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गुनाह बेलज्जत

अगले रोज चैनलों में चार-चार वीडियो बजने लगते हैं : दीदी कार के दरवाजे को खोल कर खड़ी हैं और बाजार के लोगों का हाथ हिला कर अभिवादन कर रही हैं। पीछे दरवाजे पर उनके सुरक्षाकर्मी खड़े हैं... वीडियो साफ दिखाते हैं- ये साजिश नहीं, दुर्घटना है। हादसा है। अगले रोज दीदी भी मान लेती हैं कि दुर्घटना थी!

mamta banerjee, nandigram , election commissionविशेष पर्यवेक्षक ने नंदीग्राम में ममता बनर्जी पर हुए हमले के मामले में चुनाव आयोग को अपनी रिपोर्ट सौंप दी है। (फोटो – पीटीआई)

कैसे परम सेक्युलर सीन हैं कि एक दिन दीदी सिर्फ मंदिर मंदिर भजती हैं, मंदिर मंदिर जाती हैं, आरती करती हैं, धोक लगाती हैं। एक मजार पर जाती हैं तो चौदह मंदिर जाती हैं और दीदी जम कर ‘हिंदू राग’ अलापती हैं। धाराप्रवाह ‘बंगिंदी’ में बोलने लगती हैं : आमि हिंदू मेये, मैं हिंदू की बेटी मैं हिंदू हिंदू … ब्राह्मण की बेटी हूं। हिंदू अखाड़े में मुझसे न टकराना…

फिर दीदी मंच से ही संस्कृत का ‘चंडीपाठ’ करने लगती हैं… काली कपाली महाकाली महिषासुर मर्दिनी… बीच में भूलने लगती हैं, फिर संभालती हैं और पाठ का स्थायी बांचने लगती हैं : या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमोनम:… जैसे चुनौती देती हों कि हिम्मत है तो ‘चंडीपाठ’ करके दिखाओ… उनके पूर्व सहयोगी और नंदीग्राम से चुनावी स्पर्धी शुभेंदु अधिकारी तुरंत टीप लगाते हैं कि ‘चंडीपाठ’ गलत किया दीदी ने!

चैनलों का चुनावी कवरेज बंगाली भाव का ही है : वही अतिरंजना, वही ‘तड़ातड़ी’, वही गर्जन तर्जन वाली लड़ाकू भाषा! लेकिन अचानक एक दर्दभरा सीन बन जाता है : दीदी अपनी कार में दर्द से कराह रही हैं। रिपोर्टर पूछे जा रहे हैं कि क्या हुआ दीदी? चोट कहां लगी? कैसे लगी? किसी पर शक? कैमरे झपट रहे हैं। रिपोर्टर बांग्ला में सवाल दाग रहे हैं। फिर कहते हैं कि हिंदी में भी बोल दो दीदी। ड्राइवर की बाजू वाली सीट पर ढही बैठी हैं। उनका बायां पैर खुला है। कुछ सूजा-सा दिखता है। माथे पर भी कुछ चोट दिखती है- चार पांच लोगों ने पीछे से धक्का दिया, मैं गिर पड़ी। कोई पैर पर गाड़ी का पहिया चढ़ाना चाहता था… आपकी सिक्यूरिटी कहां थी? पुलिस नहीं थी… ये साजिश है…

और ‘खेला’ बदल जाता है : पुलिस चुनाव आयोग के हवाले है न! आयोग बराबर केंद्र बराबर भाजपा बराबर सरकार… इति सिद्धम्!

