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इतिहास की करवट

अक्सर छवि प्रशासनिक अकर्मण्यता या अक्षमता की वजह से बिगड़ती है। उसको सुधारने के लिए प्रशासनिक क्षमता की बढ़त पर ध्यान देना जरूरी होता है। कहीं का ईंट और कहीं का रोड़ा लेकर उन पर मंत्र फूंकने से नई छवि जादुई तौर से हाजिर नहीं हो जाती है।

कश्मीर में बंद बाजार। (पीटीआई)

एक फिल्म असल जिंदगी के नायक को खलनायक में कैसे तब्दील कर देती है, इसका उदाहरण श्रीनगर में लगभग तीस साल पहले हुई घटनाओं से बखूबी मिलता है। 1988 में लगी इस फिल्म का संबंध कश्मीर की राजनीति से दूर-दूर तक नहीं था, पर उसमें निहित भावना ने जो विस्फोट उत्पन्न किया, उसने जम्मू और कश्मीर के सूरते-ए-हाल को हमेशा के लिए बदल दिया है। वास्तव में इतिहास बीते हुए समय का लेखा-जोखा होने के अलावा वर्तमान को भी परिभाषित करता है। उसकी निगहबानी में आज का कर्म कल का फल बन जाता है, जिसकी खटास हमेशा पिछली खटास से ज्यादा होती है।

1987 के जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनाव में व्यापक रूप से धांधली हुई थी। कांग्रेस और नेशनल कॉन्फ्रेस ने मिल कर चुनाव लड़ा था और फर्जी जीत के आधार पर फारूक अब्दुल्ला एक बार फिर मुख्यमंत्री बन गए थे। फारूक जब पहली बार मुख्यमंत्री 1982 में अपने पिता शेख अब्दुल्ला के इंतकाल के बाद बने थे, तब उनके साथ शेर-ए-कश्मीर की विरासत का बड़ा भंडार था। शेख अब्दुल्ला कश्मीर के सबसे प्रभावशाली नेता थे, जिन्होंने शोषित कश्मीरियों के लिए 1930 से लगातार संघर्ष किया था। उनकी पार्टी का नाम शुरुआती दौर में मुसलिम कान्फ्रेंस था, पर कांग्रेस के नेता जवाहरलाल नेहरू से मिलने के बाद 1938 में उन्होंने इसका नाम बदल कर नेशनल कान्फ्रेंस कर दिया था। शेख का मानना था कि महाराजा हरी सिंह की रियासत में रहने वाले हर शख्स को शोषण से बचाने का बीड़ा उन्होंने उठाया था और इसलिए उन्होंने मुसलिम शब्द पार्टी के नाम से निकाल दिया था। नेहरू से उनकी गहरी दोस्ती थी और जब 1947 में बंटवारे के बाद पाकिस्तान ने कश्मीर पर हमला बोला तो शेख अब्दुल्ला ने बड़ी मुस्तैदी से भारत का साथ निभाया था।

पर आजादी मिलने के बाद, शेख अब्दुल्ला की कई बार दिल्ली की सत्ता से बिगाड़ हई, जिसकी वजह से उन्हें पंद्रह साल तक कश्मीर से दूर नजरबंद रखा गया था। इस दूरी के बावजूद शेख अब्दुल्ला का कश्मीर घाटी में बड़ा सम्मान था। आम लोग उनको अपना रहनुमा मानते थे। जब शेख की मौत हुई तो एक अपार जनसमूह उनको भावुक अलविदा कहने के लिए उमड़ पड़ा था। ‘हमारा शेर खामोश हो गया है’ या ‘हम तो जानवर थे, शेख साहब ने हमें इंसान बनाया था’ जैसी प्रतिक्रियाएं उस दुख की घड़ी में आम थीं।

फारूक अब्दुल्ला से लोगों को बहुत उम्मीदें थीं। वे उनमें शेख का जज्बा और हौसला देखना चाहते थे। शेख अब्दुल्ला के कुनबे की तमाम तरीके की सियासत देखने के बाद भी शेर-ए-कश्मीर की विरासत में कोई खास सेंध नहीं लग पाई थी, हालांकि फारूक अब्दुल्ला के तौर-तरीकों से लोग नाराज जरूर थे। 1987-88 में फारूक अपनी घटती साख से परेशान थे। चुनाव में धांधली और प्रशासनिक अक्षमता के आरोप उन्हें हर तरफ से घेरने लगे थे। फारूक को ‘इमेज मैनेजमेंट’ करने की जरूरत महसूस होने लगी थी। वे चाहते थे कि लोग उनके पिता को फिर से याद करें और पुराने भरोसे को उन पर एक बार फिर निछावर कर दें। उन्होंने शेर-ए-कश्मीर की दहाड़ को घाटी में एक बार फिर से गुंजाने का फैसला कर लिया था।

