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युवा शक्ति से राष्ट्र शक्ति

युवा शक्ति किसी भी देश और समाज की रीढ़ होती है। युवा ही देश और समाज को नए शिखर पर ले जाते हैं। यह देखा जा सकता है कि हमारे राष्ट्र के लिए कई परिवर्तन, विकास, समृद्धि और सम्मान लाने में युवा सक्रिय रूप से शामिल हुए हैं। इतना ही नहीं समाज को बेहतर बनाने और राष्ट्र के निर्माण में सर्वाधिक योगदान युवाओं का ही होता है।

युवा शक्ति से राष्ट्र शक्ति

इतिहास गवाह है कि आज तक दुनिया में जितने भी क्रांतिकारी परिवर्तन हुए हैं, चाहे वे सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और वैज्ञानिक रहे हों, उनके मुख्य आधार युवा ही रहे हैं। भारत में भी युवाओं का एक समृद्ध इतिहास है। प्राचीनकाल में आदिगुरु शंकराचार्य से लेकर गौतम बुद्ध और महावीर स्वामी ने अपनी युवावस्था में ही धर्म और समाज सुधार का बीड़ा उठाया था।

पुनर्जागरण काल में राजा राममोहन राय, स्वामी दयानंद सरस्वती के साथ विवेकानंद जैसे युवा विचारक ने धर्म और समाज सुधार आंदोलन का नेतृत्व किया। इतिहास ने युवाओं की शक्ति का प्रभाव देखा है। उदाहरण के तौर पर भारत की आजादी में अनेक युवाओं ने अपना योगदान दिया और कई युवाओं ने बलिदान तक दिया। इसके परिणामस्वरूप हमारा देश ब्रिटिश सरकार को भागने में कामयाब हुआ। युवाओं ने इस प्रकार अनेक ऐतिहासिक बदलाव किए हैं।

अगर वर्तमान भारत की बात की जाए तो यह दुनिया का सबसे युवा देश है। जनसंख्या के आंकड़ों के मुताबिक भारत में पच्चीस वर्ष तक की आयु वाले लोग कुल जनसंख्या के पचास फीसद हैं, वहीं पैंतीस वर्ष तक वाले कुल जनसंख्या के पैंसठ फीसद हैं। जनसंख्या का इतना बड़ा हिस्सा राष्ट्र के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है और इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है।

यानी भारत अपने भविष्य के उस सुनहरे दौर के करीब है, जहां उसकी अर्थव्यवस्था नई ऊंचाइयों को छू सकती है। यही कारण है कि भारत को दुनिया भर में उम्मीद की नजरों से देखा जा रहा है और इक्कीसवीं सदी की महाशक्ति होने की भविष्यवाणी की जा रही है। ये युवा न केवल कुल आबादी का एक बड़ा हिस्सा हैं, बल्कि आने वाले समय में सामाजिक-राजनीतिक, आर्थिक और जनसंख्या के विकास का संकेत भी देते हैं।

चूंकि ये किसी भी देश के सबसे अधिक उत्पादक कामकाजी वर्ग होते हैं, तो यह उम्मीद की जा रही है कि युवाओं की बड़ी आबादी की मदद से भारत वर्ष 2025 तक दुनिया की चौथी बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगा। तब विश्व की कुल जीडीपी में भारत का योगदान लगभग छह फीसद होगा। लेकिन यह बात भी सत्य है कि बिना खनिज संसाधन के तो किसी देश का विकास हो सकता है, लेकिन बिना मानव संसाधन के देश के विकास के बारे में सोचा भी नहीं जा सकता।

इसका प्रत्यक्ष उदाहरण हम जापान का ले सकते हैं, जिसने खनिज संसाधनों के अभाव के बावजूद अपने मानव संसाधन के दम पर विकास की इबारत लिखी और आज दुनिया की तीन बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। अगर भारत के राज्यों की बात की जाए तो बिहार, छत्तीसगढ़ और ओड़ीशा जैसे राज्य संसाधनों के बावजूद पिछड़े हुए हैं, जबकि केरल, कर्नाटक जैसे राज्य विकास के मामले में आगे हैं। अगर शिक्षा, स्वास्थ्य एवं कौशल विकास में निवेश करके मानव संसाधन को मानव पूंजी में तब्दील कर दिया जाए तो निश्चय ही भविष्य में इसका बेहतर प्रतिफल मिलेगा।

