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बाखबर: सिल बट्टा

‘ट्विटर’ के पूर्वाग्रह पर सरकार ने जैसे ही टोका, वैसे ही एक चैनल सरकार को ठोकने आ गया! उसकी लाइन रही कि ट्विटर पर सरकार का गुस्सा नाजायज है, लेकिन बाकी चैनलों की लाइन रही कि ट्विटर ही पूर्वाग्रही है। ‘कैपीटल हिल’ को लेकर वह ‘पांच सौ हैंडिल’ हटाता है, जबकि लाल किले को लेकर ‘सिर्फ डेढ़ सौ’ हटाए!

Bakhabarबंगाल की एक सभा में बोलते केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह। (फोटो- पीटीआई)

प्रधानमंत्री ने संसद में विपक्ष को देर तक धोया : विपक्ष की नीति है ‘न खेलब न खेले देब, खेलिए बिगाड़ब’ यानी ‘न खेलूंगा न खेलने दूंगा खेल बिगाडूंगा’… आंदोलन पवित्र, लेकिन आंदोलनजीवी उकसाते हैं। आंदोलनकारी और आंदोलनजीवी में फर्क करना होगा!
हाय हाय! हमें ‘आंदोलनजीवी’ कह दिया। अगर हम ‘आंदोलनजीवी’ तो आप ‘क्रोनीजीवी’!

इसे कहते हैं : सौ सुनार की एक लुहार की! राज्यसभा से आजाद की विदाई के वक्त पीएम ने ‘आजाद’ की ‘आजादी’ की न केवल तारीफ की, बल्कि उनके आंसुओं को याद करके रोने भी लगे! पीएम के आंसुओं का असर हुआ! जवाब में ‘आजाद’ फिर से रोए!
इसे देख विपक्ष अपने ‘अमर्ष’ में रोया कि पीएम के आंसू ड्रामा हैं। ये आंसू घड़ियाली हैं। दो सौ किसान धरना देते मर गए, उनके लिए एक आंसू नहीं और आजाद को पटाने के लिए आंसू।

बताइए! ये आंसू मेरे दिल की जुबान हैं कि दिल की दुकान हैं? चैनलों ने टीका की : अब गए आजाद अब गए आजाद अब गए आजाद! आजाद शेरों में बोले और साफ किया कि कांग्रेसी हूं, वहीं रहूंगा!

अगले रोज लोकसभा में राहुल ने पीएम पर कटाक्ष किया : ये है ‘हम दो हमारे दो’… और फिर ‘टारगेट’ बने। राहुल के सलाहकारों को एक सलाह कि भैया जी को समझाएं कि गुस्से में चीखने से आवाज फट जाती है। अपनी आवाज में कुछ ‘मॉड्यूलेशन’ लाएं। गला भी कम दुखेगा और असर भी अधिक होगा!

उस चैनल के ‘कान्क्लेव’ में ममता दी फार्म में दिखीं। एकदम दोटूक! मैं सेलरी नहीं लेती। रायल्टी से काम चल जाता है। सुबह ट्रैडमिल पर दस किलोमीटर और दिन में बारह किलोमीटर पैदल चलती हूं। चलते-चलते आइडिया आता है। मैं ‘स्ट्रीट फाइटर’ हूं… ये (भाजपा) लोग ज्यादा दिन रहे, तो देश बेच देंगे… भाजपा की रथयात्रा पर रथयात्रा। नड्डा जी तो बंगाल में, अमित जी तो बंगाल में, लेकिन ममता के तेवर कहते हैं कि बंगाल फतह आसान नहीं!

एक ध्रूवीकरण साफ देखा जा सकता है। पांच चैनल एक तरफ, लेकिन एक चैनल एक तरफ। पांच चैनल कहें कि अपना टीका टॉप का, तो एक चैनल देशी-विदेशी फिरंगियों से नित्य कहलवाता रहता है कि देसी टीके का क्या भरोसा। असली टीका फिरंगी वाला! ऐसा फिरंगीपना क्यों?

