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बीच बहस में सबूत

हिंदू पक्ष की नजर में जो ‘शिवलिंग’ था वही मुसलिम नजर में ‘फव्वारा’ था। पत्रकार पूछते रहे कि साढ़े तीन सौ बरस पहले ऐसी कौन-सी तकनीक थी, जिससे फव्वारा तालाब में पानी फेंकता था? इसका जवाब किसी के पास न दिखा!

Gyanvapi Mosque
Gyanvapi Mosque Survey पर बोले ओवैसी- 'ज्ञानवापी थी, है और रहेगी, इस बार नहीं छीन पाओगे'

मैं मस्जिद खो चुका हूं, दूसरी देने को तैयार नहीं… बाबरी मक्कारी से छीनी थी… अब नहीं होने देंगे…’ इन दिनों ओवैसी ऐसे बोलते हैं जैसे ज्ञानवापी उनकी निजी संपत्ति हो! इसे देख कर एक प्रवक्ता बोला : वे दूसरे जिन्ना बनने की कोशिश में हैं…’ उनकी नजर में सर्वे गैरकानूनी, रिपोर्ट भी गैरकानूनी! वे कहते रहे कि यह सर्वे ‘पूजास्थलों की सुरक्षा’ वाले (1991) कानून के खिलाफ है…

ओवैसी के आलोचक कहते हैं कि इन्होंने कानून को कब माना? कानून से फायदा है तो कानून कानून, नहीं तो ‘शरीआ’! बहसों में निरी दुश्मनी बरसती है : एक कट्टर मुसलिम नेता ज्ञानवापी को मंदिर मानने वाले एक मुसलिम वकील से कह देता है कि लखनऊ आकर तुझे इतने जूते मारूंगा कि सब भूल जाएगा… एंकर को उसे ‘गेट आउट’ कहना पड़ता है। लेकिन फिर एक शाम वही चेहरा एक चैनल पर दिखने लगता है। अरे भाई! ऐसे गलीछापों को क्यों बुलाते हो?

खबरों और बहसों का रंग तब बदला, जब पहले दिन का सर्वे हुआ और जब ज्ञानवापी के पक्षकार सोहनलाल आर्य ने कैमरों में यह कहा कि ‘बाबा मिल गए’! यह ‘बाइट’ इतिहास बनाती दिखी! इसके आगे की बहसों ने ‘बेशर्मी’ और ‘कुतर्क’ का रास्ता अपनाया। हिंदू पक्ष की नजर में जो ‘शिवलिंग’ था वही मुसलिम नजर में ‘फव्वारा’ था। पत्रकार पूछते रहे कि साढ़े तीन सौ बरस पहले ऐसी कौन-सी तकनीक थी, जिससे फव्वारा तालाब में पानी फेंकता था? इसका जवाब किसी के पास न दिखा!

बहसों के बीच सभी चैनल ‘लीक्ड’ वीडियो के जरिए ‘शिवलिंग’ को दिखाते रहे। उसके शीर्ष पर अलग से सीमेंट चिपकाया गया लगता था, ताकि वह फव्वारा-सा लगे! तो भी फव्वारावादी कहते रहे कि फव्वारा हर मस्जिद में होता है, ताजमहल में है, लेकिन वे यह न बता सके कि तालाब के कुएं में नीचे की ओेर लगा फव्वारा ऊपर की ओर पानी कैसे फेंकता था?

फिर एक दिन सारे चैनल ज्ञानवापी के सामने थे, जिनमें अधिकांश काशीवासी बताते कि काशी के कण कण में बाबा हैं… ‘हर हर महादेव!’
बहसों में ‘इतिहास’ की ‘एंट्री’ जैसे ही हुई, वैसे ही बहसें एकदम निर्मम हो उठीं : कुछ पूछते कि इस्लाम में मस्जिद का नाम ‘ज्ञानवापी’ कैसे हो सकता है? और जवाब न आता। फिर ज्ञानवापी के पक्षकार बताते कि कब-कब, किस-किस बादशाह ने इसे तोड़ा। फिर वे औरंगजेब के फरमानों में लिखे को बताते, तो विचलित होकर मुसलिम पक्षकार कहने लगते कि इतिहास का बदला आज क्यों?

एक हिंदू पक्षकार ने इसके जवाब में कहा कि जब इस्लामिक आक्रांताओं ने मंदिर तोड़े तब हम कमजोर थे, अब हम ताकत में हैं। अब हम इस्लामी अतताइयों द्वारा तोड़े गए सभी चौवालीस हजार मंदिरों को वापस लेंगे… ऐसी बातें सुन कर उस बहस में कुछ देर के लिए सन्नाटा-सा छाया रहा। ऐसी ही एक बहस में एक कथित सेक्युलर चैनल की एंकर रुआंसी-सी होकर पूछती रही कि यह सिलसिला आखिर कहां जाकर रुकेगा?

ऐसी ही एक बहस में सपा की नेता रूबीना खानम ने कहा कि अगर वह हिंदू पूजास्थल सिद्ध होता है, तो मुसलमानों को चाहिए कि उसे हिंदुओं को दे दें… लेकिन अखिलेश ने ‘कहीं भी पत्थर रख दो हो गया मंदिर’ कह कर रूबीना के किए-धरे पर पानी फेर दिया। फिर एक दिन जैसे ही ओवैसी के भाई ने औरंगजेब के मकबरे पर फूल चढ़ाए, उसी दिन मकबरे को लेकर जोखिम बढ़ गया! पहरा बिठाना पड़ा।

बहरहाल, 19 मई को जैसे ही सर्वे रिपोर्ट जमा हुई, वैसे ही वह सभी चैनलों में आ गई और सारी दुनिया ने जाना कि सर्वे में ‘शिवलिंग’ के अलावा हिंदू धर्म के चिह्न जैसे डमरू, कमल, स्वस्तिक, त्रिशूल, शिवलिंग, ताखा, सिंदूर, श्लोक आदि मिले हैं। बहरहाल, गुरुवार की शाम दो अंग्रेजी एंकरों के सुर बदले दिखे। वे आग्रह करते दिखे कि जब इतने प्रमाण हैं, तो बेहतर है कि दोनों पक्ष आपस में मिल कर इस मामले को सुलटा लें!

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