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नजर नजर का फेर

चुनाव आयोग ने तो पांच राज्यों के चुनावों की बात की थी, लेकिन खबर चैनलों को सिर्फ बंगाल में चुनाव दिखते हैं। चैनलों का जितना फोकस बंगाल पर है, उतना तमिलनाडु, पुदुचेरी या केरल के चुनाव पर नहीं है! कारण है: चैनल दिल्ली वाले तो चुनाव भी दिल्ली वाले की नजर से!

bakhabarपश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी और शिवसेना नेता संजय राउत। (फोटो- पीटीआई)

सबसे अधिक तेजाबी बहसें कांग्रेसी और भाजपा प्रवक्ताओं के बीच जमती है। एक दूसरे को बोलने नहीं देता। और अगर महिला प्रवक्ता हों तो कहने ही क्या? ऐसे ऐसे दर्पाेद्धत चेहरे एक दूसरे पर झपटते नजर आते हैं कि अगर सामने हों तो एक दूसरे को नोच डालें! कोई भी अपनी पार्टी और अपने बॉस पर एक ताना तक बर्दाश्त नहीं करती।
विचारों से ज्यादा नेताओं के चेहरे बोलते हैं : ममता जी हर समय गुस्से में दिखती हैं। शिवसेना के संजय राउत का चेहरा प्राय: भिन्नाया दिखता है। इनके बरक्स सबसे शांत और मुस्कुराता चेहरा योगी जी का नजर आता है। कांग्रेस के नेता अधीर रंजन चौधरी बोलते वक्त अधीर नजर आते हैं!

एक शाम एक चैनल पर एक महान अर्थशास्त्री अपने राहुल भाई से बातचीत करने को मरा जा रहा नजर आता है और राहुल भाई भी उसे अपनी प्रतिभा से चकित करते चलते हैं। फिर एक दिन यही पहुंचा हुआ अर्थशास्त्री देर तक बताता रहता है कि इंडिया का तो बेड़ा गर्क हुआ समझो। बच्चे भी बौने पैदा होंगे। दूसरा अर्थशास्त्री भारत के आर्थिक संकट पर अपना ‘तबसिरा नस्र’ करता है, फिर तीसरा एंकर द्वारा की गई तारीफ पर शर्मिंदा होने की जगह गर्वित दिखता है। अमेरिका में रहने वाले कई ज्ञानीजन हमारी चिंता में साल में एक बार जरूर दुबले होते नजर आते हैं! और, सरकार की मेहरबानी कि चार दिन से पेट्रोल डीजल के दाम नहीं छुए। इस पर कई रिपोर्टर सरकार के ‘वल्ले वल्ले’ गाते दिखे! सरकार भी कितने दुश्मन बनाए? लेकिन सच्चे भक्त प्रशंसा का कोई मौका नहीं छोड़ा करते!

लीजिए एक दिन सरकारी ‘तोते’ ने पिंजड़े से निकल कर चिर क्रांतिकारी फिल्मकार अनुराग कश्यप और क्रांतिकारिणी हीरोइन तापसी पन्नू तथा उनके कुछ मित्रों के ठिकानों पर इनकम टैक्स की चोरी के लिए छापे मार कर अमर बना दिया! विपक्ष के एक नेता ने तुरंत कहा- यह बदले की कार्रवाई है! किसानों का पक्ष लेने की सजा दी जा रही है।

चैनल खबर देते और बहसें कराते। बीच बीच में कश्यप और तापसी की फिल्मी लीलाओं के दर्शन कराके हमें धन्य करते रहते!
लगता है कि इन दिनों ‘सुपर स्टार’ होने के लिए एक छापा काफी है। इधर छापा पड़ा, उधर आप नाचते गाते मीडिया में छाए! इतनी पब्लिसिटी तो अरबों खर्च करके नहीं मिलती!

चुनाव आयोग ने तो पांच राज्यों के चुनावों की बात की थी, लेकिन खबर चैनलों को सिर्फ बंगाल में चुनाव दिखते हैं। चैनलों का जितना फोकस बंगाल पर है, उतना तमिलनाडु, पुदुचेरी या केरल के चुनाव पर नहीं है! कारण है: चैनल दिल्ली वाले तो चुनाव भी दिल्ली वाले की नजर से!

नतीजा यह कि तमिलनाडु आदि की चुनावी खबरें ‘फास्ट’ खबरों में रह जाती हैं। कमल हासन अपना एंटी हिंदी वाला घिसा रिकार्ड बजाते हैं, लेकिन कोई सुनता नहीं। हां, जबसे मेट्रोमैन श्रीधरन भाजपा में आए हैं तबसे वे भाजपा के ‘सीएम फेस’ की तरह दिखाए जाते हैं और हम अपनी हंसी मुश्किल से रोक पाते हैं।

सप्ताह की सबसे बड़ी खबर, निजी अस्पतालों में कोविड 19 के ‘टीका अभियान’ की शुरुआत की रही। पहली मार्च की सुबह-सुबह साढ़े छह बजे एम्स जाकर पीएम ने भारत बायोटेक का बनाया ‘कोवैक्सीन’ टीका लगवाया। विपक्ष का एक नेता तुरंत बोला : ये फोटोअप क्यों?

पीएम भी क्या करें? न लगवाएं तो आफत, लगवाया तो आफत! विपक्ष को किसी तरह चैन नहीं! उसके बाद टीका लगवाने वाले वीआइपी लोगों की लाइन लग गई, लेकिन कर्नाटक के एक मंत्री ने यहां भी अपनी मौलिकता दिखाई। अपने घर बुला कर टीका लगवाया। अभियान के प्रोटोकाल की ऐसी की तैसी! इसे देख हमें तो गोविंदा वाला वो गाना याद आया कि ‘मैं चाहे ये करूं मैं चाहे वो करूं मेरी मरजी!’

चैनल ‘वीवीआईपी रेसिज्म’ को लाख धिक्कारें, जिनको मीडिया में छाना होता है, वे किसी की परवाह नहीं करते! एक चैनल का एक एंकर विघ्न संतोषी की भूमिका निभाते हुए पहले तोे टीके की ‘एफीकेसी’ की पड़ताल करता रहा, फिर एक दवा बनाने वाली कंपनी के बहाने पूछा कि टीके का दाम बहुत कम तय किया गया है, इससे दवा कंपनियों को घाटा है। इसके जवाब में एक नए बैंकर ने समझाया कि दाम को आम जनता के हित की नजर से देखिए श्रीमान!

एक दिन कांग्रेस के वरिष्ठों ने कांग्रेस को चेताया कि बंगाल में इस्लामिक तत्त्ववादियों के साथ गलबहियां नृत्य करना कांग्रेस की परंपरा नहीं है। लेकिन कांग्रेस का प्रवक्ता बोला कि सिर्फ दस दिन पहले बने ‘इंडियन सेक्युलर फ्रंट’ ने क्या कोई कम्युनल बयान दिया?
सच है : तत्त्ववाद बबुआ नजर न आई!

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