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बीस-अस्सी बनाम पंद्रह-पचासी

मंचासीन नेताओं ने न जरूरी दूरी रखी थी, न कायदे से मास्क लगाए थे और किसी आम रैली की तरह ही एक नेता दहाड़ रहे थे और लोग हल्ला कर रहे थे कि मार्च में अखिलेश को सीएम बनाएंगे और चौबीस में पीएम बनाएंगे! इसी रैली में स्वामी प्रसाद मौर्य ने योगी के ‘अस्सी और बीस’ के चुनाव का जवाब देते हुए कहा कि अब ‘अस्सी और बीस’ का नहीं, ‘पचासी और पंद्रह’ का बंटवारा है!

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आजमगढ़ सीट से कभी नहीं जीती बीजेपी (एक्सप्रेस फाइल फोटो)

अच्छा हुआ कि ‘बुल्ली बाई’ वाले घृणावादियों को पुलिस ने धर लिया, लेकिन इस घृणावाद पर जो बहसें चलीं, वे जाने-अनजाने घृणावादी विभाजन ही करती रहीं! कहीं-कहीं ‘सुल्ली डील्स’ का जिक्र भी आता रहा! जब खूब पढ़े-लिखे घृणा का व्यवसाय करने लगें, तो बचता क्या है? घृणा की हर चर्चा घृणा की खुराक बढ़ाती दिखती है! घृणा से निपटने के लिए वैकल्पिक विमर्श फिलहाल किसी के पास नहीं दिखता! ‘जस्टिस फार सिख’ के गुरवंत सिंह पन्नू के वीडियो ने धार्मिक कुत्सा का सबसे ऊंचा परचम लहराया कि हम एससी को, मोदी को, तिरंगे को उड़ा देंगे, कोई नहीं बचा पाएगा…

इससे पहले पीएम के काफिले के पंजाब में रोके जाने के षड्यंत्र की सुनवाई से पहले करीब सौ वकीलों को ‘जस्टिस फार सिख’ से धमकी भरे फोन आए! सरकार हतप्रभ-सी दिखती है!
चन्नी ने प्रियंका से बात की, तो भक्त एंकर संवैधानिक सवाल उठाते रहे कि प्रियंका क्या किसी संवैधानिक पद पर हैं कि उनको रिपोर्ट किया? एक एंकर ने यह भी पूछा कि क्या गांधी परिवार इस सबमें एक ‘इंटरेस्टेड पार्टी’ है?

विपक्ष इन दिनों ‘गली छाप चंटई’ से बात करता है कि सरकार आपकी है! आप कार्रवाई क्यों नहीं करते? लेकिन सरकार का धर्मसंकट कि एक्शन करे तो ‘फासिस्ट’ और न करे तो मिलीभगत की तोहमत!
जो चन्नी जी पहले कह चुके थे कि क्या पीएम को किसी ने कुछ किया, वही कोविड-मीटिंग में कहने लगे कि आप कयामत तक जिओ और कयामत कभी न आए! इसे कहते हैं चोट मार और सारी बोल! है न नई कूट भाषा?

भाजपा विरोधी बड़ी खबर भाजपा को छोड़ कर आते मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य ने बनाई! सीना चौड़ा कर बोले कि हथौड़ा मार कर आया हूं! इस पर भी तसल्ली न हुई तो बोले कि भाजपा के ताबूत में आखिरी कील ठोक दी है और तब भी यकीन न आया तो कहे कि चौदह को भाजपा से भगदड़ मचेगी, लेकिन चौदह को कोई सैलाब न आता दिखा!

लेकिन पहली बार मीडिया में भाजपा पिटती दिखी! अखिलेश के प्रवक्ता अखिलेश को एक बड़ा ‘रणनीतिज्ञ’ की तरह पेश करने लगे और कहने लगे कि अब भाजपा जा रही है सपा आ रही है, अखिलेश आ रहे हैं, भाजपा में भगदड़ है…

भक्त एंकर परेशान कि क्या लाइन लें? कई एंकर तो साफ पूछते रहे कि क्या भाजपा को इस तोड़फोड़ की खबर न हुई? प्रवक्ता भी देर तक हिचकिचाते दिखे कि क्या लाइन लें? एक प्रवक्ता देर तक बाहर जाने वालों की लल्लो-चप्पो करती दिखी! एक भाजपा समर्थक राजनीतिक विश्लेषक भाजपा की किरकिरी से पता नहीं क्यों खुश दिखीं! एक एंकर बोला, क्या यह भाजपा का अहंकार है, जिसकी वजह से लोग जा रहे हैं? क्या सरकार की चलाचली की बेला आ गई है?

बाद में भाजपा द्वारा सफाई दी जाने लगी कि इनको टिकट नहीं मिल रहा था, इसलिए चले गए! सपा का एक बड़बोला प्रवक्ता हुलस कर कहने लगा कि अगर सपा अपने दरवाजे खोल दे, तो भाजपा के दो सौ विधायक आ जाएं! किसी एंकर ने नहीं टोका कि जो आए हैं उनको टिकट दोगे, तो तुम्हारे अपने लोग कहां जाएंगे?

तीन-चार दिन से भाजपा हिल रही है! रोज कोई न कोई छोड़ रहा है! पिछड़ों का एक तीसरा बड़ा नेता बुधवार को छोड़ रहा था कि एक चैनल ने बताया कि वह नहीं छोड़ रहा है, लेकिन फिर खबर आई कि छोड़ गया! भाजपा पहली बार ‘डैमेज कंट्रोल’ में नाकाम होती दिखी!
सपा अपने को अभी से सरकार में देखने लगी है! एक बहस में भाजपा के एक प्रवक्ता ने ज्ञान दिया कि ये यूपी चुनाव से पहले के ‘माइंड गेम्स’ हैं! ये नेता भाजपा-मूल के नहीं हैं। टिकट न मिलने के कारण भाग रहे हैं! इसका कुछ असर नहीं होना!

बहरहाल, भाजपा से आए नेताओं की पहली ‘वर्चअुल रैली’ (शुक्रवार) को दिखी, जो हमें तो किसी आम रैली की तरह की ही दिखी!
मंचासीन नेताओं ने न जरूरी दूरी रखी थी, न कायदे से मास्क लगाए थे और किसी आम रैली की तरह ही एक नेता दहाड़ रहे थे और लोग हल्ला कर रहे थे कि मार्च में अखिलेश को सीएम बनाएंगे और चौबीस में पीएम बनाएंगे!

इसी रैली में स्वामी प्रसाद मौर्य ने योगी के ‘अस्सी और बीस’ के चुनाव का जवाब देते हुए कहा कि अब ‘अस्सी और बीस’ का नहीं, ‘पचासी और पंद्रह’ का बंटवारा है! उसमें भी ‘पचासी’ तो हमारा है, ‘पंद्रह’ में भी बंटवारा है!
चुनाव की कूट भाषा अनूठी है! अगर योगी के ‘बीस बरक्स अस्सी’ को सांप्रदायिक कहेंगे, तो इस ‘पचासी बरक्स पंद्रह’ को क्या कहेंगे?

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