एक चैनल इस सीन को बार-बार दिखाता हुआ लाइन लगाता है : ‘क्या यह घटना चुनाव का ‘टर्निंग पांइट’ होने जा रही है?’ और इसी पर बहस कराता है। भाजपा वाले पहले ही राउंड में कह देते हैं कि दीदी हार रही हैं, इसलिए ये सीन बना रही हैं। जले पर नमक कांग्रेस के अंधीर रंजन चौधरी छिड़कते हैं कि ये पाखंड है, नौटंकी है!
विभाजित बहसें और भी चिढ़चिढ़ी हो उठती हैं। एक ओर दीदी कार में कराहती दिखती हैं, दूसरी ओर चैनल लाइन लगाते रहते हैं- ये साजिश है या ड्रामा? सब तरफ सवाल कि दीदी की तीन सौ पुलिस कर्मियों की सिक्यूरिटी है, वो कहां थी? क्या उसका कोई वीडियो नहीं कि जो बताए कि दीदी गिरीं या गिराई गईं…

कुछ देर में दीदी कोलकाता के अस्पताल के लिए रवाना। सारा रास्ता ग्रीन कॉरिडोर में बदल दिया जाता है। आखिरी चित्र में दीदी के पैर पर रूमाल और बरफ की प्लास्टिक थैली बंधी दिखती है!

इस बीच एक चैनल पर घटना स्थल पर उपलब्ध चश्मदीद गवाह बताने लगते हैं कि दीदी को किसी ने धक्का नहीं दिया… वे कार का दरवाजा खोल कर लोगों का अभिवादन कर रही थीं कि यहां सड़क पर लगे लोहे के पोल से कार का दरवाजा टकरा गया और उनका पैर दरवाजे की भिच्ची में आ गया… हादसा है।

उधर कोलकाता में दीदी के पहुंचते ही भीड़ भाजपा के खिलाफ नारे लगाने लगती है। एक युवा गुस्से में कहता है : हमारी मां को मारा है… माहौल में गरमी है। कुछ भी हो सकता है। अब तो कोई वीडियो ही बता सकता है कि असल में क्या हुआ? चुनाव आयोग ‘एक्शन’ में आ गया है। तुरंत रिपोर्ट मांगता है।

अगले रोज चैनलों में चार-चार वीडियो बजने लगते हैं : दीदी कार के दरवाजे को खोल कर खड़ी हैं और बाजार के लोगों का हाथ हिला कर अभिवादन कर रही हैं। पीछे दरवाजे पर उनके सुरक्षाकर्मी खड़े हैं… वीडियो साफ दिखाते हैं- ये साजिश नहीं, दुर्घटना है। हादसा है। अगले रोज दीदी भी मान लेती हैं कि दुर्घटना थी! हाय! गुनाह बेलज्जत!
अगले रोज शुभेंदु अधिकारी भी मंदिर मंदिर करते हैं। एक चैनल बताता है कि उन्होंने अपना मतदाता कार्ड भी नंदीग्राम का बनवा लिया है, यानी कि वे असली नंदीग्रामी हैं। दीदी ही बाहरी हैं!

इस बीच दिल्ली के मुख्यमंत्री के नेतृत्व में वित्तमंत्री मनीष सिसोदिया एक ‘देशभक्त’ बजट देकर, भाजपा की ‘देशभक्ति’ की इजारेदारी की हवा ही निकाल देते हैं। इतना ही नहीं, दिल्ली की सड़कों पर हर दो किलोमीटर पर ऊंचा तिरंगा लगाने के लिए बजट भी तय कर देते हैं।

आने वाले दिनों में दिल्ली स्कूल शिक्षा का अपना बोर्ड बनाने की घोषणा करके सीएम केजरीवाल सिद्ध कर देते हैं कि दिल्ली जैसे ‘राज्य’ की सारी ‘प्रशासनिक सीमाओं’ के बावजूद कोई दल चाहे तो अपना रचनात्मक एजंडा आगे बढ़ा सकता है! और तो और, 2048 में ओलिंपिक खेलों के लिए ‘बिड’ करने के अपने ‘फ्यूचरिस्टिक’ इरादे को जता कर केजरीवाल भाजापावादी ‘फ्यूचरिज्म’ को भी झटका दे देते हैं!‘आप’ जानती है कि भाजपा से खेलना है, तो अपनी लाइन लंबी खींच कर खेलो!

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