डर का बाजार

हर खबर चैनल कोरोना ही मुख्य खबर बनाने लगता है। उसके आंकड़े दिए जाने लगते हैं। विशेषज्ञ जनता के सवालों का जवाब देने लगते हैं, लेकिन कोरोना का डर है कि जाता ही नहीं।

bengal, bengal electionsपीएम मोदी, सीएम ममता और गृह मंत्री शाह। (पीटीआई)।

एक दिन ममता बनर्जी के चुनाव सलाहकार प्रशांत किशोर का! कुछ एंकर मस्त कि वे ममता की हार स्वीकार कर रहे हैं। उधर प्रशांत चैनलों की प्राइम टाइम में अपने कहे को अर्थाते और दोहराते हुए कि भाजपा को सौ सीट मिल जाएं तो बहुत। एंकरों की चले तो आज ही अपने इष्ट देव की सरकार बनवा दें। यह खबरनवीसी नहीं, सत्ता की एजेंसी चलाना है। एक मीडिया घराने का हिंदी चैनल दिल्ली की भाषा बोलता है तो उसी का दूसरा चैनल कोलकाता की भाषा बोलता है और ममता दीदी से बांग्ला में एक लंबा साक्षात्कार लेता है। मीडिया घराना भी क्या करे? दिल्ली भी साधनी है और ‘कलकत्ते’ को भी साधना है। क्या पता कौन इष्टदेव सत्ता के मंदिर
में पधार जाए!

ममता के आपत्तिजनक बयानों पर चुनाव आयोग कोड़ा फटकारता है। दीदी पर चौबीस घंटे की पाबंदी। दीदी तुरंत उसका ‘खेला’ कर डालती हैं। अकेली मौन धरने पर बैठी चित्रकारी करती हैं और पूरे दिन कवरेज पाती रहती हैं। और क्या चाहिए दीदी को! ममता के हमलों से रक्षात्मक हुआ आयोग भाजपा के भी दो-तीन नेताओं पर पाबंदी लगाता है, लेकिन हमदर्दी तो ममता ही लूटती हैं। दो चैनल पुलिस बल पर हमला करने वाली भीड़ का नया वीडियो दिखाते हैं, लेकिन तब तक देर हो गई थी। ‘रीयल टाइम कवरेज’ वाले चुनाव में ‘तुरंता खेला’ काम देता है, ‘लेट रिएक्शन’ नहीं।

पंद्रह दिन से कोरोना के मामले बढ़ रहे थे, लेकिन चैनलों ने गत रविवार को ही इसे एजेंडा बनाया। कुछ चैनलों ने कहा ‘कोरोना की दूसरी लहर’ तो कुछ चैनलों ने कहा ‘चौथी लहर’। इसके बाद हर खबर चैनल कोरोना ही मुख्य खबर बनाने लगता है। उसके आंकड़े दिए जाने लगते हैं। विशेषज्ञ जनता के सवालों का जवाब देने लगते हैं, लेकिन कोरोना का डर है कि जाता ही नहीं।

एक बार फिर भीड़ ही भीड़ दिखाई जा रही है। कहीं वापस लौटने वालों की भीड़, कहीं बाजारों की भीड़, कहीं कुंभ की भीड़ तो कहीं चुनावी रैलियों की भीड़। रिपोर्टर भीड़ को दिखाते हुए चीखते हैं- देखिए, न मास्क, न दूरी, तब क्यों न फैले कोरोना? कोरोना की दूसरी लहर संक्रमण के पिछले सारे रिकार्ड तोड़ रही है। सत्रह राज्यों में कोरोना का विस्फोट!

कई मुख्यमंत्री चैनलों में अपने कामकाज के विज्ञापनों की भरमार करके अपने राज्य को स्वर्ग की तरह पेश करते हैं, लेकिन कोरोना संक्रमण उनके स्वर्ग के अंदर के छिपे असली नरक के दर्शन करा ही देता है! ऐसा ही एक चैनल उस राज्य की ‘बाइलाइन’ लगा कर लिखता है कि न श्मशानों में लकड़ी, न कब्रिस्तानों में जगह! एक राज्य में एक लड़की अपने मरे पिता के लिए एक डॉक्टर से जूझ जाती है और रोने लगती है। विज्ञापनों में स्वर्गापम बनाए गए राज्यों का यथार्थ इन दिनों अच्छी तरह सामने आ रहा है। फिर भी मुख्यमंत्री अपनी उपलब्धियों को गिनाते ही रहते हैं।

कोरोना के शब्दकोश में विशेषज्ञों ने दो नए शब्द जोड़े हैं- एक ‘वेरिएंट’, जैसे अफ्रीकी वेरिएंट, यूके वेरिएंट और पंद्रह देसी वेरिएंट! दूसरा है कोरोना का ‘म्यूटेशन’, यानी ‘नया अवतार’। एक चैनल कहता है कि इस बार मारकता कम है तो दूसरा कहता है कि मारकता अधिक है। बच्चों तक को चपेट में ले रहा है। इसके आगे टीके की राजनीतिक टीकाएं लिखी जाने लगती हैं। एंकर पूछते हैं कि कोरोना की वापसी को लेकर हमारे नेता आखें मूंदे क्यों रहे? पिछली तैयारियां क्या हुईं? अस्पतालों में बिस्तर कहां हैं? श्मशानों में और कब्रिस्तानों में जगह नहीं बची है। देखिए… ये देखिए, गोमती के तट पर लाशों के अंबार… निगमबोध घाट पर लाइनें लगी हैं..!

प्रधानमंत्री मुख्यमंत्रियों से चर्चा करते हैं और पूर्णबंदी की खबर हवा में तैरने लगती है। एक शाम कई चैनल उद्धव जी के लंबे मराठी संबोधन की तारीफ करते दिखते हैं- पूर्णबंदी की जगह नाइट कर्फ्यू… सप्ताहांत पूर्णबंदी। कमाल की नीति कि व्यवसाय बचा रहे और लोग भी बचे रहें।

लेकिन एक कोरोना विशेषज्ञ ‘कमाल’ की इस नीति को जम कर फटकारता है- यह तो गैंगरीन पर बैंड-एड लगाने जैसा है। बताइए किसानों को किसने इजाजत दी? चुनाव रैली क्यों? मुझे नेताओं की परवाह नहीं। न दवा, न टीका, न प्लाज्मा, न बेड! सब जानते थे कि कोरोना की दूसरी लहर आएगी, तब इसके लिए तैयारी क्यों नहीं की?

कुंभ है तो भीड़ है। चुनाव हैं तो भीड़ हैं। नेताओं को भीड़ प्यारी है। बस एक बार वोट दे दें, प्यारी भीड़! फिर भीड़ जाए भाड़ में! जिए या मरे उसका भाग्य, क्योंकि ‘हानि लाभ जीवन मरण यश अपयश विधि हाथ!’ हर की पौड़ी। कुंभ का पहला शाही स्नान। तीस लाख ने डुबकी लगाई। एक बाबा उवाच- शिव के भक्तों का कोरोना कुछ नहीं बिगाड़ सकता। अगले ही क्षण आस्था की होड़ शुरू! तबलीगी जमात पर रोक तो कुंभ पर क्यों नहीं?

एक बार फिर कोरोना का कहर दुहर रहा है। एक बार फिर कोरोना के डर का बाजार गरम हो रहा है। आदमी कोरोना से मरे न मरे, डर से जरूर मर सकता है!

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