पंजी दस्सी मध्यवर्ग

इस बार की दिवाली बड़ी मजेदार रही! शायद दिवाली का मूड देख केंद्र सरकार ने पेट्रोल के दाम कुछ घटा दिए, तो देखा-देखी कुछ भाजपा राज्यों ने भी “वैट” कम कर दिया और पेट्रोल-डीजल कुछ सस्ता हो गया! इतने से अपना मध्यवर्ग खुश, क्योंकि अपना मध्यवर्ग पंजी दस्सी वाला मध्यवर्ग!

Diwali, Fireworks
उच्चतम न्यायालय की सख्ती के बावजूद कई पटाखा निर्माता प्रतिबंधित सामग्री वाले पटाखे बना रहे हैं। (Source: @AkashvaniAIR/File photo)

हाय, वो रोज कही जाती जासूसी कहानी, जिसे एक जासूस धारावाहिक की तरह रोज आकर पेश करता था कि वो सत्तर हजार की शर्ट पहनता है, दो लाख के जूते पहनता है और इतने लाख की घड़ी पहनता है… वही गोपीचंद जासूस कहानी को अचानक एक पूर्व मुख्यमंत्री की ओर मोड़ बैठा कि ये पूर्व सीएम ही इस तरह की करोड़ों की वसूलीबाजी का सरगना है…

लेकिन जैसे ही आरोपित पूर्व मुख्यमंत्री ने जवाबी हमला किया कि ये रोज पटाखे फोड़ रहे हैं, अब वे जवाबी बम फोड़ेंगे, लेकिन दिवाली के बाद… तो गोपीचंद जासूस जी अचानक खामोश हो गए!

क्या पता दिवाली ने खामोश किया कि “बम” की धमकी ने, लेकिन कहानी अधूरी ही छोड़ गए, जबकि कहते थे कि कहानी अभी बाकी है! सर जी! कहां गई बाकी कहानी? अगली कहानी अयोध्या में योगी ने छोटी दिवाली के पूरे दिन कही और अयोध्या में बारह लाख दीये जला कर और “गिनीज बुक आफ वर्ल्ड रिकार्ड” में “एंट्री” लेकर कही और लपेटे में यह भी कह दिए कि जिन्होंने कारसेवकों पर गोलियां बरसाईं, वे भी आजकल रामनाम भज रहे हैं!

पहली बार इस दिवाली पर चैनलों ने पलटी मारी और एकाध “एंटी-पटाखा” चैनलों को छोड़ बाकी सारे “एंटी-पटाखा” चैनल खुद ही “प्रो-पटाखा” हो गए!
कोरोना-पूर्व के दौर में हर दिवाली के पहले “एंटी-पटाखा” लाबी चैनलों की चर्चाओं में इस कदर हावी रहती कि सभी चैनल पटाखेबाजी बंद करने के लिए दिवाली के कई दिन पहले से मुहिम चलाने लगते थे! तब एक से पर्यावरणवादी पटाखों के धुएं से होने वाली जानलेवा बीमारियों से सबको डराते रहते थे! इस बार की दिवाली ने इस “एंटी पटाखा” लाबी की बोलती बंद कर दी!

पहली बार कई अंग्रेजी, हिंदी चैनलों ने सीधे पटाखों को छुड़ाने के पक्ष में बहसें कराईं। कई एंकरों ने पटाखेबाजी के खिलाफ बनाए जाते वातावरण को “पश्चिमी पर्यावरणवादियों” की साजिश सिद्ध किया! एक एंकर ने तो यह आरोप तक लगाया कि ये हिंदू उत्सवों के खिलाफ कुछ पश्चिमी ज्ञानियों की साजिश है!

होली आती है तो रंगों को खतरनाक बताने लगते हैं और पानी की कमी को कारण बताने लगते हैं, लेकिन क्रिसमस मनाने के लिए जो लाखों पेड़ काटे जाते हैं, उसका विरोध नहीं करते! इस तरह ये पर्यावरणवादी, उदारवादी, लटियनवादी सारे के सारे हिंदू त्योहारों के दुश्मन हैं! एक नई पर्यावरणवादी पटाखावादी बहस में ऐसी फंसी कि दोबारा कायदे से बोल भी नहीं पाई और हाथ जोड़ती रह गई!

इस पलटी का कारण शायद अपने “सद्गुरु” के बोल रहे! उन्होंने एक चैनल पर साफ कहा कि बच्चों को पटाखे चलाने दो! जितना प्रदूषण कारों से होता है उतना पटाखे नहीं करते! आप दो दिन के लिए अपनी कारें चलाना बंद कर दो। अपने एसी बंद कर दो, लेकिन पटाखे चलाने दो… सद्गुरु के ऐसे पटाखावादी वचन सुनते ही पटाखों के दुश्मन हकलाते नजर आए!

अगर यही बात रामदेव हिंदी में बोलते, तो ज्ञानीजन कहते ये हिंदुत्ववादी बोल रहा है, लेकिन सद्गुरु अंग्रेजी में बोले, तो उनके खिलाफ कोई न बोला!
ये है अंग्रेजी का पव्वा! अंग्रेजी बाबा के खिलाफ कौन अंग्रेजी बाबा बोलता? जब “जलीकट्टू” ठीक, तो पटाखेबाजी भी ठीक! वो परंपरा तो ये भी तो पंरपरा! और पटाखा परंपरा लौटी भी, तो उसी मीडिया के रास्ते से, जिसके जरिए वह अक्सर पिटती रही!

आर्यन खान की कहानी ने कुछ किया हो न किया हो, शाहरुख खान को कई ब्रांडों का अंबेसडर जरूर बना दिया और इस कदर बना दिया कि एक चैनल ने उनको एक चाकलेट के विज्ञापन का सुपर अंबेसडर तक बताया! हाय रे जिन्ना का जिन्न! इस बार जिन्ना का जिन्न यूपी के एक पूर्व सीएम पर आ गया और वे गांधी-नेहरू-पटेल के साथ जिन्ना को भी “सब धान बाईस पसेरी” के भाव से तोल गए और इस पर जम कर ठोके भी गए!

मगर अपने प्रधानमंत्री का जवाब नहीं! पता नहीं, बंदा आराम करता भी है कि नहीं कि यूरोप के चार दिवसीय धुआंधार दौरे से लौटे, तो सीधे पहुंचे नौशेरा के जवानों के साथ दिवाली मनाने और की उत्तराखंड के लिए योजनाओं की बरसात! किया शंकराचार्य की प्रतिमा का अनावरण और दिया भाषण! इस बार की दिवाली बड़ी मजेदार रही! शायद दिवाली का मूड देख केंद्र सरकार ने पेट्रोल के दाम कुछ घटा दिए, तो देखा-देखी कुछ भाजपा राज्यों ने भी “वैट” कम कर दिया और पेट्रोल-डीजल कुछ सस्ता हो गया! इतने से अपना मध्यवर्ग खुश, क्योंकि अपना मध्यवर्ग पंजी दस्सी वाला मध्यवर्ग!

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