ताज़ा खबर
 

दुश्चक्र में जनता

अजीब दुश्चक्र है। रोगी है तो एंबुलेस नहीं। महंगी एंबुलेस है तो अस्पताल में बिस्तर नहीं। बिस्तर है तो ऑक्सीजन नहीं। ऑक्सीजन है तो टैंकर नहीं। टैंकर है तो सिलेंडर नहीं। जिनके पास सिलेंडर है, उनके पास ऑक्सीजन नहीं और ऑक्सीजन मास्क तक नहीं।

Coronavirus, Ambulance, National Newsकर्नाटक के बेंगलुरू में सुम्मनहल्ली श्मशान के बाहर लगी एंबुलेंस की कतार। (फोटोः पीटीआई)

इन दिनों आप खबर चैनलों को न देख सकते हैं, न झेल सकते हैं! इतनी मौतें और इतने क्लोज किसने सोचा था! एक औरत एक डॉक्टर के पैरों पड़ कर रो रही है कि उसके आदमी को ऑक्सीजन चाहिए और वह डाक्टर कुछ नहीं कर पा रहा है। लाशें जलाने पर कालाबाजारी है। ऑक्सीजन पर कालाबाजारी है। बिस्तर पर कालाबाजारी है। रेमडेसिविर पर कालाबाजारी है। सांस-सांस पर कालाबाजारी है और नेता हैं कि लोगों की जान बचाने की जगह चुनाव जीतने में लगे हैं।

इधर बेचारगी बरपा है, उधर बेशर्मी बरपा है। लेकिन टीके का कारोबार जिंदाबाद। जैसे ही घोषणा होती है कि एक मई से अठारह वर्ष और उससे ऊपर के लोगों को एक मई से टीके लगेंगे तो कुछ आशा बंधती है, लेकिन जैसे ही टीका निर्माता राज्यों को बढ़े दामों पर टीके देना तय करते हैं कि सारी आशा दुराशा में बदल जाती है! कैसा दुश्चक्र? बहसों पर बहसें। एक देश में दो दाम क्यों? और कोई जवाब नहीं। फिर एक दिन टीका प्रभुओं को दया आती है और वे कुछ दाम घटा देते हैं। पहले खूब बढ़ाओ, फिर थोड़ा घटाओ। कारोबार सिर्फ कारोबार है। देशभक्ति गई तेल लेने!

राज्य कहते हैं टीके उपलब्ध नहीं तो एक मई को लगाएं क्या? जब टीके मिलेंगे, तभी लगेंगे। यानी दस-बीस दिन देर से ही लगना शुरू होगा। ऐसी है अपनी महान टीका नीति! न बाबा आवै, न घंटा बाजै। यह है जन भावनाओं से खुलेआम खेलना। एक पल आशा अगले पल निराशा। यह नीति है कि अनीति! जनता की परवाह किसी को नहीं। लोगों में निराशा है, रोष है और इस रोष को चैनल नहीं दिखाते। कोई चैनल सर्वे करके ‘रियलिटी चेक’ नहीं कर रहा कि जनता कितनी नाराज है?

इस कोरोनाकाल में भी हर चैनल पर एक बेशर्म तू-तू, मैं-मैं दिखती रहती है और देखते-देखते टीकाकरण की नीति हास्यास्पद हो उठती है। न टीका, न लगाने की योजना। टीके के लिए पंजीकरण शुरू हुआ तो कोविन प्लेटफार्म बैठ गया। एक मिनट में पचास हजार ने अर्जी दी। हर चैनल आलोचना कर रहा है। अदालतें तक आलोचना कर रही हैं और योजना मांग रही हैं कि क्या कैसे करेंगे। कोई स्पष्टता नहीं।
सरकारों की नाकामयाबियों पर सबसे सख्त, लेकिन सटीक टिप्पणियां अदालतें ही करती हैं। दिल्ली हाइकोर्ट कहता है- ‘ये लड़ाई नहीं, युद्ध है। अस्पतालों में ऑक्सीजन नहीं, डॉक्टर तक रो रहे हैं।’ एक विशेषज्ञ एक चैनल पर गुस्से से भरकर देर तक बोलता रहा कि सबको मालूम था कि दूसरी लहर आएगी। तब तैयारी क्यों नहीं की गई। आगे आने वाले दस दिन और खतरनाक हो सकते हैं। एंकर भी बार-बार पूछते हैं कि जब मालूम था तो तैयारी क्यों नहीं की। लेकिन प्रवक्ता उपलब्धियां गिनाते रहते हैं।

