अमेरिका के तीन महापाप

सैम अंकल! आप बीस साल तक उनको ‘बीनते’ रहे, लेकिन अंतत: तालिबान, अलकायदा, आइएसआइएस, हक्कानी और पाकिस्तानी सबने मिल कर आपकी ऐसी बीन बजाई कि हथियार छोड़, बिना कपड़ों के भागते नजर आए!

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अफगानिस्तान के हामिद करजई इंटरनेशनल एयरपोर्ट से निकलते हुए लोग। (फाइल फोटोः रॉयटर्स)

चैनलों की बहसें बताती हैं कि किस तरह से तालिबानों को अमेरिका ने पहले चढ़ाया, फिर उनको ‘गुड-बैड’ की तरह बताया, जबकि भारत के विदेश और सामरिक विशेषज्ञ समझाते रहे कि पूरे बीस साल तक पाकिस्तान और तालिबान ने अमेरिका को मूर्ख बनाया, लेकिन मतिमंद अमेरिका अब तक नहीं समझ सका कि तालिबान हों या अलकायदा या आइएसआइएस खुरासानी, सब एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं!

क्या आप चाहेंगे कि अमेरिका दोबारा हमला करे?’ एअरपोर्ट पर दो-दो फिदायीन हमले देख चिंतातुर एंकर विशेषज्ञ से पूछता है? विशेषज्ञ उसका मुंह ताकने लगता है! हर खबर और हर चर्चा में ‘जो बाइडेन’ जोकर लगते हैं और महाबली अमेरिका निरा बेवकूफ नजर आता है!
डर के मारे बाहर जाने को आतुर अफगान एअरपोर्ट के गिर्द बहते नाले में खड़े हैं। शाम का वक्त है कि एक फिदायीन विस्फोट, फिर चंद मिनट बाद पास के होटल में दूसरा विस्फोट होता है और तालिबान के मायने आतंकवादी होने लगते हैं। अपने चैनल सीएनएन, अलजजीरा, बीबीसी और फ्रांस 18 टीवी से लेकर फुटेज दिखाते हैं! शुक्रवार की सुबह तक विस्फोटों से मरने वालों की संख्या सौ तक पहुंच जाती है!

धमाके किसने किए? ‘आइएसआइएस’ ने किए!
मगर आइएसआइएस और तालिबान तो दुश्मन ठहरे!
अब ऐसी ‘घामड़ एक्सपर्टता’ को क्या कहा जाए, जो इतना भी नहीं जानती कि तालिबान और आइएसआइएस को एक करने वाला विचार ‘इस्लामिक अमीरात ऑफ अफगानिस्तान’ में निहित है!

इधर धमाके, उधर अमेरिका के राष्ट्रपति ‘जो बाइडेन’ और उनके सलाहकार पेंटागन में! ज्यों ही काबुल एअरपोर्ट को कंट्रोल करते तेरह अमेरिकी सैनिकों के मरने की खबर आई, वैसे ही बाइडेन जी बुशवाली स्टाइल में दहाड़ने लगे कि न भूलेंगे न माफ करेंगे, जिन्होंने ये किया है उनको बीन-बीन कर मारेंगे!

सैम अंकल! आप बीस साल तक उनको ‘बीनते’ रहे, लेकिन अंतत: तालिबान, अलकायदा, आइएसआइएस, हक्कानी और पाकिस्तानी सबने मिल कर आपकी ऐसी बीन बजाई कि हथियार छोड़, बिना कपड़ों के भागते नजर आए!

एक विशेषज्ञ कहता है कि अमेरिका के तीन महापाप हैं! पहला, तालिबान से समझौता कर उनके अहंकार को बढ़ाना, दूसरा तालिबानों के लिए अरबों डॉलर के एक से एक अत्याधुनिक अमेरिकी हथियार छोड़ भागना, जिनमें हजारों ‘एम 16 असाल्ट राइफलें’, दर्जनों ‘ब्लैक हॉक हेलीकॉप्टर’ और अग्रणी ‘फाइटर बांबर’ छोड़ना और तीसरा पाप, आतंक की नर्सरी पाकिस्तान के खेल को न देख पाना है!

