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मुद्दा: ग्रामीण महिलाओं की दशा

भारत के गांवों को बचाने के लिए खेती को बचाना आवश्यक है, और खेती बचाने के लिए महिलाओं को साधन संपन्न बनाना भी उतना ही आवश्यक है। सरकारी नियमों के हिसाब से अभी किसान केवल वही माने जाते हैं, जिनके नाम से जमीन होती है, ऐसे में कितनी ही महिलाएं किसान के रूप में पहचानी जाने से वंचित रह जाती हैं।

प्रतीकात्मक फोटो (फाइल)

महिलाओं को ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ कहा जाता है। विकासशील देशों में इनकी भूमिका और महत्त्वपूर्ण है। पूरी दुनिया में कृषि क्षेत्र में ग्रामीण महिलाओं का अहम योगदान है। वे परिवार, समाज, समुदाय की सार्थक अंग हैं। जो समाज के स्वरूप को सशक्त रूप से प्रभावित करती हैं। क्योंकि महिलाएं राष्ट्र के विकास में पुरुषों के बराबर ही महत्त्व रखती हैं। हमारे देश की सत्तर प्रतिशत आबादी आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है। उनमें से अधिकांश कृषि कार्यों पर निर्भर हैं। यही वजह है कि ग्रामीण महिलाएं गृहकार्य तथा बच्चों को संभालने के साथ-साथ खेती के कामों में भी हाथ बंटाती हैं। गौरतलब है कि भारत के सकल घरेलू उत्पाद में महिलाओं का योगदान मात्र सत्रह प्रतिशत है, जो कि वैश्विक औसत सैंतीस प्रतिशत के आधे से भी कम है। फिर भी विश्व बैंक की एक रिपोर्ट के अनुसार अगर महिलाओं का श्रम में योगदान बढ़ जाए तो भारत की विकास दर दहाई की संख्या में होगी। इससे गरीबी को तेजी से कम किया जा सकता है।

भारत के कृषि क्षेत्र में कुल श्रम की साठ से अस्सी प्रतिशत हिस्सेदारी ग्रामीण महिलाओं की है। जबकि खाद्य एवं कृषि संगठन के आंकड़ों पर गौर करें तो कृषि क्षेत्र में कुल श्रम में ग्रामीण महिलाओं का योगदान तिरालीस प्रतिशत है, वहीं कुछ विकसित देशों में यह आंकड़ा सत्तर से अस्सी प्रतिशत है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद और डीआरडब्ल्यूए के नौ राज्यों में किए गए एक शोध से पता चलता है कि प्रमुख फसलों की पैदावार में महिलाओं की भागीदारी पचहत्तर प्रतिशत तक रही है। इतना ही नहीं, बागवानी में यह आंकड़ा उन्यासी प्रतिशत और फसल कटाई के बाद के कार्यों में इक्यावन प्रतिशत तक है। पशुपालन में महिलाओं की भागीदारी अट्ठावन प्रतिशत और मछली उत्पादन में पंचानबे प्रतिशत तक है। यानी कहा जा सकता है कि विकासशील देशों में खेती का तकरीबन आधा काम महिलाओं द्वारा किया जाता है और इस मामले में भारत अपवाद नहीं है। फिर भी कृषि विकास के लिए रणनीतियां मुख्य रूप से पुरुषों को केंद्र में रख कर बनाई जाती हैं। बमुश्किल पांच फीसद संसाधन महिलाओं को ध्यान में रख कर खर्च किए जाते हैं और इस दिशा में कोशिशें भी नहीं होतीं। इससे कृषि उत्पादन को भी भारी नुकसान होता है।

खाद्य एवं कृषि संगठन के एक अध्ययन के मुताबिक अगर महिलाओं को पुरुषों के बराबर परिसंपत्तियां, कच्चा माल और सेवा जैसे संसाधन मिलें, तो समस्त विकासशील देशों में कृषि उत्पादन ढाई से चार फीसद तक बढ़ सकता है। इससे भूखे लोगों की तादाद को बारह से सत्रह फीसद तक कम किया जा सकता है। इससे लोगों की आमदनी भी बढ़ती, जिससे जीवन स्तर और जीवन सुरक्षा में भी इजाफा होता।

आर्थिक सर्वेक्षण 2017-18 के अनुसार पुरुषों का रोजगार के लिए गांवों से शहरों की तरफ पलायन होने के कारण कृषि कार्य में महिलाओ की भूमिका बढ़ रही है। इसलिए महिलाओं की कृषि कार्य में हिस्सेदारी बढ़ी है। वहीं आज की वर्तमान चुनौती जैसे कि जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक संसाधनों का क्षरण रोकने और प्रबंधन में महिलाओं के योगदान को नकारा नहीं जा सकता। महिलाएं कृषि में बहुआयामी भूमिका निभाती आ रही हैं। बुवाई से लेकर रोपाई, निराई, सिंचाई, उर्वरक डालना, पौध संरक्षण, कटाई, भंडारण आदि सभी प्रक्रियाओं से वे जुड़ी हुई हैं। इसके अलावा वे कृषि संबंधी अन्य धंधों जैसे, मवेशी पालन, चारे का संग्रह, दुग्ध और कृषि से जुड़ी सहायक गतिविधियों जैसे मधुमक्खी पालन, मशरूम उत्पादन, सूकर पालन, बकरी पालन, मुर्गी पालन आदि में भी सक्रिय रहती हैं। साफ है, अगर महिलाओं को अच्छा अवसर तथा सुविधा मिले तो वे देश की कृषि को द्वितीय हरित क्रांति की तरफ ले जाने के साथ देश के विकास का परिदृश्य भी बदल सकती हैं।

