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झटके पर झटका

कई चर्चकों ने माना कि न भाजपा अध्यक्ष नड्डा जी क्षेत्रीय दलों के ‘अंत’ की बात करते, न नीतीश के कान खड़े होते। राजद के सांसद मनोज झा ने भी भाजपा के इस ‘अहंकार’ की आलोचना की और देखते-देखते राजनीति की नब्ज को सबसे बेहतर तरीके से समझने वाले नीतीश ने भाजपा का ‘झटका’ कर दिया और देश का ‘एजंडा’ बदल दिया!

झटके पर झटका
Nitish Kumar: जदयू और आरजेडी ने मिलकर बिहार में नई सरकार का गठन किया है(फोटो सोर्स: PTI)।

सारा ज्ञान अमेरिका में है। साल में एक दो बार सारे ‘ज्ञानदेवता’ वहीं से पधारते हैं और मुस्कुराते हुए ‘भारत’ का ‘भविष्य’ बताते हैं और अंग्रेजी में लिखी अपनी नई किताब को ‘प्रमोट’ और ‘सेल’ करके निकल जाते हैं। एंकर मुस्कुरा कर धन्यवाद देता रह जाता है! कैसा है ये ‘इंडिया’ भी कि ज्ञान दरवाजा खटखटाता रहता है, लेकिन उसके कान पर जूं नहीं रेंगती!

फिर एक दिन खबर फैलती है कि नोएडा की एक हाउसिंग सोसाइटी में एक गुंडे ने अवैध निर्माण किया हुआ है और एक औरत को भी खुलेआम ‘हेरास’ कर चुका है। टीवी में आती यह खबर ‘बावली’ हो जाती है। गुंडा मीडिया के निशान पर आ जाता है। मीडिया भी कुछ देर के लिए ‘स्त्रीत्ववादी’ हो उठता है। सरकार पर दबाव पड़ता है। सरकार उसके अवैध निर्माण को बुलडोजर से गिरा देती है। कई दिन बाद पुलिस उसे ‘गैंगेस्टर एक्ट’ में गिरफ्तार कर लेती है।

लोग मीडिया और योगी की जय जय करने लगते हैं! लेकिन राजनीति भी चलती रहती है कि ‘गुंडा भाजपा का है?’ या कि ‘सपा में आए एक नेता का चेला है?’ अगले रोज नीतीश कुमार भाजपा को ऐसा झटका देते हैं कि भाजपा के नेता कई दिन तक बिसूरते नजर आते हैं। कई एंकर इसे ‘भाजपा’ को नीतीश की महाराष्ट्र वाली ‘रिटर्न गिफ्ट’ की तरह देखते-दिखाते हैं। कुछ इसे ‘पोयटिक जस्टिस’ की तरह देखते हैं, कुछ ‘जैसे को तैसा मिला’ की तरह देखते हैं।

कई पत्रकार नीतीश की राजनीतिक अवसर की ‘अचूक समझ’ की सराहना करते दिखते हैं! कुछ के लिए नीतीश ‘परम पलटू’ हैं, कि कुछ के लिए नीतीश ‘अचूक अवसरवादी’ हैं। कुछ नीतीश को धोखेबाज कहते हैं, लेकिन एक भक्त नीतीश को एक अवतार की तरह देखता है, जो देश को बचाने आए हैं।

राजद और अन्य विपक्षी दलों के साथ नए गठबंधन के बाद नीतीश अपने तेवर में दिखते हैं और प्रेस से भी एकदम नपा-तुला बोलते हैं कि समाज में भेदभाव पैदा करने कोशिश हो रही थी… हमारे लोगों की राय थी कि राजग को छोड़ दीजिए। हमने छोड़ दिया… बिहार को आगे बढ़ाना है। जब चौबीस की बात आई तो कह दिए कि ‘चौदह में जो आए, चौबीस में नहीं आएंगे…’

इसके बाद शुरू हुई ‘हाय हाय’ अब तक जारी है कि कौन बनेगा चौबीस का चेहरा? अकेले नीतीश ही क्यों, बाकी के क्या मर गए हैं?
लेकिन भाजपा नेताओं की प्रतिक्रिया यही रही कि हाय, हमें छला गया है कि ‘दोस्त दोस्त ना रहा…’!