सरकारों ने अपनी जिम्मेदारी जनता पर डालनी शुरू कर दी । एक चैनल पर तीन-तीन विशेषज्ञ देर तक समझाते रहते हैं कि अपनी हिफाजत अपने आप करें। एक डॉक्टर बताते हैं कि अगर ऑक्सीजन पचासी प्रतिशत पर भी हो, तो घबराएं नहीं। घर पर ही उपचार करें। प्राणायाम करें। दो-घंटे पेट के नीचे तकिया लगा कर दो घंटे तक गहरी सांस लें। ऑक्सीजन बेहतर हो जाएगी। फिर दाएं, फिर बाएं लेट कर दो-दो घंटे सांस लें। बहुत जरूरी हो तभी अस्पताल जाएं! केंद्र ने ऑक्सीजन का इंतजाम किया है, लेकिन किल्लत जस की तस है।

अजीब दुश्चक्र है। रोगी है तो एंबुलेस नहीं। महंगी एंबुलेस है तो अस्पताल में बिस्तर नहीं। बिस्तर है तो ऑक्सीजन नहीं। ऑक्सीजन है तो टैंकर नहीं। टैंकर है तो सिलेंडर नहीं। जिनके पास सिलेंडर है, उनके पास ऑक्सीजन नहीं और ऑक्सीजन मास्क तक नहीं। क्या करे आम आदमी? कैमरों के सामने सांसें टूटती हैं। परिजन चीखते और रोते बिलखते हैं। आप डरते रहते हैं। सड़क किनारे लाशें जलती रहती हैं। आप सहमते रहते हैं। सरकारों के चेहरे लटके दिखते हैं और प्रवक्ता पिटे हुए दिखते हैं। कहां गए वे चैनलों में बार-बार दिखने वाले जनता के लिए हर समय जान छिड़कने वाले जन नायक चेहरे!

एंकर और दर्शक धिक्कारने लगे हैं- आप कितना भी विज्ञापन मारो, चैनलों को विज्ञापन दे देकर कितना भी पटाओे, लेकिन सच की एक झांकी तो उन्हें दिखानी ही पड़ती है! और जब वे दिखाते हैं तो अपने राज्य में विकास के कीर्तिमानों का कीर्तन करने वाले तमाम चेहरे उतर जाते हैं।

अमेरिका, रूस फ्रांस जर्मनी आदि चालीस देश मदद करने को तैयार है। एक अदालत टिप्पणी करती है-‘राष्ट्रीय आपातकाल जैसे हालात हैं’, लेकिन केंद्र और राज्य सरकारें भीगी बिल्ली बनी हैं। इतने पर भी चैनलों में एक्जिट पोल दिखाने की होड़ है। एक चैनल के प्रसिद्ध एंकर रोहित सरदाना का हृदयाघात से निधन! एक सप्ताह पूर्व वे कोविड पॉजिटिव हुए थे। आजतक पर यह ब्रेकिंग खबर उनकी सह-एंकर नेहा और चित्रा त्रिपाठी रोते-रोते देती हैं। हमारा भी मन भर उठता है। एक दमदार एंकर को ‘बाखबर’ की ओर से शोक-श्रद्धांजलि!

Next Stories
1 कार्य-संस्कृति की शिथिलता
2 सच के सामने
3 आपदा से तबाही तक
यह पढ़ा क्या?
X