भेड़-बकरियां मानव जाति से जुड़े हुए हैं। कहा जाता है कि सबसे पहले कुत्ते ने आदमी से दोस्ती की थी और उसके जीवन में एक परिवार के सदस्य की भांति शमिल हो गया था। उसके बाद मनुष्य ने जब भेड़ और बकरियां पालनी शुरू की, तो पाया कि कुत्ता वफादार तो है ही, पर अच्छा चौकीदार भी है। वह अपने तरीके से चौकीदारी के साथ भेड़ों का संचालन भी बखूबी कर सकता है। भोटिया कुत्ते से लेकर बॉर्डर कुली और जर्मन शेफर्ड नस्ल के श्वान वास्तव में हांकने का काम इस तरतीब से कर लेते हैं कि सैकड़ों भेड़ों के झुंड को वे बिना चूक एक साथ रख लेते हैं और गंतव्य तक सुरक्षित पंहुचा देते हैं।

कार्य प्रभावी ढंग से जरूर होता आ रहा है, पर आज तक यह नहीं पता था कि भोटिया जैसे शीप डॉग किस तरकीब से झुंड को हांकते हैं और उसको कैसे बिखरने नहीं देते हैं। गड़ेरिए कई तरह से विशेष नस्ल के कुत्तों की प्रवृत्ति को समझाते रहे हैं, पर उनकी व्याख्या से वैज्ञानिक पूरी तरह संतुष्ट नहीं थे। उन्होंने पहरी श्वान और उसकी निगहबानी में भेड़ों के झुंड का अध्ययन करने के लिए दोनों जानवरों पर जीपीएस सिस्टम लगाया और फिर उनके कार्यकलाप को रिकॉर्ड किया।

आखेट इन नस्लों की सहज वृत्ति है, जिसके लिए वे अपनी प्राकृतिक प्रवृत्ति के अनुसार शिकार को घेरते, डराते और दौड़ाते हैं। एक प्रशिक्षित भोटिया इन प्रवृत्तियों का इस्तेमाल भेड़ों के झुंड को काबू में रखने के लिए करता है। दूसरी तरफ, भेड़ों की प्रथम प्रवृत्ति स्वरक्षण की होती है। भेड़ों का झुंड जब भौंकने की आवाज सुनता है और कुत्ते को अपनी ओर आक्रामक रूप में आता देखता है, तो भेड़ें बचने के लिए झुंड के बीच में घुसने लगती हैं। प्रत्येक भेड़ भयभीत होकर अपने और शिकारी के बीच में किसी और भेड़ को डालने का प्रयास करती है। इसके चलते झुंड और घना होता जाता है। भोटिया कुत्ता भेड़ों की इस प्रवृत्ति से प्राकृतिक रूप से वाकिफ होता है और वह बार-बार भौंक कर, आक्रामक तेवर दिखा कर, उन्हें झुंड में इकट्ठा कर लेता है। वैज्ञानिकों ने पाया कि शीप डॉग झुंड को संग्रहित करने और उसको अपनी मर्जी से चलाने के लिए दो तरीके इस्तेमाल करता है। पहले वह झुंड के पीछे से आता है और भौंक कर तथा इधर-उधर से घेर कर भेड़ों को जमा करता है। भेड़ें अपने रक्षण के लिए एक-दूसरे से सट जाती हैं और गहरे झुंड का निर्माण अनायास ही कर देती हैं।