भाजपा के नेता रविशंकर प्रसाद प्रेस से जितनी देर बोले, गुस्से में बोले। जब ‘चौबीस’ के ‘नए दावेदारों’ के बारे में पत्रकारों ने पूछा तो बोल दिए कि अभी तो कोई ‘वेकेंसी’ नहीं। प्रधानमंत्री चौबीस में जीतेंगे और उनतीस में भी जीतेंगे… भाजपा की किरकरी देख कांग्रेसी प्रवक्ताओं की बांछें खिलती दिखीं। लेकिन बिहार भाजपा के नेता फिर भी अपनी खिसियाहट से मुक्त नहीं हो पाए। नीतीश के सहकर्मी रहे भाजपा के एक बड़े बिहारी नेता ने कहा कि ‘नीतीश को समझना मुश्किल है…’

यह नीतीश की ‘निंदा’ थी कि ‘स्तुति’, समझ न आया, जबकि एक दिन पहले ही एक चैनल चर्चा में नीतीश समर्थक पत्रकार ने ताल ठोंक कर कह दिया था कि गांरटी है कि कल बिहार की सरकार बदल जानी है… तो भी भाजपा न चेती और जब लात पड़ गई, तो बिसूरने लगी! ऐसी भाजपा को कौन समझाए कि इन दिनों ‘आहत दिखने वाले’ की जगह ‘आहत करने वाला’ महान माना जाता है। यह ‘जो जीता वही सिकंदर’ का जमाना है सर जी!

कई चर्चकों ने माना कि न भाजपा अध्यक्ष नड्डा जी क्षेत्रीय दलों के ‘अंत’ की बात करते, न नीतीश के कान खड़े होते। राजद के सांसद मनोज झा ने भी भाजपा के इस ‘अहंकार’ की आलोचना की और देखते-देखते राजनीति की नब्ज को सबसे बेहतर तरीके से समझने वाले नीतीश ने भाजपा का ‘झटका’ कर दिया और देश का ‘एजंडा’ बदल दिया! एक एंकर ने बताया कि ‘नए गठबंधन’ वाले कहते हैं कि अब आप ‘चौबीस’ पर ‘फोकस’ करें!

काफी दिन बाद तेजस्वी यादव को मीडिया का ‘फोकस’ मिला। वे भी जितना बोले एकदम नपा-तुला बोले, मानो ‘हर्ष विषाद न कछु मन माहीं’! कई चर्चकों ने साफ कहा कि भविष्य उन्हीं का है। चौबीस में वे ही सीएम होंगे और नीतीश पीएम का वैकल्पिक चेहरा होंगे।

लेकिन चौबीस की इस कहानी को भी ‘झटका’ दिया ‘इंडिया टुडे सी-वोटर’ के एक ‘लाख बाइस हजार सोलह’ के विराट ‘सैंपल’ ने। सर्वे ने बताया कि गत फरवरी (यूपी के चुनाव) से ‘नौ अगस्त’ (नीतीश की पलटी का दिन) तक ‘देश का मूड’ कहता है कि उक्त सारे झटकों के बावजूद अगर आज चुनाव हों तो मोदी ही पीएम बनेंगे।

कुल छियासठ फीसद लोग मोदी के काम को ‘अच्छा/ बहुत अच्छा’ मानते हैं। भाजपा अपने बल पर दो सौ छियासी सीट जीत सकती है औेर एनडीए फिर तीन सौ से ऊपर सीट लेकर आ सकती है! एक विश्लेषक ने कहा कि महंगाई बेरोजगारी मुद्दे हैं, लेकिन अधिकतर लोग भाजपा के ‘राष्ट्रवाद’ के पीछे खड़े हैं और अगर कोई बहुत बड़ी गड़बड़ न हुई, तो 2024 में भी मोदी ही आएंगे!

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