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वक्त की नब्ज: अब मुद्दे बदल गए हैं

दोष भारतीय जनता पार्टी का भी है और कांग्रेस का भी। जब भी किसानों ने अपने हाल पर राजनेताओं का ध्यान आकर्षित करने की कोशिश की है, जैसे पिछले हफ्ते दिल्ली में संसद के दरवाजों तक पहुंच कर प्रदर्शन किया था, तो राजनेताओं ने उनको राहत और खैरात के सिवा कुछ नहीं दिया।

Author December 2, 2018 2:20 AM
भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी पीछे नहीं रहे हैं छोटे मुद्दों को बड़ा बनाने की इस चुनावी स्पर्धा में।

इन दिनों कांग्रेस पार्टी के ‘सेक्युलर’ अध्यक्ष वैसे तो बहुत बार दिखते हैं मंदिरों में पुजारियों से घिरे हुए, मगर पिछले हफ्ते जब पुष्कर के ब्रह्मा मंदिर में दिखे, भगवा साफा पहने, माथे पर बड़ा-सा टीका लगाए हुए, तो उनका वहां होने की खास वजह थी। इसलिए कि जिस पुजारी के साथ दिखाए गए टीवी पर, उन्होंने पत्रकारों को संबोधित करते हुए राहुल गांधी का गोत्र बताया। कश्मीरी पंडित परिवार के हैं, पंडितजी ने गंभीर चेहरा बनाते हुए कहा, और इनका गोत्र है कौल-दत्तात्रेय। यह जानकारी देने के बाद पंडितजी ने बताया कि इनका नाम नेहरू इसलिए रखा गया, क्योंकि इलाहाबाद में नहर के किनारे बस गए थे राहुलजी के पूर्वज। गोत्र पूछा था कांग्रेस अध्यक्ष का एक शरारती भाजपा प्रवक्ता ने, लेकिन क्या जवाब देना जरूरी था? क्या गोत्र बताने से राहुल गांधी का राजनीतिक भविष्य सुरक्षित हो गया है? क्या पांच राज्यों में हो रहे चुनावों का रुख अब बदल जाएगा?

अफसोस कि इस चुनाव अभियान में प्रधानमंत्री भी उन मुद्दों को अहमियत देते दिखे, जिनका कोई मतलब नहीं है मतदाताओं के लिए। कांग्रेस के एक-दो मामूली नेताओं ने उनकी माताजी और पिताजी के बारे में कुछ अनाप-शनाप बातें क्या कह दीं कि प्रधानमंत्री ने उनको अपनी आमसभाओं में ऐसे पेश किया जैसे बहुत बड़ा मुद्दा हो। ‘मेरी मां, जो राजनीति जानती तक नहीं है, जो दिन भर अपने कमरे में पूजा-पाठ में व्यस्त रहती है, उसको घसीट लाए हैं कांग्रेस के लोग, क्योंकि मोदी के साथ लड़ नहीं सकते हैं।’ भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी पीछे नहीं रहे हैं छोटे मुद्दों को बड़ा बनाने की इस चुनावी स्पर्धा में। अपने हर भाषण में ‘राहुल-बाबा’ और उनके परिवार का मजाक उड़ाते हैं। पिछले सप्ताह राजस्थान के नागौर में उन्होंने कहा कि कांग्रेस पार्टी अब एक प्राइवेट लिमिटेड कंपनी में तब्दील हो चुकी है। बात सही है आपकी अमित शाहजी, लेकिन क्या भूल गए हैं आप कि यह अब मुद्दा नहीं रहा है जनता के लिए, क्योंकि पिछले आम चुनावों में ही जनता ने कांग्रेस पार्टी पर अपना फैसला सुना दिया था।

