स्वधर्मे निधनं श्रेय:

ऐसी हर चर्चा धर्मांतरण के विचार को बेचती है, क्योंकि अधिकांश एंकरों को मालूम ही नहीं कि इस्लाम क्या है और जिनको मालूम है, वे सिर्फ ‘जबरन’ पर आपत्ति करते हैं! सच कहें, ऐसी हर बहस धर्मांतरण के धंधे को ‘सामान्यीकृत’ करती है! और अपने को देशभक्त कहने वाले चैनलों को इसका भान तक नहीं!

Akhada Parishad, Narendra Giri
महंत नरेंद्र गिरी को समाधि देने के दौरान उपस्थित भक्त और अन्य लोग। (फोटो- पीटीआई)

बाबा गए तो चैनल भी बाबा-बाबा हो गए! बाबा ने ली समाधि तो चैनलों ने भी ली समाधि!
बाबा ने छोड़ा सात पेज लंबा ‘सुसाइड नोट’! लेकिन फिर भी जितने मुंह उतनी बात!
कुछ बोले बाबा ‘अनपढ़’, तो कुछ कहिन पढ़े-लिखे। कोई कहे, वे सात पेज लंबा ‘सुसाइड नोट’ नहीं लिख सकते थे। दूसरे बोले कि हाईस्कूल तक पढ़े थे, यानी लिख सकते थे!

बाबा ‘कन्फ्यूज’ तो चैनल ‘डबल कन्फ्यूज’!
तीन दिन तक होता रहा ‘बाबा महान’ कि ‘बाबा महान’! कोई कहे करोड़ों की प्रापर्टी ने ले ली जान, तो कोई कहे ‘ब्लैकमेलर’ चेले के ‘वीडियो’ ने ले ली जान!
लेकिन किसी खोजी चैनल ने नहीं दिखाया ‘ब्लैकमेलर’ चेले का वह वीडियो!
एक आचार्य ने टीका की कि बाबाओं को प्रापर्टी से क्या काम, तो दूसरे बोले कि तू खुद माया में लिप्त है रे!

माया महाठगिनि हम जानी!
बाबा की कहानी बाबाओं की जुबानी हर चैनल पर पूरे तीन दिन बजी कि सबने दिखाया ‘सुसाइड नोट’! बाबा ने ‘सुसाइड नोट’ में लिखा तो एक बाबा, दो बाबा, तीन बाबा का नाम! एक बाबा पकड़ा, दूजा बाबा पकड़ा, तीजा बाबा पकड़ा और बाकी पर नजर!
हजार सवाल : उनके निजी सुरक्षावाले कहां थे? उनकी लाश को पंखे से किसने उतारा? पुलिस पहले पहुंची कि चेले?

सच क्या है, सीबीआई की जांच बताएगी!
रहस्य रोमांच से भरपूर कोई कहानी मिल जाती है, तो हिंदी चैनल गोपीचंद जासूस बन जाते हैं और ‘संत सुसाइड और साजिश’ या ‘माल, महंत और मर्डर’ जैसी लाइनें लगाने लगते हैं और तीन-चार दिन तक बजाते रहते हैं! बाकी कहानियां ‘पांच मिनट में पचास’ के ताबड़तोड़ भाव से पेली जाती हैं!

बाबा की कहानी को हाशिये पर डाला, तो दूसरी धार्मिक कहानी ने जगह ली और वह थी ‘जबरिया धर्मांतरण’ के आरोप में गिरफ्तार हुए मेरठ के एक मौलाना की कहानी!
‘जबरिया धर्मांतरण’ पर प्रसारित एक बहस से साफ हुआ कि ‘धर्मांतरण’ के आरोपितों के पैरोकार आजकल बड़ी दीदादिलेरी से इस्लाम में धर्मांतरण की समूची प्रक्रिया को बताने लगे हैं!

एक हिंदी चैनल की बहस में एक इस्लामी संगठन के नेता ने बताया कि जबरन धर्मांतरण नहीं किया जाता। जो होता है, स्वेच्छा से होता है। मसलन, किसी को ‘एक अदा भा जाती है और वह अपने आप हो जाता है’! लेकिन किसी ने न पूछा कि कौन-सी ‘अदा’ और किसकी ‘अदा’?
धर्मांतरण न हुआ, कला हो गई! आपकी अदा हुई, औरों के लिए कजा हो गई!

ऐसी हर चर्चा धर्मांतरण के विचार को बेचती है, क्योंकि अधिकांश एंकरों को मालूम ही नहीं कि इस्लाम क्या है और जिनको मालूम है, वे सिर्फ ‘जबरन’ पर आपत्ति करते हैं! क्या कोई शौक से अपना धर्म छोड़ता है?
सच कहें, ऐसी हर बहस धर्मांतरण के धंधे को ‘सामान्यीकृत’ करती है! और अपने को देशभक्त कहने वाले चैनलों को इसका भान तक नहीं!
सिर्फ एक चर्चक ने गीता को उद्धृत किया कि ‘स्वधर्मे निधनं श्रेय: परधर्माे भयावह:’!

फिर एक दिन अंग्रेजों ने एक देसी अंग्रेज को कह दिया कि यूके आओ, तो दस दिन के लिए ‘एकांतवास’ में रहना होगा, क्योंकि तुम्हारे भारतीय टीके को मानते ही नहीं! इस पर एक अंग्रेजी एंकर ने लाख चाहा कि देसी अंग्रेज भैया इसे अंग्रेजों की ‘नस्लभेदवादी नीति’ कहें और इसकी निंदा करें, लेकिन वाह रे देसी अंग्रेजी भैया जी, कि इतनी बेहुरमती पर भी यही कहे जाएं कि यह ‘भेदभावपूर्ण’ हरकत नहीं है, कुछ गलतफहमी है!
फिर एक दिन प्रधानमंत्री चले अमेरिका, तो हर चैनल चला अमेरिका! इसके बाद होता रहा अमेरिका अमेरिका अमेरिका अमेरिका!

प्रधानमंत्री जहां-जहां, चैनल वहां-वहां। हर चैनल पल-पल की खबर देने में लगा रहा कि प्रधानमंत्री ये करेंगे और वो करेंगे! प्रधानमंत्री इन-इन सीईओज से मिलेंगे। इनमें कोई ड्रोन बेचता है, कोई सौर उर्जा और कोई बेचता है निवेश! प्रधानमंत्री ने की कमला हैरिस से बात, फिर करेंगे बाइडन से एकांत में बात! प्रधानमंत्री बोलेंगे यूएन में, प्रधानमंत्री करेंगे क्वाड में बात! भक्त चैनल अमेरिका से ही ताल ठोकने लगे : अब हम चीन-पाक-तालिबान को देख लेंगे!

जिस दिन पंजाब को दलित सीएम मिला, उस दिन लगा जैसे कांग्रेस ने जगत जीत लिया हो! सीएम ने भावुक वचन कहे : … मैं मामूली आदमी हूं… रिक्शा चलाता था… आज यहां हूं। राहुल क्रांतिकारी हैं! आज से किसानों का बिजली-पानी बिल माफ!

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