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हिजाब और भगवा गमछा

एक मुसलिम लड़की ने कहानी साफ की कि कुछ दिन पहले तक ये छह लड़कियां बिना हिजाब के आती थीं, फिर अचानक हिजाब में आने लगीं! कालेज ने अपने नियमानुसार इनको जब आने नहीं दिया, तो संगठन ने हिजाब के पक्ष में आंदोलन करना शुरू कर दिया…

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'Hijab' Controversy को लेकर पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता में मोमबत्तियां और तख्तियां लेकर प्रदर्शन करते हुए मुस्लिम महिलाएं। (फोटोः पीटीआई)

लता मंगेशकर के निधन ने खबर चैनलों को ऐसे गानों को खोजने के लिए मजबूर कर दिया, जिनसे लता के होने के मानी भी साफ हो सकते हों। इसलिए हर चैनल अपना-अपना गाना बजाता रहा। कोई ‘मेरी आवाज ही पहचान है…’ बजाता, दूसरा ‘रहें न रहें हम महका करेंगे…’ बजाता रहा!

चैनल लता को देश की आवाज, आजाद राष्ट्र की आवाज, भारत रत्न, स्वर कोकिला… जैसे विशेषणों से नवाजा! लता ने कितने गाने गाए, इस पर चैनलों में खासा भ्रम रहा, कोई बताता आठ हजार गाने गाए, कोई कहता तीस हजार गाए! आश्चर्य कि किसी ने इस मामले में अपेक्षित शोध तक करने का कष्ट न किया!

कई चैनलों ने हरीश भिमानी से उनके संस्मरण सुनवाए कि लता किस तरह से अपने गायन को आजीवन गंभीरता से लेती रहीं और किस तरह से मंच पर गाने से पहले वे हमेशा रिहर्सल करती थीं और इतनी बड़ी गायिका होने पर भी वे यही कहतीं कि मैं जो कुछ हूं, चाहने वालों की वजह से हूं, वरना मैं कुछ नहीं हूं… इन अहंकारी दिनों में ऐसी विनम्रता विरल ही है!

लता जी प्रधानमंत्री की पक्की मुरीद थीं। यह बात पीएम की लता के साथ एक पुरानी बातचीत के एक चैनल द्वारा बजाने से मालूम हुई! जब प्रधानमंत्री ने कहा कि आप बहुत बड़ी हैं, तो लता जी ने कहा, आप नहीं जानते आप क्या हैं? आपके आने से देश का चित्र बदल रहा है… लता की लोकप्रियता का इतना दबाव रहा कि ऐसा कहने के लिए किसी ने उनकी कुटाई नहीं की!

राष्ट्रपति के अभिभाषण के धन्यवाद प्रस्ताव पर प्रधानमंत्री ने लोकसभा में कांग्रेस को अपने व्यंग्य वाणों से अच्छी तरह बेधा! इसके बाद ‘एएनआई’ को एक लंबा साक्षात्कार देकर प्रधानमंत्री ने फिर विपक्ष का यह आरोप आमंत्रित किया कि वे चुनाव के दिनों में टीवी पर दिखने का कोई मौका नहीं छोड़ते!

दिल्ली-मेरठ मार्ग पर जब ओवैसी के काफिले पर दो लोगों के गोलियां चलाने की खबर ने पहले सनसनी बनाई, फिर दोनों गोली चलाने वालों की गिरफ्तारी ने सनसनी को ठंडा किया, फिर ओवैसी द्वारा जेड श्रेणी की सुरक्षा को बार-बार ठुकराने ने उनको ‘विक्टिम’ खेलने के खेल से बाहर कर दिया!

