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भूलत सब पहिचान

नकारात्मक खबरों के बीच एक सकारात्मक खबर डीआरडीओ देता है : कोविड से बचाने के लिए उसने ‘2 डीजी’ नामक दवा बनाई है, जो फेफड़ों में रक्षात्मक दीवार बना देती है, जिससे कोविड आक्सीजन नहीं सोख पाता। गनीमत है कि इस पर किसी कृपालु ने कृपा नहीं की!

बिहार के सारण जिले के जयप्रभा सेतु से घाघरा नदी पर फेंकी जा रही हैं कोविड से मृत लोगों की लाशें। (फोटो-पीटीआई फाइल)

जलती लाशें। गंगा में बहती लाशें। कव्वों और कुत्तों द्वारा चींथी जाती लाशें! बिहार की लाशें? नहीं, यूपी से आती लाशें। आक्सीजन में पांच मिनट की देर और मरे पांच मरीज! बिहार के एक अस्पताल की उस औरत की व्यथा कथा : इधर पति मरता रहा, उधर कंपाउंडर उसका दुपट्टा खींचता रहा! ‘नो एक्शन’! पप्पू यादव ने एंबुलेंस कांड का भंडाफोड़ किया और जवाब में उन पर कोविड प्रोटोकाल तोड़ने का मामला ही चिपका दिया गया।

गांव-गांव फैल रहा कोविड का कहर। गांव-गांव से दस दस, बीस बीस की मौतें! खेतों में पड़े अनाथ मरीज। अस्पताल दूर-दूर तक नहीं। एक हिंदी कोसता है : चले थे बनाने सोने की चिड़िया और बना डाला श्मशान! और चैनलों की दैनिक बहसें यानी अपनी बला दूसरे के सिर डाल! श्रेय अपना, दुश्रेय का ठीकरा दुश्मन के सिर फोड़! चर्चाओं में बेशर्मी बरसती है। इसकी गलती, उसकी गलती, लेकिन मेरी नहीं! मेरी बेशर्मी तेरी बेशर्मी से भी अधिक बेशर्म! हर शाम टीवी की बहसों में हजार बेशर्मियां सज-संवर कर बैठती हैं और एक-दूसरे की चोटी खींचती हैं। एंकर इनको बहसें कहते हैं!आक्सीजन की किल्लत खत्म, तो वैक्सीन की किल्लत पर घमासान। वैक्सीन नीति पर जंग! टीकाकरण के लिए केंद्र ने वैक्सीन खरीदी, तो राज्य बोले हमें भी वैक्सीन खरीदने दो। जब कहा, खरीद लो तो कहने लगे कि केंद्र ही खरीद कर दे।

कोई किसी तरह राजी नहीं। अभी हां, अभी ना! न केंद्र बड़ा दिल दिखाता है, न राज्य! लोग मरते रहते हैं। नेता एक-दूसरे पर आरोप लगाते रहते हैं। चौबीस गुणे सात का खेल है। टीकाकरण आधा-अधूरा है। कुछ राज्य वैक्सीन के लिए टेंडर देते हैं, कुछ अठारह से चौवालीस तक की उम्र वालों को वैक्सीन लगाने से मना कर देते हैं। कोविड से लड़ने की जगह लोग आपस में लड़ते हैं।

उधर विदेशी मीडिया लाशें दिखाने लगता है और मोदी की छवि पिटने लगती है! विदेशी मीडिया भक्त एंकर तुरंत बहसें कराने लगते हैं कि कोविड बरक्स मोदी! एक कोरस-सा उठाया जाने लगता है : मोदी जा मोदी जा! मोदी जा! मोदी गए मोदी गए मोदी गए! अब गए तब गए अब गए गए गए और गए! चौबीस में तो गए ही समझो!