ऐसा लगता है कि हमारे तमाम राष्ट्रीय स्तर के राजनेता भूल गए हैं कि अगले हफ्ते जो नतीजे आने वाले हैं पांच राज्यों के, उनका आधार और ही होगा। हारे या जीते जाएंगे स्थानीय मुद्दों के आधार पर। स्थानीय मुद्दे अनेक हैं और गंभीर। राजस्थान में अगर वसुंधरा राजे हारेंगी, तो इसलिए कि उनकी सरकार इस राज्य की सबसे बड़ी समस्या का समाधान नहीं ढंूढ़ पाई है : पानी। बरसात इस साल पश्चिमी राजस्थान में सिर्फ एक-दो दिन के लिए हुई, सो बाड़मेर और जैसलमेर के देहाती क्षेत्रों में मैंने वह हाल देखा लोगों का, जो बयान करना मुश्किल है। अकाल है इन क्षेत्रों में, लेकिन अकाल राहत का नामो-निशान नहीं। मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह चौहान अगर चौथी बार मुख्यमंत्री बनते हैं तो इसलिए बनेंगे कि उनकी सरकार ने ग्रामीण क्षेत्रों में बहुत काम किया है। जिनके कच्चे घर थे उनको पक्के मिल रहे हैं प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत, गैस सिलेंडर बंटे हैं, ग्रामीण सड़कें बनी हैं और बहुत कुछ और किया गया है। लेकिन हारते हैं अगर, तो इसलिए कि यह सब होने के बाद भी नौजवानों को रोजगार नहीं दे पाए। जहां गई हूं वहां सबसे बड़ा मुद्दा बेरोजगारी ही रहा है, क्योंकि कृषि का अब हाल यह है कि और रोजगार पैदा करने की गुंजाइश नहीं रही है। सो, जब तक ग्रामीण उद्योग में निवेश नहीं होने लगता, बेरोजगारी सबसे बड़ी समस्या रहेगी।
दोष भारतीय जनता पार्टी का भी है और कांग्रेस का भी। जब भी किसानों ने अपने हाल पर राजनेताओं का ध्यान आकर्षित करने की कोशिश की है, जैसे पिछले हफ्ते दिल्ली में संसद के दरवाजों तक पहुंच कर प्रदर्शन किया था, तो राजनेताओं ने उनको राहत और खैरात के सिवा कुछ नहीं दिया। कर्ज माफ करने और फसलों के दाम बढ़ाने से राहत मिल सकती है थोड़े दिनों के लिए, लेकिन असली समस्या का समाधान नहीं होगा। असली समस्या है कि न तो किसी सरकार ने किसानों के लिए सुविधाएं उपलब्ध कराई हैं, जिनसे वे दुनिया के बाजारों में अपना अनाज, अपनी सब्जियां और फल, पहुंचा सकें और न ही उनके लिए कोई विकल्प दिए हैं रोजगार के।

जिस देश में पैंसठ फीसद लोग खेती पर निर्भर हों उनकी समस्याओं का हल ढूंढ़ना राजनेताओं के लिए सबसे जरूरी काम होना चाहिए, लेकिन संसद में पहुंचने के बाद हमारे ज्यादातर सांसद भूल जाते हैं कि उनको संसद तक पहुंचाया किसने है। दशकों से ऐसा होता आया है, सो अब देश की इस सबसे बड़ी आर्थिक समस्या का समाधान ढूंढ़ना आसान नहीं है। क्या यही कारण है कि देश के बड़े राजनेता अब ऐसे मुद्दे उठा रहे हैं चुनावी सभाओं में, जिनका न चुनाव से कोई मतलब है और न जनता से? क्या कांग्रेस को अब वोट मिलेगा मध्यप्रदेश, राजस्थान और छतीसगढ़ में, क्योंकि कांग्रेस अध्यक्ष ने अपना गोत्र साबित कर दिया है? क्या भारतीय जनता पार्टी को वोट इन राज्यों में मिलेगा, क्योंकि प्रधानमंत्री ने साबित कर दिया है कि कांग्रेस इतनी गिरी हुई पार्टी है कि उनकी पूज्य माताजी को घसीट लाई है अपने चुनावी अभियान में? या इसलिए भाजपा की सरकारें बनेंगी इन राज्यों में फिर से, क्योंकि साबित हो गया है कि कांग्रेस पार्टी गांधी परिवार की निजी कंपनी बन गई है? यह मुद्दा था पिछले आम चुनावों में और इस पर जनता ने अपना फैसला सुना दिया कांग्रेस को सिर्फ चौवालीस सीटें लोकसभा में देकर। पिछले चार वर्षों में मुद्दे बदल गए हैं जनता के लिए। बेखबर हैं तो सिर्फ राजनेता।

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