जब नाश मनुज पर छाता है

एक बहस में एक प्रवक्ता ने चुटकी ली कि कन्हैया ने पांच बार कहा ‘कांग्रेस को बचाना है’ तब क्या कांग्रेस डूबता जहाज है, जिसे बचाना है… ये क्या बचाएंगे जो अपनी ही पार्टी सीपीआई को तो बचा नहीं सके! और कैसा दैव दुर्विपाक कि अगले ही दिन से कांग्रेस को झटके लगने शुरू हो गए!

Narendra Modi, Amit Shah, Kanhaiya Kumar
गृह मंत्री अमित शाह, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और सीपीआई नेता कन्हैया कुमार। (फोटोः एजेंसियां)

बाइडेन-मोदी वार्ता की शाम भारत बम-बम होता दिखा : ‘न्यू वर्ल्ड आर्डर’ बन रहा है। ‘क्वाड’ में भारत विश्व गुरु होता दिख रहा है! एक अभक्त कह उठा : सर जी! बहुत बगलें न बजाओ! अमेरिकी मीडिया ने मोदी की यात्रा को दस फीसद जगह भी नहीं दी! भक्त चिल्लाए : हाय हाय! ये दल्ला क्या कह रहा है? लेकिन मोदी हैं कि पीछा नहीं छोड़ते! अमेरिका से लौटे तो अगली सुबह ‘सेंट्रल विस्टा’ का काम देखने पहुंच गए और भक्त देख-देख चकित-थकित कि क्या मोदी थकते नहीं?

इधर किसानों का ‘भारत बंद’ उधर मोदी का ‘आयुष्मान भारत’ के ‘डिजिटल प्लेटफार्म’ का लांच! इसे देख कुछ ‘अभक्त जन’ नाराज कि प्रधानमंत्री की यह कैसी प्राथमिकता है? किसान मर रहे हैं, वे विस्टा देख रहे हैं! पहली बार किसानों को एक ‘नाराज मीडिया’ मिला! इसे देख कर कई किसान नेता चैनलों को ही ‘सत्ता के दलाल’ कहने लगे!

अपना जनतंत्र भी इन दिनों एक से एक ‘विचित्र किंतु सत्य’ टाइप खबरें दिखाता है! एक आइएएस अफसर अपने घर पर लोगों को इस्लाम के फायदे बताता है! इस पर चैनलों ने बहसें आयोजित की, जिनमें धर्मांतरण के पक्षधर कहते रहे कि ‘मुसलमानों को टारगेट किया जा रहा है’। सेक्युलर इसको हिंदुओं का ‘इस्लामोफोबिया’ बताते रहे और यूपी के चुनावों से इसे जोड़ते रहे!

इसके जवाब में हिंदुत्ववादी प्रवक्ता कहते रहे कि यह भारत को तोड़ने की साजिश है… भारत को मुसलमान बनाने का षड्यंत्र बताते हैं! फिर एक दिन ‘कन्हैया-मेवाणी’ की जुगल जोड़ी ने कांग्रेस दफ्तर में बैठ कर देश और कांग्रेस दोनों को बचाया! बची कांग्रेस को ‘ज्वाइन’ करते वक्त कन्हैया ऐसे बोले जैसे कांग्रेस के अध्यक्ष हों कि देश को बचाना है, देश बचाने के लिए कांग्रेस को बचाना है। देश बचेगा तो कांग्रेस बचेगी। कांग्रेस बचेगी तो देश बचेगा। कांग्रेस बड़ा जहाज है, जहाज बचेगा तो देश बचेगा। मगर जब एक पत्रकार ने एक कटखना-सा सवाल पूछ लिया तो कन्हैया उस पत्रकार पर ही बिफर पड़े!

सारी प्रेस कान्फ्रेंस में मेवाणी किनारे पर ही दिखे! वे इतना ही बोले कि मैं अभी कांग्रेस ज्वाइन नहीं कर सकता, क्योंकि स्वतंत्र एमएलए हूं, लेकिन देश बचाना है, संविधान बचाना है, जनतंत्र बचाना है, फासीवाद को हराना है, इसके लिए कांग्रेस को बचाना है! एक बहस में एक प्रवक्ता ने चुटकी ली कि कन्हैया ने पांच बार कहा ‘कांग्रेस को बचाना है’ तब क्या कांग्रेस डूबता जहाज है, जिसे बचाना है… ये क्या बचाएंगे जो अपनी ही पार्टी सीपीआई को तो बचा नहीं सके!

और कैसा दैव दुर्विपाक कि अगले ही दिन से कांग्रेस को झटके लगने शुरू हो गए! पहला झटका सिद्धू ने इस्तीफा देकर दिया! दूसरा झटका अमरिंदर सिंह ने दिल्ली आकर अमित शाह से मिल कर और फिर कांग्रेस छोड़ कर दिया! अमरिंदर ने कहा कि पंजाब ‘बार्डर स्टेट’ है, पाकिस्तान से रोज ड्रोन आते हैं। हथियार और नशा लाते हैं, कुछ पकड़े जाते हैं, बाकी कहां जाते हैं। सिद्धू के हाथों में पंजाब सुरक्षित नहीं है!

दस दिन पुरानी ‘गेम चेंजर’ सरकार हिलती रही! नेताओं के अहंकार टकराते रहे! सिद्धू की रूठा-रूठी चलती रही! सीएम मान-मनौवल करते रहे! सुलह-सफाई होती रही! इसे देख कपिल सिब्बल ने कहा कि ‘पुराने लोग बाहर जा रहे हैं’ … ‘जब कोई अध्यक्ष नहीं, तो फैसले कौन ले रहा है?’ और कि ‘हम ‘तेईस जी’ हैं, लेकिन ‘जी हुजूर नहीं हैं’…

इसे सुनते ही युवा कांग्रेसी कांग्रेस को बचाने निकल पड़े और ‘कपिल सिब्बल मुर्दाबाद’ के नारे लगाते हुए उनके घर पर सड़े टमाटर फेंकते रहे, उनकी गाड़ियों पर कूद कर उनको तोड़ते रहे और ‘गेटवेल सून सिब्बल’ के पोस्टर छोड़ कर भाग गए! इसे देख ‘जी तेईस’ के मनीष तिवारी, आनंद शर्मा, गुलाम नबी आजाद और थरूर तक ने इस ‘आयोजित गुंडई और हिंसा’ पर अपनी नाराजगी जताई, लेकिन जहाज के कुछ स्वनियुक्त कप्तानों ने सिब्बल को जवाब दिया कि अंदर की बात बाहर क्यों की? एक नेता ने अहसान दिखाया कि कांग्रेस ने सिब्बल को क्या नहीं दिया? उन्हें मंत्री बनाया, पहचान दी, वरना क्या थे सिब्बल?

इस पर एक जेडीयू प्रवक्ता ने एकदम निरुत्तर करने वाली टिप्पणी जड़ी कि ‘जब नाश मनुज पर छाता है, पहले विवेक मर जाता है’… कि वकील से कभी नहीं लड़ना चाहिए… जरा सोचिए, इस कांड के बाद ‘नेशनल हेरल्ड’ वाले केस का क्या होगा? और कई केसों का क्या होगा? एक कागज इधर-उधर हुआ नहीं कि खेल हो जाना है! कांग्रेस को लगते इन झटकों के दौरान न तो कन्हैया बचाने आए, न मेवाणी!

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