इसके आगे के तीन-चार दिन कर्नाटक के ‘वर्दी विरोध’ के नाम रहे। तीन-चार दिन तक परिचित बहसें उठती-गिरती रहीं। कर्नाटक के कुंडापुर के एक कालेज द्वारा छात्रों के लिए वर्दी अनिवार्य करने और हिजाब आदि पर पाबंदी लगाने के विरोध में, ‘कैंपस फ्रंट आफ इंडिया’ की एक कार्यकर्ता द्वारा, भगवा गमछा पहने, ‘जय श्रीराम’ के नारे लगाते बीस-तीस युवकों के बीच अपना दांया हाथ उठा कर ‘अल्लाहू अकबर’ का जवाबी नारा लगाते हुए गुजरना और ओवैसी द्वारा उसे ‘बहादुर बेटी’ का खिताब देना चैनलों में छा गया।

फिर ऐसे ही दृश्य कर्नाटक के शिमोगा, रावनगीरी, उडूपी के अलावा कोलकाता, चेन्नई, हैदराबाद श्रीनगर और अलीगढ़ तक में दिखने लगे! और चैनलों की बहसें पूछती रहीं : वर्दी जरूरी या पढ़ाई? इस्लाम में हिजाब अनिवार्य है कि नहीं? इस्लाम पहले कि देश का कानून? कट्टरपंथी और नरमपंथी भिड़ते रहे और बजता रहा ‘ध्रूवीकरण-ध्रूवीकरण’!

एक अंग्रेजी एंकर ने मुस्कान से बात करते हुए उसे ‘भगवा गमछा गिरोह’ को चुनौती देने वाली एक नई वीरांगना के रूप में पेश किया! दूसरे चैनल में एक मुसलिम लड़की ने कहानी साफ की कि कुछ दिन पहले तक ये छह लड़कियां बिना हिजाब के आती थीं, फिर अचानक हिजाब में आने लगीं! कालेज ने अपने नियमानुसार इनको जब आने नहीं दिया, तो संगठन ने हिजाब के पक्ष में आंदोलन करना शुरू कर दिया… जब मामला हाईकोर्ट गया तो उसने अपने अंतरिम आदेश में कहा कि अदालत के फैसले तक कोई न ‘हिजाब’ पहन कर आएगा और न ‘भगवा गमछा’ पहन कर आएगा…

अदालत के इस आदेश के बावजूद आंदोलन बंद नहीं हुआ, बल्कि मालेगांव, अलीगढ़ और श्रीनगर तक फैल गया! इतना ही नहीं, हिजाब के मामले में पाक ने आग में घी डालने का काम किया और तालिबान ने भी अपनी आहुति डाली!

बहरहाल, पहले चरण में साठ प्रतिशत वोट पड़े, लेकिन किसी भी चैनल ने यह साफ नहीं किया कि किसका पलड़ा भारी रहा? लेकिन शुक्रवार की दोपहर कासगंज की एक जनसभा में प्रधानमंत्री ने ही सूचना दी कि कल के वोट के बाद विपक्षियों का चेहरा लटक गया है…
लेकिन वृहस्पतिवार की शाम एक चैनल ने एक तथाकथित अंतरराष्ट्रीय पत्रकार के ‘चैरिटी फंड स्केंडल’ का भंडाफोड़ करके सबको चौंका दिया!

प्रवर्तन निदेशालय की मार्फत एंकर बताता रहा कि किस तरह उसने पहले गरीबों और कोविड-शिकारों की मदद के लिए कोई ढाई करोड़ रुपए इकठ्ठे किए, फिर उनको अपने और बहन के निजी खातों में जमा किया और बहुत-सा पैसा अपने ऊपर भी खर्च किया! जब प्रवर्तन निदेशालय ने दबिश डाली, तो बचने के लिए पत्रकार ने एक बड़ी रकम ‘पीएम केअर फंड’ को भी दी! इस पर भी उसके पक्षधर कहते रहे कि से बदले की कार्रवाई है! अरे भाई, जनता के धन को निजी खातों में रखना और अपने ऐश पर खर्च करना भी क्या कोई और करवा रहा था?

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