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भीड़ें, नेता और ओमीक्रान का डर

टीवी को भीड़ पसंद है! भीड़ों को टीवी पसंद है, भीड़ों को नेता पसंद हैं! नेताओं को भीड़ पसंद है! भीड़ और नेताओं का ऐसा ही आवयविक संबंध है! यही हाल नए बरस के स्वागत समारोहों का है! जनता मस्ती चाहती है! एंकर डराना चाहते हैं, साथ ही नए साल के आनंदोत्सव को दिखाना भी चाहते हैं!

Piyudsh Jain IT Raid, Kanpur raid news
इत्र कारोबारी पीयूष जैन ने कहा कि उसके पास घर का पुश्तैनी 400 किलो सोना पड़ा था(फोटो सोर्स: PTI)।

बड़ी बिंदी वाले एक बाबा ने अपनी भुजाएं फड़काते हुए कुछ इस प्रकार कहा (जिसे सभी खबर चैनलों ने दिखाया) कि नाथूराम गोडसे को नमन करता हूं कि उसने गांधी को मार डाला… लेकिन एक दाक्षिणात्य भाजपा नेता इन बाबाजी की हिमायत तक करने आ गए!
रायपुर में गिरफ्तारी के वक्त भी बाबा दुर्दम्य दिखे! यह दुर्दम्यता ही सबसे बड़ी वीर मुद्रा है, क्योंकि टीवी पर एक बड़ी खबर बनाने का यश दिनों तक बरकरार रहता है और बहुतों को लगता है कि यही वोट दिलाता है!

ऐसी ‘हेटोक्तियों’ के साथ-साथ इन दिनों यूपी में ‘सपा के लोगों’ के ठिकानों पर छापों का धारावाहिक चल रहा है! पहले कानपुर के इत्र व्यवसायी पीयूष जैन के यहां छापे डले, जो ‘रेड’ फिल्म की याद दिलाते रहे : दीवारों तक से इतने नोट निकले कि दर्जनों फ्रैंकिंग मशीनें चार दिनों तक गिनती करती रहीं। करोड़ों का चंदन तेल और सोना समेत एक सौ सत्तावन करोड़ रुपए से अधिक की बरामदगी हुई बताई गई, जिसको एक ट्रक में सुरक्षा के साथ ले जाया गया!

लेकिन सपा के दुर्दमनीय नेता अखिलेश यादव ने तुरंत ही, छापों को भाजपा की आसन्न हार की हताशा और बदले की कार्रवाई बताया और पीयूष जैन को भाजपा का आदमी बताया!
कई रिपोर्टर और एंकर चकित होकर पूछते रहे कि अगर यह बदले और हताशा की कार्रवाई न होती, तो भाजपा अपने बंदे पर क्यों छापे डलवाती?
लेकिन असली नेता वो, जो सिर्फ अपनी चलाए और बात की बात में बात को ऐसा घुमाए कि हर चीज के लिए अपने रकीब को जिम्मेदार ठहरा दे! अखिलेश ने यही किया!

इस तू-तू मैं-मैं में दर्शकों को जो मजा नोटों के पहाड़ को देख कर आया वह ‘रेड’ फिल्म के सीनों से भी बढ़ कर था! कौन कहता है कि अपुन गरीब मुल्क हैं? एक एंकर कहता रहा कि जांच एजेंसी नाम उजागर करे, लेकिन कौन सुने?

शुक्रवार की सुबह जब कन्नौज के ‘समाजवादी इत्र’ बनाने वाले पुष्पराज जैन के यहां छापे पड़े तो अखिलेश ने कन्नौज से प्रेस कान्फ्रेंस में, पहले कन्नौज को सुगंध की राजधानी बताया, फिर वही दुहराया कि पहला छापा भाजपा ने अपने बंदे के यहां डाला था। अब अपनी खीझ मिटाने के लिए समाजवादी इत्र के पुष्पराज जैन और कई अन्यों पर छापा डाला है! भाजपा यह बताए कि इससे सपा का क्या संबंध है… चुनाव में अपनी हार देख भाजपा हताश हो चली है… यह इसलिए सपा के यहां छापे डलवा रही है… यह जनता का ध्यान बंटाने की साजिश है… सपा भाईचारे की सुगंध फैलाती है, भाजपा सांप्रदायिकता की दुर्गंध फैलाती है… इतनी ब्लैकमनी का होना पीएम की नोटबंदी की विफलता है…यानी चोरी के लिए चोर नहीं, दारोगा जिम्मेदार है!

एक दिन सभी खबर चैनलों ने सलमान खान को अपने जन्मदिन पर अपनी बहादुरी जताते दिखाया कि एक करैत सांप ने उनको तीन बार ‘किस’ किया! उधर खबरें बताती रहीं कि उनको इलाज के लिए छह घंटे अस्पताल में रहना पड़ा, लेकिन बुरा हो उनके दुश्मनों का कि हमदर्दी दिखाने की जगह पोल खोलने पर उतारू हो गए कि अपने जन्मदिन के बहाने सलमान ‘टाइगर जिंदा है-तीन’ की मार्केटिंग कर रहे थे!

एक दिन प्रधानमंत्री ने (यों वे किस दिन नहीं बोलते?) पंद्रह से अठारह बरस के युवाओं को टीका लगाने और रोगी उम्रदराज को ‘सावधानी टीका’ (बूस्टर) लेने के लिए कह कर कई एंकरों को निहाल कर दिया! कई तो बच्चों की तरह चहक कर प्रधानमंत्री को धन्यवाद देते दिखे!
समझ न आया कि एक सामान्य-सी राजकीय ड़्यूटी को ऐसे विह्वल भाव से क्यों लिया गया?

सबसे दिलचस्प चर्चाएं ओमीक्रान की तीसरी लहर की भयावहता को बताने वाली होती हैं! बताने की पद्धति के अनुसार कुल संख्या बताने की जगह प्रतिशत पहले बताइए, सोलह सौ मामलों को चार सौ प्रतिशत बढ़ा बताइए। ओमीक्रान की सुनामी आ रही है, घोषित कराइए! एंकर भी इस खेल में शामिल दिखते हैं! एक एंकर ने जब कहा कि ओमीक्रान घातक नहीं बताया जा रहा है, तो डाक्टर बोला कि यह सिर्फ ओमीक्रान नहीं है, इसमें डेल्टा मिला है। तब क्या यह बहुत खतरनाक हो सकता है, तो कहा गया कि बिल्कुल खतरनाक हो सकता है, लेकिन अभी आकंड़ा नहीं है। जब आंकड़ा नहीं तो खतरनाक कैसे कह रहे हैं, सरजी!

सिर्फ प्रियंका गांधी ने ‘रैली न करने के विचार’ का पांसा फेंका है, जिसे कोई दल नहीं छू रहा!
इसी तरह इन दिनों कई चैनलों द्वारा ओमीक्रान की जगह उसके ‘तेजी से फैलने का डर’ बेचा जा रहा है और चुनाव की रैलियों पर प्रतिबंध लगाने का अभियान चलाया जा रहा है!

टीवी को भीड़ पसंद है! भीड़ों को टीवी पसंद है, भीड़ों को नेता पसंद हैं! नेताओं को भीड़ पसंद है! भीड़ और नेताओं का ऐसा ही आवयविक संबंध है! यही हाल नए बरस के स्वागत समारोहों का है! जनता मस्ती चाहती है! एंकर डराना चाहते हैं, साथ ही नए साल के आनंदोत्सव को दिखाना भी चाहते हैं!

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