इस तीखी टिप्पणी को सुन चार चार पश्चिमी विशेषज्ञ तिलमिलाते रहे और अपनी ‘असहमति’ जताते रहे!
लेकिन ‘देसी तालिबानी मेंटलिटी’ को क्या कहिए, जो हिंदुत्ववादियों और तालिबान को एक समान बताते हैं! जब एंकर पूछता है कि किस हिंदुत्ववादी ने कब कहां बारह बरस से चालीस बरस की औरतों से बंदूक की नोंक पर जबरिया निकाह करने को कहा? कब किसी औरत को सरेआम कोड़े मारे? गोली मारी? कब किसी का हाथ काटा? नेल पॉलिश के लिए अंगुलियां काटीं? हिंदुत्ववादी संविधान को मानते हैं, शरीआ को नहीं… तब ऐसे कथित ‘उदारवादी’ भारत में होने वाले ‘रेप’ को गिनाने लगते हैं!

ऐसी बेतुकी तुलना का कोई क्या करे?
चैनलों की बहसें बताती हैं कि किस तरह से तालिबानों को अमेरिका ने पहले चढ़ाया, फिर उनको ‘गुड-बैड’ की तरह बताया, जबकि भारत के विदेश और सामरिक विशेषज्ञ समझाते रहे कि पूरे बीस साल तक पाकिस्तान और तालिबान ने अमेरिका को मूर्ख बनाया, लेकिन मतिमंद अमेरिका अब तक नहीं समझ सका कि तालिबान हों या अलकायदा या आइएसआइएस खुरासानी, सब एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं!

फिदायीन हमले की जिम्मेदारी आइएसआइएस खुरासानी ने ली, लेकिन अमेरिका फिर भी कहता रहा कि वह ऐसा नहीं मानता!
जिन तालिबानों के ‘तत्त्ववाद’ को अपनी गली का बच्चा तक अच्छी तरह समझता है, उनको ये ‘हारवर्डी एक्सपर्ट’ अब भी ‘मासूम गंवई छोरे’ (इन्नोसेंट कंट्री बॉयज) मानते हैं!

बहरहाल, अफगानिस्तान संकट पर विचार करने के लिए सरकार ने एक सर्वदलीय बैठक वृहस्पतिवार को बुलाई, जिसमें इकतीस विपक्षी दलों के नेता आकर साढ़े तीन घंटे चर्चा की, सरकार की ‘देखो और इंतजार करो’ की नीति पर सहमति जताई और फंसे भारतीयों को निकालने की नीति पर सरकार की प्रशंसा की और जो फंसे हैं उनको जल्दी से जल्दी लाने के लिए कहा!

फिर भी एक डरावनी खबर हर चैनल पर तनी रहती है कि एक सौ चालीस अफगानी सिखों को तालिबान अगवा करके कहीं ले गए हैं जहां वे ‘सबद कीर्तन’ करके एक-दूसरे को ढांढस बंधा रहे हैं!
ये है तालिबानी लीला, शुद्ध ‘कम्युनल’ लीला कि हिंदुओं को आने देते हैं और सिखों को रोक लेते हैं!
इसी सप्ताह महाराष्ट्र में भाजपा के राणे जी की सीएम के ‘कान के नीचे लगाने’ वाली भाषा दिखती है तो जवाब में शिवसैनिकों की सड़क छाप ‘ठोकशाही’ दिखती है!

कोरोना की तीसरी लहर शायद केरल में चल रही है! आधे से अधिक कोरोना के मामले सिर्फ केरल से आ रहे हैं! उस महान ‘केरल मॉडल’ का क्या हुआ साथी? तालिबान, दूसरी ओर कोरोना! इन दिनों हर तरफ डर का साम्राज्य है!

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