कल तक के भक्त रहे और अचानक आलोचक बनते एंकर की बहस में एक ज्ञानी उवाचते हैं : मोदी का हनीमून खत्म। दुर्जेय छवि खलास। सरकार फेल। पहले लोग आलोचकों को भक्त ‘शटअप’ कर देते थे, अब नहीं कर पाते। लेकिन विकल्प में कौन है? एक भक्त : विदेशी मीडिया तो पहले ही मोदी का दुश्मन रहा और सिर्फ मध्यवर्ग नाराज है! एक निंदक : महामारी ने मोदी की आत्मरतिवादी छलिया राजनीति की पोल खोल दी। एक प्रवक्ता : अपनी आबादी तो देखो। ‘मोदी जा रहे हैं’ ऐसा सोचने वालों को कहीं ‘हार्ट अटैक’ न हो जाए! एक पूर्व कांग्रेसी वक्ता : यह संस्थानगत हत्याएं हैं!

फिर एक दिन एक अंग्रेजी चैनल देर तक ‘नुस्खों’ को डॉक्टरों से कुटवाता है, लेकिन डॉक्टर नहीं बताते कि जो अस्पतालों के दस-पंद्रह लाख का बिल नहीं दे सकते वे क्या करें और अगर डॉक्टरी इलाज सही है, तो डॉक्टर पहले ‘हिपोक्रिट ओथ’ क्यों लिखते हैं?

इस सप्ताह तीन चैनलों ने बारी-बारी से कोविड महामारी के जरिए ‘जैविक युद्ध’ फैलाने के लिए चीन को जिम्मेदार ठहराया, तो एक वामपंथी कामरेड ने गजब का तर्क दिया कि चीन तो मारेगा ही, लेकिन आपने बचने की तैयारी क्यों नहीं की? यह किस ब्रांड का मार्क्सवाद है कामरेड, कि जो मारने वाले की जयकार करता है और पिटने वाले को ही पिटने का जिम्मेदार ठहराता है!

इसी बीच टिकरी बार्डर से रिपोर्टेड ‘सामूहिक बलात्कार’ की खबर सिर्फ एकाध चैनल पर दिखी। बाकी चैनल ‘पोलिटीकली करेक्ट’ वाली चुप्पी साधे दिखे। उनके लिए हाथरस का ‘सामूहिक बलात्कार’ तो ‘सामूहिक बलात्कार’ था, लेकिन टिकरी बार्डर का ‘सामूहिक बलात्कार’ मानो था ही नहीं! धन्य है कथित ‘यथार्थवादी’ मीडिया!

नकारात्मक खबरों के बीच एक सकारात्मक खबर डीआरडीओ देता है : कोविड से बचाने के लिए उसने ‘2 डीजी’ नामक दवा बनाई है, जो फेफड़ों में रक्षात्मक दीवार बना देती है, जिससे कोविड आक्सीजन नहीं सोख पाता। गनीमत है कि इस पर किसी कृपालु ने कृपा नहीं की!
फिर एक दिन वैक्सीन नीति बदलती है : कोविशील्ड की पहली खुराक के बाद दूसरी छह महीने बाद ली जा सकती है! वैक्सीन की कमी ही वैक्सीन की नीति बनी! सच! नंगा क्या ओढ़े, क्या बिछाए?

एक भाजपा नेता झल्लाता है : वैक्सीन बनाने वाले वैक्सीन नहीं बना रहे तो क्या फांसी लगा लें! एक पूर्व मुख्यमंत्री दर्शन बघारता है : कोरोना को भी जीने का अधिकार है! गजब के ‘सेल्फगोल’!

इस बीच एक अमेरिकी मोदीभक्त भारत को ‘कोविड नरक’ बता कर मोदी को ‘दाढ़ी वाला बहादुरशाह जफर’ कहता है और क्रांतिकारी एंकर मुस्कुराने लगता है। फिर छह बरसों तक मलाई काटने के बाद दूसरा मोदीभक्त मोदी को ही प्रबोधता है कि छवि की जगह काम पर ध्यान दें। सच कहा है:
दुर्दिन पड़े रहीम कहि, भूलत सब पहिचान! सोच नहीं बित हानि की, जो न होय हित हानि!!

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