भोटिया इस प्रक्रिया में लगातार इस बात पर निगाह लगाए रखता है कि सफेद बालों के बीच में कहीं कोई काला रिक्त स्थान तो नहीं है। जहां भी वह सफेदी के मध्य दूसरा रंग पाता है, वह उसको हटाने के लिए आक्रामक हो जाता है और भेड़ें अपने को बचाने के लिए झुंड के मध्य की तरफ चल देती हैं। सैकड़ों अलग-अलग बिखरी भेड़ों को भीड़ में तब्दील करने के बाद, भोटिया उनको हांकना शुरू करता है। वह झुंड को जिस दिशा में हांकना चाहता है, उसकी विपरीत दिशा से भौंकना और दौड़ना शुरू कर देता है। एक तरफ से हो रहे आक्रमण से बचने के लिए भेड़ें दूसरी, और भोटिया द्वारा चाही, दिशा में मुड़ जाती हैं। इस तरह आशंकित कर के भोटिया भेड़ों को बड़ा झुंड बनाने के लिए मजबूर कर देता है और उनको बाड़े तक हांक ले जाता है।

वैज्ञानिकों ने जीपीएस से प्राप्त डाटा को जब जमा किया, तो पाया कि उससे वे एक वास्तविक गणितीय मॉडल बना सकते हैं। यह मॉडल वे सारे नियम बताता है, जोकि झुंड बनाने और उसको चलने के लिए कुत्ता और भेड़ प्राकृतिक रूप से उपयोग करते हैं। वास्तव में स्वरक्षण वृत्ति का उपयोग करके हम किसी भी बिखरे हुए समुदाय को झुंड या भीड़ में तब्दील कर सकते हैं। भोटिया कुत्ता भौंक कर और दौड़ा कर भेड़ों को झुंड बनाने के लिए मजबूर करता है। दूसरे शब्दों में, शोर और उसके साथ भय उत्पन्न करने वाली उत्तेजित गतिविधि द्वारा नागरिक जीवन में भी भेड़चाल उत्पन्न की जा सकती है।

वैज्ञानिकों का दावा है कि श्वान-भेड़ की प्रवृत्ति पर बना मॉडल मनुष्य काज के लिए बेहद उपयोगी है, खासकर उन परिस्थितियों में जहां लोगों को किसी आपदा से बचाने के लिए झुंड में आनन-फानन तब्दील करना जरूरी हो, जैसे इमारत में लगी आग से बचने के लिए उन्हें जमा कर के निश्चित दिशा में ले जाने के लिए आदि। वे ऐसा रोबोट भी बनाने की फिराक में हैं, जो मनुष्यों का पशुचारण सुचारु रूप से कर सके।

ग्रीक दार्शनिक सुकरात ने शायद वैज्ञानिकों से पहले ही कुत्ता-भेड़ प्रवृत्ति को मनुष्य मानस में भांप लिया था। उनका कहना था कि सार्वजनिक जीवन में सफल होने के लिए यह बहुत जरूरी है कि नायक उत्तेजित गतिविधि में लिप्त रहे और जनता को हांकने के लिए आक्रामक तेवर बनाए रहे। राजनीति परिभाषित रूप में झुंड बनाने की प्रक्रिया है और झुंड तभी बनेगा जब लोग भयभीत हों। ओजस्वी भाषणों का इस भय को उत्पन्न करने और उसका पोषण करने में बड़ा महत्त्व है। सब शोर को ही सुनते हैं और उसी के अनुसार क्रिया करते हैं। जितना शोर होगा, उतना झुंड बनेगा और जैसे जैसे शोर बढ़ता जाएगा, झुंड भी बढ़ता जाएगा।

ग्रीक दार्शनिक का कहना था कि नागरिक असल में भेड़-बकरी होते हैं, जिनकी प्रवृत्ति जल्दी सहम जाने की होती है। मूलत: उन्हें हांके जाने से कोई परहेज नहीं होता है, क्योंकि उनमें विवेकशीलता लगभग नगण्य होती है। किसी प्रकार का भी खतरा, चाहे वे कितने भी काल्पनिक क्यों न हों, उन्हें झुंड बनाने और उसमें अधिक से अधिक धंसने के लिए मजबूर कर देता है। सफल नायक इसीलिए हमेशा खतरा दिखाता रखता है और भेड़ों को बाड़े में हांक देता है।

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