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बाखबर: उनकी धमकी उनका एजंडा

सत्ता का असमंजस साफ झलकता है। भाजपा के कुछ परिचित प्रवक्ता बहसों में कभी किसानों की चापलूसी करते नजर आते हैं कि अब तो मान जाइए अन्नदाता जी और कुछ उनको धमकाते नजर आते हैं कि अगर देश-विरोधी शक्तियां रास्ते में आएंगी, तो हम उनका दमन करेंगे... सरकार की कोई साफ रणनीति नहीं दिखती!

farm bill 2020 supreme courtप्रदर्शनकारी किसानों ने सरकार से तीनों कृषि बिलों को वापस लेने की मांग की है। (फोटो अमित मेहरा)

एंकर बेचैन हैं। रिपोर्टर परेशान हैं। यह बेचैनी, यह परेशानी तब और साफ नजर आती है, जब वे किसानों से बात करते हैं। किसान कई बार उनके लिए एक न सुलझने वाली पहेली की तरह नजर आते हैं। यह भाषा का तो भेद है ही, भाव का भी भेद है!

चैनलों के एंकर हर रोज नए-नए किसान नेताओं को बिठा कर उनके आगे एक अवांछित-सी चिरौरी करते दिखते हैं कि अब तो सरकार ने कानूनों को स्थगित कर दिया है, अब तो आप लोग मान जाइए!

इससे किसान नेताओं के तेवर और भी चढ़ जाते हैं। अपना भाव बढ़ा देख वे और भाव खाने लगते हैं। सिर्फ एक नेता विज्ञान भवन से निकल कर मानता है कि हां, सरकार एक कदम आगे आई है, लेकिन वह भी अंत में यह कह कर निकल जाता है कि सरकार के प्रस्ताव पर विचार करके कल बताएंगे। आप सुनते ही बता सकते हैं कि फैसला ‘ना’ में आना है!

और सरकार से दसवीं बातचीत की अगली शाम कई खबर चैनल एक धुंधला-सा लांग-शॉट दिखाते हैं : फ्रेम में पांच-छह किसान नेता मीटिंग के बाद मंद गति से निकल रहे हैं। कैमरों के आगे वे अपनी बढ़ी ‘वैल्यू’ महसूस करते दिखते हैं। चैनल लाइन लगाते हैं : सरकार का प्रस्ताव नामंजूर! कानून वापसी से कम कुछ मंजूर नहीं!
कट टू गाजीपुर बार्डर। रिपोर्टर पूछता है : छब्बीस जनवरी वाली ट्रैक्टर रैली?

हरी पगड़ी पहने एक नामी किसान नेता अपनी खांटी खड़ी बोली में ‘खड़ा बोल’ पूरे इत्मीनान से बोलता है : ऐसे थोड़े ही होता है कि एक साल, दो साल, हम तो इसे निपटवा के ही जाएंगे और छब्बीस जनवरी को दिल्ली की आउटर रिंग रोड पर ट्रैक्टर मार्च निकालेंगे। छब्बीस जनवरी को ट्रैक्टर परेड निकालेंगे। रोक लो अगर रोकना है तो… जो रोकेगा उसके बक्कल उतार दिए जाएंगे…

धमकी स्पष्ट है! रिपोर्टर को ‘बक्कल उतारने’ का मुहावरा समझ नहीं आता। वह हकबका कर पीटूसी करने लगता है। एंकर चिंतित हैं कि इस बार की छब्बीस जनवरी को क्या होगा? और इतने बड़े राष्ट्र की छब्बीस जनवरी एक धमकी के आगे चुप नजर आती है।

सत्ता का असमंजस साफ झलकता है। भाजपा के कुछ परिचित प्रवक्ता बहसों में कभी किसानों की चापलूसी करते नजर आते हैं कि अब तो मान जाइए अन्नदाता जी और कुछ उनको धमकाते नजर आते हैं कि अगर देश-विरोधी शक्तियां रास्ते में आएंगी, तो हम उनका दमन करेंगे… सरकार की कोई साफ रणनीति नहीं दिखती!

एक वीर एंकर अपनी प्राइम टाइम बहस में किसानों की अकड़ को देख कह उठता है : यह उनकी ‘एक धक्का और दो’ की नीति है। उनको लगता है कि ऐसा करने से सरकार गिर जाएगी… इसे कहते हैं एनजीओ वाली रूमानी क्रांतिकारिता! लेनिन का बताया ‘वामपंथ : एक बचकाना मर्ज’!

कउओं के कोसे से कहीं ढोर मरा करते हैं! शुक्रवार की सुबह एक किसान नेता धमकाता है : एक लाख ट्रैक्टर आ रहे हैं। पुलिस हमारी रैली का इंतजाम करे… हरियाणे का एक बड़ा नेता भी धमकाता है : हम भी हजारों ट्रैक्टर लेकर आ रहे हैं। ये ट्रैक्टरों को हथियार बना रहे हैं।

जितने किसान हैं उतने नेता हैं। ऐसे क्या बातचीत और किससे बातचीत? हर नेता टीवी में कुछ देर गरम बोल कर, अपना निर्वाचन क्षेत्र बना कर निकल जाता है और हम सोचते रहते हैं कि हल निकलने वाला है! ‘ट्रेड यूनियनिज्म’ कहता है कि इससे अधिक नहीं मिलने वाला। सो, जितना मिल रहा है ले लो और घर जाओ, लेकिन किसानों के उस्ताद क्यों समझाएं, उनका अपना एजंडा है!

उनका एजंडा है कि छब्बीस जनवरी का शो बिगड़े! सरकार की किरकिरी हो! इस किसान कथा की यही व्यंजना है। इस बीच एक ‘नरम राष्ट्रवादी’ एंकर, एक ‘परम गरम राष्ट्रवादी’ एंकर के पांच सौ पेज लंबे वाट्सऐप चैट्स को लेकर तीन दिन तक लगातार ‘एक्सपोज’ चलाता रहता है कि किस तरह पुलवामा- बालाकोट संबंधी खुफिया सूचनाएं, टीआरपी में हेराफेरी के आरोप में गिरफ्तार ‘बार्क’ के अधिकारी से साझा कीं, कि जब देश पुलवामा के शहीदों की गिनती कर रहा था, वह धंधेबाज एंकर अपने चैनल के लिए टीआरपी गिन रहा था और ‘अद्भुत जीत’ पर इठला रहा था। वह सूचना की ‘सेल’ करता है।

वह पत्रकार नहीं, पत्रकारिता का ‘सेल्समैन’ है। फिर अपने रिपोर्टर से उस एंकर पर ‘अनैतिक पत्रकारिता’ करने और ‘गैर-पेशेवराना’ होने का आरोप लगाता लगवाता रहता है। उधर आरोपित ‘परम गरम राष्ट्रवादी’ अपने को बदनाम करने के लिए सीधे इमरान खान और राहुल को जिम्मेदार ठहराता है।

इस बीच भाजपा का एक छोटा तानाशाह ओटीटी पर अमेजन की वेब सीरीज ‘तांडव’ पर तांडव दिखाने लगा कि ‘तांडव’ बनाने वाले जब तक नाक रगड़ कर घुटने टिका कर माफी नहीं मांगते…

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