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काजर की कोठरी में

भारत के सबसे बेहतरीन दो बुद्धिजीवियों ने एक विश्वविद्यालय से त्यागपत्र दे दिया और सिर्फ एक हमदर्द चैनल कुछ देर रोता दिखा कि ये क्या हुआ, कैसे हुआ, क्यों हुआ? और पैनल में बैठे बुद्धिजीवी बोले कि ‘मैनेजमेंट’ ने ‘सरेंडर’ क्यों कर दिया? एंकर बोला कि सरकार का दबाव था।

West bengal election, tv debate, jdu, tmcबंगाल के पश्चिमी मिदनापुर के कलाईकुंडा में गुरुवार को एक सभा को व्हीलचेयर पर बैठकर संबोधित करतीं सीएम ममता बनर्जी। (फोटो- पीटीआई)

जय हो उन आदरणीय सीएम जी की, जिन्होंने गद्दीनशीन होते ही एक फटी जीन्स वाली लड़की की जीन्स का सार्वजनिक तरीके से नखशिख वर्णन करके कुटाई प्राप्त की कि कितना मर्दवादी दिमाग पाया है सर जी ने! टीएमसी की एक सांसद ने सीधे सीएम का ही नखशिख वर्णन कर उनकी हवा निकाली कि हमने भी देखा कि एक आदमी कितना बेहूदा है! एक ने तो यह तक कहा कि उन पर ‘हेरासमेंट’ का मामला बनता है।

ममता से अधिक उनका पलस्तरवादी पांव बोलता है। उनकी वील चेयर बोलती है। अब कहां वो ममता दीदी, जो सारे मंच पर इधर-उधर घूम कर धाराप्रवाह बांग्ला बोलछिन और कहां ये ममता दी जो अब ‘मॉडुलेटेड’ तरीके से और अपेक्षाकृत धीमी गति से बोलती हैं। भीड़ को जो मजा उनके दनदनाने में आता था अब वैसा नहीं दिखता। उतनी ताली, उतना शोर नहीं दिखता। उसके बरक्स पुरुलिया रैली में हाजिर-जवाब भीड़ ने मोदी जी को खूब जमाया!

मुंबई के एक एनकाउंटर एक्सपर्ट की सनसनीखेज अपराध-कथा आजकल सब चैनलों पर लाइव रहती है और जैसे-जैसे कारें, कैश और होटल बुकिंग के किस्से मिलते जाते हैं वैसे वैसे अपराध-कथा पूछती जाती है कि वह पुलिसवाला था कि वर्दीवाला गुंडा? एनआईए ने उसकी हुलिया टाइट कर दी कि मुंबई पुलिस चीफ तक को ‘ट्रांसफर’ झेलना हुआ। लगता है, इन दिनों सरकारों तक का ऐसा लंपटीकरण हो चला है कि आम आदमी जाए तो जाए कहां? कोविड की दूसरी लहर पहली से बड़ी नजर आती है। डॉक्टरजन कारण गिनाते थक चले हैं। भीड़ों के सीनों के ज्यादातर चेहरे मास्क नहीं लगाते।

अगर कोई लगाता भी है तो मुंह और ठोड़ी पर लगा कर नया ‘फैशन स्टेटमेंट’ बनाता है और जो चैनलों में मास्क पहनने का सही तरीका बताने आते हैं वे खुद बिना मास्क के नजर आते हैं या ठोड़ी पर चिपकाए दिखते हैं। बंधु! जैसा आप करेंगे वैसा ही लोग करेंगे। आप लगाते दिखें तो वे भी लगाते दिखें। चैनल भी चर्चा तो करेंगे, लेकिन विज्ञापन न देंगे कि मास्क लगाना अनिवार्य है! कहां गई चैनलों की सीएसआर भावना?

इस बीच एक टीका खबरों में पिट गया। यूरोप के कई देशों ने उसे रोक दिया। जिसके लिए एक चैनल रोज देसी भारत वाले को पीटता-पिटवाता रहा था, वही ‘टारगेट’ बना!

टीकाकारण संबंधी बहसें उठती-गिरती रहीं कि अगर यही रफ्तार रही, तो अपने यहां सबको दस साल में लग पाएगा, इसलिए तेजी करें। तेजी कैसे करें? देसी वैक्सीन तो ‘गुडविल’ में विदेशों को भेजी जा रही है, कई जगह स्टाक कम बताया जा रहा है!

सबसे डरावनी खबर वसीम रिजवी का सिर काटने के बदले ग्यारह लाख का इनाम घोषित करने वाले एक कट्टरतावादी तत्ववादी ने बनाई। वसीम का ‘अपराध’ कि उन्होंने कुरान की ‘कुछ आयतों’ को ‘हटाने’ के लिए सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दी।

उदार समझदार कि चुप लगा गए। एक एंकर ने भाजपा प्रवक्ता से उम्मीद लगाई कि वह वसीम का पक्ष लेगा, लेकिन उसने तुरंत कह दिया कि हम उनकी लाइन से सहमत नहीं हैं, बाकी तत्ववादी उनको ‘धर्मद्रोही’ कहते रहे, लेकिन सिर काटने की धमकी को भी ‘गलत’ कहते रहे।

बाकी समय राहुल जी के ट्वीट-कटाक्ष आनंदित करते रहे कि चुनाव तो सद्दाम और गद्दाफी भी जीता करते थे! लेकिन आश्चर्य कि एक भी चैनल ने इस सूक्ति को बहस योग्य न समझा!

एक किसान समर्थक चैनल जीरो ग्राउंड से रिपोर्ट करता दिखा कि सिंघू बार्डर पर किसानों की मौजूदगी घट गई है। क्यों? जवाब में एक किसान बोला कि लोग फसल कटाई के लिए गए हैं, जब भी बुलाएंगे, आ जाएंगे!
हाय! हाय! लेकिन गया बुधवार बड़ा ही गैर-जनतांत्रिक निकला!

भारत के सबसे बेहतरीन दो बुद्धिजीवियों ने एक विश्वविद्यालय से त्यागपत्र दे दिया और सिर्फ एक हमदर्द चैनल कुछ देर रोता दिखा कि ये क्या हुआ, कैसे हुआ, क्यों हुआ? और पैनल में बैठे बुद्धिजीवी बोले कि ‘मैनेजमेंट’ ने ‘सरेंडर’ क्यों कर दिया? एंकर बोला कि सरकार का दबाव था। इस्तीफा देने वालों में से एक ने कहा भी है कि उनके कॉलम विवि के हितों के लिए खतरनाक बन गए थे, ऐसे माहौल में उदार कलाओं की सेवा नहीं की जा सकती, इसलिए ‘नौकरी छोड़ दी हमने!’ ‘दबाव’ का जिक्र खूब था, लेकिन ‘दबावकारी’ का नाम कोई नहीं लेता था। फिर सब निजी पूंजी चालित उदार विश्वविद्यालय और स्वायत्तता को एक-दूसरे का दुश्मन मानते रहे, लेकिन किसी ने न पूछा कि जब यह सब मालूम था तो ये बुद्धिजीवी वहां गए क्यों? क्या बड़ी पगार के लिए? बड़ी पगार लोगे और लाला जी की बात न मानोगे तो कैसे चलेगा? ऐसा तो होता ही।

अब इसे लालच कहा जाए या शहादत कहा जाए? सच है : काजर की कोठरी में कैसो हू सयानो जाय एक रेख लागिहे पे एक रेख लागिही!

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