इसी तरह ‘ट्विटर’ के पूर्वाग्रह पर सरकार ने जैसे ही टोका, वैसे ही एक चैनल सरकार को ठोकने आ गया! उसकी लाइन रही कि ट्विटर पर सरकार का गुस्सा नाजायज है, लेकिन बाकी चैनलों की लाइन रही कि ट्विटर ही पूर्वाग्रही है। ‘कैपीटल हिल’ को लेकर वह ‘पांच सौ हैंडिल’ हटाता है, जबकि लाल किले को लेकर ‘सिर्फ डेढ़ सौ’ हटाए!

एक दिन दिल्ली पुलिस ने लालकिले के ‘मुख्य आरोपित’ दीप सिद्धू को गिरफ्तार कर सात दिन की रिमांड पर ले लिया। चैनल उसके वीडियो दिखाते रहे। एक में वह कहता था : जो हुआ वह गुरु का हुकुम था, दूसरे में कहता था कि इस आंदोलन से एशिया की ‘जियोपॉलिटिक्स’ बदल जानी है। तीसरे में कहता : तुसी एका बनाए रखो, उत्थे जुड़े रहो।

इस बीच ट्विटर की जगह देसी ‘कू’ के आने की खबर ब्रेक हुई। अब तक आप जो ट्विटर से ट्विटराते थे अब ‘कू’ में ‘कू कू’ कर सकते हैं, लेकिन ट्विटर वाली आवारगी नहीं कर सकते।

अंत में एक राष्ट्रवादी चैनल पर कंगना मैडम जी उवाचीं : मोदी सरकार अभी तक टॉलरेट कर रही है, रामदेव को तो कांग्रेस ने मार भगाया था… जब विपक्ष मोदी को चोट नहीं पहुंचा सके, तो रिहाना-ग्रेटा पर लपक लिए… अमेरिका का प्रेसीडेंट ऐसा लगता है कि चीन का नौकर हो। कह रहा है कि चीन ने नहीं फैलाया, जबकि उसने ‘बायोवार’ किया है, चीन में कोई आजादी नहीं… ये किसान आंदोलन सिर्फ एक स्टेट का है, जिसे खालिस्तानी चला रहे हैं… मेरा ट्विटर बंद कर दिया है ‘चाय योगा’ को बंद कराना ‘कोड वर्ड’ हो सकते हैं… एक कंगना सब पर भारी!

शुक्रवार की सुबह राहुल ने प्रेस कान्फ्रेंस में चीन के मामले में रक्षामंत्री को ‘टारगेट’ किया कि पीएम कायर हैं… भारत माता को चीर कर एक टुकड़ा चीन को दे दिया गया है… भाजपा ने प्रत्याक्रमण किया कि सरकार ने एक इंच नहीं दी, लेकिन वे बताएं कि उनके दादा ने बासठ में चीन को जमीन क्यों दे दी थी? मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी ने दुहत्थड़ मारा कि राहुल ‘मंदबुद्धि’ हैं…

एक विज्ञापन में एक परिवार के लोग एक-दूसरे से पूछते फिरते हैं कि ‘सिल बट्टे’ को अंग्रेजी में क्या कहते हैं? ‘अमेजन ऐप’ वाली बेटी कहती है कि ‘सिल बट्टे’ को ‘सिल बट्टा’ ही कहते हैं। ‘सिल बट्टा’ ही लिखो, हिंदी में ही लिखो। अमेजन हिंदी जानता है और आजकल ‘सिल बट्टा’ भी सप्लाई करता है।

शुक्रवार की सुबह एक चैनल ने लाइन लगाई : किसान आंदोलन दो फाड़? एक फाड़ टिकैत का, दूसरा चढूनी का? इसी तरह रहा तो एक दिन वह सौ-फाड़ भी हो सकता है!

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