एक ओर जहां शहरी महिलाएं स्कूलों, कॉलेजों, दफ्तरों, कारखानों आदि में पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिला कर देश के विकास में संलग्न हैं, वहीं दूसरी ओर ग्रामीण महिलाएं खेत-खलिहानों में काम करके देश के आर्थिक विकास में अपना अमूल्य योगदान देती रहीं है। इसके बावजूद समाज में महिलाएं पुरुष से हेय समझी जाती हैं। इतिहास इस बात का साक्षी है कि महिला पुरुष की तुलना में अपने अधिकारों के संदर्भ में सदा उपेक्षित रही हैं, इसीलिए हर समाज में महिलाओं के साथ शोषण, अन्याय और अत्याचार होता रहा है। खासकर ग्रामीण क्षेत्र की महिलाएं और भी अधिक उपेक्षित हैं। देश की कुल आबादी की लगभग सत्तर प्रतिशत ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करती है, जो घोर अशिक्षा, अंधविश्वास और रूढ़ियों से ग्रस्त हैं। देश के विकास में ग्रामीण भारत की महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित करने की आवश्यकता है। अगर भारत में महिला वर्ग की आधी से ज्यादा इस आबादी का विकास नहीं हुआ, तो देश और समाज का विकास नहीं हो सकता।

यह ठीक है कि महिला सशक्तिकरण के मामले में भारत की स्थिति कई मायनों में बेहद अनूठी है। यहां ग्राम पंचायतों में एक तिहाई स्थान महिलाओं के लिए आरक्षित हैं। विधानसभाओं और संसद में भी यही व्यवस्था करने की तैयारी है। फिर भी यह राजनीतिक सशक्तिकरण सामान्य तौर पर ग्रामीण महिलाओं के सामाजिक-आर्थिक ढांचे में पर्याप्त बदलाव नहीं ला पाया है। यही वजह है कि कृषि उद्यम में महिलाओं की भागीदारी होने के बावजूद उन्हें समाज और राज्य से उतना सम्मान नहीं मिलता, जिसकी वे हकदार हैं। हर दृष्टि से वे उपेक्षा की शिकार हैं। यों कहें, ग्रामीण सामाजिक-आर्थिक ढांचे में अब भी पुरुषों का दबदबा है। स्वास्थ्य एवं पोषण सबसे बड़ी चिंताएं हैं। महिलाएं ही पूरे घर के लिए खाना बनाती हैं, पर वे अमूमन भूखी रह जाती हैं। भारत में महिलाओं में कुपोषण के मामले तकरीबन उतने ही ज्यादा हैं, जितने कुछ अफ्रीकी देशों में खाद्य संकट के मामले हैं। बराबर कृषि कार्य के लिए उन्हें पुरुषों को दी जाने वाली मजदूरी की तुलना में कम मेहनताना दिया जाता है। जमीन का मालिकाना हक भी सामान्य तौर पर पुरुषों के नाम होता है। खेती से जुड़े अधिकतर फैसले पुरुषों द्वारा लिए जाते हैं। यह बात गौर करने लायक है कि संपूर्ण सामाजिक व्यवस्था कुछ ऐसी है कि स्त्री को उसके किए गए हर कार्य के लिए यह बताया जाता है कि उसका श्रम, ‘श्रम’ नहीं, घरेलू सहयोग मात्र है और यही कारण है कि अधिकतर महिलाएं जो कृषिकार्य में संलग्न हैं, खुद भी मानती हैं कि वे कोई कार्य नहीं करतीं।

भारत के गांवों को बचाने के लिए खेती को बचाना आवश्यक है, और खेती बचाने के लिए महिलाओं को साधन संपन्न बनाना भी उतना ही आवश्यक है। सरकारी नियमों के हिसाब से अभी किसान केवल वही माने जाते हैं, जिनके नाम से जमीन होती है, ऐसे में कितनी ही महिलाएं किसान के रूप में पहचानी जाने से वंचित रह जाती हैं। आंकड़े यह भी बताते हैं कि अगर महिला किसानों को कृषि कार्य में समान अधिकार हासिल होगा, तो उत्पादन में चालीस फीसद तक की बढ़ोतरी हो सकती है। साथ ही, वे आर्थिक रूप से स्वावलंबी बनेंगी और समाज को भी आगे ले जा सकेंगी। कहा जाता है कि जब आप गांव में एक महिला को सामाजिक और आर्थिक रूप से सशक्त तथा समृद्ध बनाते हैं तो वह महिला न केवल अपने परिवार को, अपने गांव को, बल्कि अपने देश को सुदृढ़ बनाती है। यही मूल कारण बनता है देश के विकास और अर्थव्यवस्था में सुधार का। ऐसे में जरूरत है दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति की।

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