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महामारी पर भारी सियासत

चैनलों की सभी ऐसी बहसें एक-सी दिखती हैं : विपक्ष दनदनाता है कि कोविड बढ़ रहा है। वैक्सीन विदेश क्यों भेजा? दूसरा कहता है, सबको लगाइए, तभी कोविड रुकेगा।

कोरोना महामारी फिर उछाल पर है, लेकिन बाजारों और सड़कों पर भीड़ बेफिक्र है। (फोटो- शशि घोष इंडियन एक्सप्रेस)

आसमान से दृश्य : नीचे लंबी सड़क। दूर तक सिर ही सिर। गाड़ी की छत पर नड्डा जी सड़क शो देते हुए नजर आते हैं। उनके साथ में खड़ी रिपोर्टर पूछती है कि कितनी सीटें? जवाब : दो सौ से ज्यादा। रिपोर्टर चीखती है : ये देखिए! जन सैलाब उमड़ पड़ा है!
फिर ममता दीदी का फुटबाल को साबुत पैर से मारने का दृश्य और ‘खैला हौबे’ का नारा देना और भीड़ का उन्मद स्वर में ‘खैला हौबे’ कहना और फिर दीदी का बांग्ला में धाराप्रवाह भाषण, जैसे कोई मशीनगन चलती हो!

तमिलनाडु, पुडुचेरी, केरल या असम के चुनावों के लाइव कवरेज में वह मजा नहीं, जो बंगाल के चुनाव के कवरेज में दिखता है।
बंगाल का चुनाव एक ‘सुपर सीरियल’ है, जिसमें कोविड कालीन चुनाव का सारा समाज-मनोविज्ञान निहित है : चुनाव हैं तो नेता हैं। नेता हैं तो रैली हैं। रैली हैं तो भीड़ें हैं। भीड़ें है तो कोविड है। कोविड है तो वैक्सीन है। वैक्सीन है तो राजनीति है- वैक्सीन बाद में है, राजनीति पहले है!
कोविड हो तो हो, भीड़ हो तो हो, हम तो राजनीति करेंगे ही। सबसे बड़ी महामारी अपनी राजनीति में है।

कई एंकर रोते दिखते हैं : रैलियों ने किया ‘कोविड एप्रोप्रिएट बिहेवियर’ का सत्यानाश! कोई मास्क नहीं लगाता, सही सही नहीं लगाता। कोई दूरी नहीं रखता! ऐसे में कोविड कैसे न फैले?

बंगाल को लाइव कवर करते रिपोर्टरों की चिंता भी कोविड की अपेक्षा सेलीब्रिटीज से बात करने की है। एक रिपोर्टर/ एंकर जया बच्चन की बाइट देता है, फिर मिथुन चक्रवर्ती की बाइट देता है। जनता की बाइट कष्टकारी होती है, इसलिए अधिक नहीं दी जाती।
बंगाल में हीरो हीराइनों का जलवा है, रिपोर्टर लार टपकाऊ तरीके से बात करते हैं और वे भी अपनी अदा दिखाते हुए जवाब देते हैं, लेकिन आम जनता से जब बातचीत करते हैं तो एकदम विभाजित जनता नजर आती है। टीएमसी वाला है तो ‘खैला हौबे’ होने लगता है और भाजपा वाला है तो ‘मोदी मोदी’ ‘जैश्रीराम जैश्रीराम’ होने लगता है।

चुनाव में तनाव और हिंसा के भाव हैं, जिनको लोगों के उन्मद चेहरों पर पढ़ा जा सकता है। हर तरफ भाजपा बरक्स टीएमसी होता दिखता है। न कांग्रेस का हल्ला नजर आता है न सीपीएम का!

सप्ताह की सबसे निर्णायक कहानी कोविड की दूसरी लहर बना रही है। पिछले चौबीस घंटे में रिकार्ड तोड़ एक लाख छत्तीस हजार से अधिक आए हैं। लॉकडाउन के दिन दुहरते दिखते हैं। दिल्ली में भी रात का कर्फ्यू लौट आया है। खबर चैनल फिर मुंबई से ‘घर वापसी’ करते मजदूरों को दिखाने लगे हैं।

कोविड की इस दूसरी लहर के कारण और निवारण की चर्चा हर चैनल पर नित्य है : कारण है बाजारों, खेलों और उत्सवों की भीड़ें और ‘कोविडोचित आचरण’ न करना और निवारण है वैक्सीन लगाने में तेजी लाना और लोगों में ‘कोविडोचित आचरण’ का न होना!
लेकिन, आम जनता ‘कोविडोचित आचरण’ को कैसे समझे? यह संप्रेषण की समस्या है। बेहतर हो कि विशेषज्ञ और एंकर आम जनता की भाषा में ऐसे संदेश गढ़ें ताकि जनता इस संदेश को आसानी से ग्रहण कर सके।

शायद इसी कठिनाई को देख एक चैनल ने बड़े-बड़े रोमन अक्षरों में यह नारा दिया :
‘मास्क पहनो इंडिया’!
अगर हर चैनल अपनी स्क्रीनों पर ऐसे ही नारे दिखाए, तो संभव है कि जनता के बीच एक जरूरी ‘मास्क कल्चर’ पैदा हो जाए और कोविड का प्रकोप कुछ थम जाए!

लेकिन जो मजा समस्या को संकट बनाने में है, वह उसके समाधान में कहां? इसलिए वैक्सीन नीति को रगड़ो कि अपने लोगों को लगाने से पहले दूसरे देशों को वैक्सीन क्यों दी? फिर राहुल की तर्ज पर पूछो कि पीएम ने समस्या को उत्सव क्यों बनाया?

चैनलों की सभी ऐसी बहसें एक-सी दिखती हैं : विपक्ष दनदनाता है कि कोविड बढ़ रहा है। वैक्सीन विदेश क्यों भेजा? दूसरा कहता है, सबको लगाइए, तभी कोविड रुकेगा। जवाब में डॉ. गुलेरिया कहते हैं कि अगर सबको वैक्सीन लगाने लगे तो दो अरब खुराक चाहिए, जो किसी देश के पास नहीं। इसलिए प्राथमिकता से लगाना ही उचित। डब्लूूएचओ भी यही कहता है।

दूसरे देशों को देने की बात एक वैक्सीन के करार में निहित है। उसी का पालन हो रहा है। अपने लिए वैक्सीन का पर्याप्त भंडार है। इसका उपचार यही है कि वैक्सीन लगाने में तेजी लाएं और जनता ‘कोविडोचित आचरण’ करे!
लेकिन निंदकों का जवाब नहीं। पहले कहते थे कि टीके का भरोसा नहीं। अब कहते हैं, बाहर क्यों भेजा?
यानी चित भी मेरी, पट भी मेरी, टैंया मेरे बाप का!

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