लेकिन सवाल है कि वह कौन-सा युवा है जो देश बदलेगा? क्या वह जो रोजगार के लिए दर-दर भटक रहा है? यह वह, जिसकी प्रतिभा भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाती है? या जो वंशवाद का मुखौटा ओढ़ कर खुद को एक विकल्प के रूप में प्रस्तुत करता है? क्या वे युवा जो देश में अपनी प्रतिभा को उचित सम्मान न मिलने पर विदेशी कंपनियों में नौकरी कर देश छोड़कर चले जाने के लिए विवश हैं? या जिनके हाथों में डिग्रियां तो हैं, लेकिन विषय से संबंधित व्यावहारिक ज्ञान का सर्वथा अभाव है? वे साक्षर तो हैं शिक्षित नहीं। आज बहुत से ऐसे विकसित और विकासशील राष्ट्र हैं, जहां नौजवान ऊर्जा व्यर्थ हो रही है। कई देशों में शिक्षा के लिए जरूरी आधारभूत संरचना की कमी है तो कहीं प्रच्छन्न बेरोजगारी जैसे हालात हैं।

इन स्थितियों के बावजूद युवाओें को एक उन्नत और आदर्श जीवन की ओर अग्रसर करना वर्तमान की सबसे बड़ी जरूरत है। यह सच है कि जितना योगदान देश की प्रगति में कल-कारखानों, कृषि, विज्ञान और तकनीक का है, उससे बड़ा और महत्त्वपूर्ण योगदान स्वस्थ और शक्तिशाली युवाओं का होता है। शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ युवाओं से ही मिलती है राष्ट्र को मजबूती।

ऐसे में जरूरत इस बात की है कि हम युवाओं को सशक्त बनाएं, ताकि वे शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य, कौशल विकास, सामुदायिक संपर्क, राजनीति और प्रशासन में अपनी भागीदारी बढ़ाकर समाज में उचित स्थान पा सकें। अर्नाल्ड टायनबी ने अपनी पुस्तक ‘सरवाइविंग द फ्यूचर’ में नौजवानों को सलाह देते हुए लिखा है कि ‘मरते दम तक जवानी के जोश को कायम रखना।’

भारतीय लोकतंत्र का भविष्य भी युवा कंधों पर ही है। परिवर्तन का दूसरा नाम युवा है और युवा शक्ति जिस ओर चलती है, जमाना समाज उसी ओर चल पड़ता है। बहरहाल, बरसों से विकास के प्रयासों के बावजूद युवा शक्ति आज भी तरक्की की दौड़ में काफी चुनौतियां झेल रही है। फिर चाहे शिक्षा हो, रोजगार हो या स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियां। इसलिए नया भारत निर्मित करते हुए हमें अब युवा पीढ़ी के सपनों को टूटते-बिखरते हुए नहीं रहने देना चाहिए।

बल्कि देश निर्माण में उनकी भागीदारी को सुनिश्चित किया जाना चाहिए। दरअसल, युवा अपनी जिम्मेदारियों को समझने लगे हैं। कुछ अपवाद हो सकते हैं, लेकिन उन्हें समाज की मुख्यधारा से जोड़ने के लिए ठोस कदम उठाए जाने की जरूरत है। हम अपने ही मुल्क को देखें तो आजादी के बाद अब तक पचहत्तर सालों में कई बड़े परिवर्तनों के गवाह बने हैं। राजनीति हो या समाज, अर्थव्यवस्था हो या फिर संस्कृति, कोई भी समय की गति से प्रभावित हुए बिना नहीं रहा है और इसमें सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भूमिका अगर किसी की रही है तो वह है युवा।

भारत में युवाओं को अगर सही दिशा में प्रशिक्षित किया जाए और वे अपना योगदान सही दिशा में दें तो भारत संपूर्ण विश्व में सबसे उच्च कोटि का बन जाएगा। ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में जाएं तो यह पता चलता है कि हमारे राष्ट्र के लिए कई परिवर्तन, विकास, समृद्धि और सम्मान दिलाने में युवाओं की भागीदारी और सक्रियता उच्च कोटि की रही है। समाज में व्याप्त कई समस्याओं पर कार्य करके युवा दूसरों के लिए एक आदर्श बन सकते हैं।

युवावस्था जीवन की वह अवधि है, जो शक्ति और क्षमता के साथ आगे बढ़ती है। किसी भी समस्या का समाधान युवा सकारात्मकता से हल करना जानता है। जाहिर है, किसी भी देश के युवा उस देश का भविष्य होते हैं और उस देश की प्रगति और विकास में उनकी प्रमुख भूमिका होती है। समाज को बेहतर बनाने और राष्ट्र निर्माण के कार्यों में युवाओं को सम्मिलित करना अति महत्त्वपूर्ण है।

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First published on: 15-01-2023 at 05:45:00 am