उन दिनों लीबिया के मशहूर क्रांतिकारी शेख उमर मुख्तार पर एक अंग्रेजी फिल्म ‘लायन ऑफ द डेजर्ट’ (रेगिस्तान का शेर) रिलीज हुई थी। शेख मुख्तार ने 1911 से 1931 तक इटली की फौज से अपने देश की आजादी के लिए संघर्ष किया था। उन्होंने भीषण हालात का मुकाबला करते हुए अपनी जंग बिना सौदेबाजी किए तब तक जारी रखी थी, जब तक उन्हें विदेशी फौज ने पकड़ कर फांसी पर नहीं लटका दिया। उनका बलिदान लीबिया और अन्य मुसलिम देशों में बड़े गौरव से याद किया जाता है।

‘लायन ऑफ द डेजर्ट’ को कश्मीर में रिलीज करने पर फारूक अब्दुल्ला सरकार के कुछ लोग सहमत नहीं थे। फिल्म में इस्लाम और इस्लाम धर्मावलंबियों का वर्चस्व दिखाया गया था। शेख उमर मुख्तार खुद क्रांतिकारी होने के अलावा धर्मप्रचारक भी थे। उन्होंने फारूक अब्दुल्ला को इस मुद्दे पर सजग भी किया था, पर उन्होंने सिर्फ फिल्म के नाम, जिसमें शेर था, पर नजर डाली थी। फारूक का तर्क था कि रेगिस्तान के शेर से लोगों को कश्मीर के शेर की याद आ जाएगी और वे दुबारा उनके पीछे लामबंद हो जाएंगे।

फिल्म श्रीनगर के रीगल और पैलेडियम सिनेमा हॉलों में एक साथ लगी थी। मुंह अंधेरे से एडवांस बुकिंग की लाइन लगने लगी थी और पहले दिन के सारे शो फुल हो गए थे। पर पहले शो के बाद ही भीड़ इन दोनों सिनेमाघरों से गुस्से में बाहर निकली और उसने सीधे नेशनल कान्फ्रेंस के दफ्तर पर धावा बोल दिया था। भीड़ ने पररय के मुजाहिद मंजिल दफ्तर पर भारी पथराव किया और वहां लगे शेख अब्दुल्ला के सारे बैनर और पोस्टरों को फाड़ दिया था। एक क्षण में शेख अब्दुल्ला की पचास साल लंबी कश्मीर समर्पित संघर्ष की विरासत कूड़ेदान में चली गई थी।

हालांकि फिल्म देखने वालों में बहुत कम लोग अंग्रेजी समझते थे, पर चलचित्र का संदेश भाषाई अड़चन को बेहद सहज तरीके से लांघ गया था। उनको शायद पहली बार यह साफ दिखने लगा था कि शेख उमर अपने वतन के लिए फांसी पर झूल गए थे, पर शेख अब्दुल्ला ने वतन और कौम के नाम पर मुख्यमंत्री की कुर्सी के लिए सौदेबाजी की थी। उन्होंने कश्मीरी अवाम के साथ धोखा किया था और उनके वंशज फारूक भी ऐसा ही कर रहे थे। फिल्म ने एक झटके में शेर-ए-कश्मीर से आम लोगों का मोहभंग कर दिया था। इस्लामिक रेगिस्तान का शेर कश्मीर के शेर को निगल गया था।

फिल्म के प्रभाव के फलस्वरूप कश्मीर घाटी से नौजवान सीमा पार पाकिस्तान हथियारों के परीक्षण के लिए जाने लगे। 1988 के बाद से इस्लामिक आंतकवाद बढ़ने लगा था और जल्दी ही उसने सारी घाटी को अपने नागपाश में ले लिया था। फारूक अब्दुल्ला भी सत्ता से जल्दी ही बेदखल हो गए थे, पर उनके निर्णय का भयानक अंजाम देश आज भी भुगत रहा है।

इतिहास बहुत कुछ सिखाता है, अगर हम शिक्षित होने को तैयार हों तो। पर इस वाकये से साफ है कि ‘इमेज मैनेजमेंट’ (छवि प्रबंधन) गवर्नेंस मैनेजमेंट (कार्य प्रबंधन) का विकल्प नहीं है। अक्सर छवि प्रशासनिक अकर्मण्यता या अक्षमता की वजह से बिगड़ती है। उसको सुधारने के लिए प्रशासनिक क्षमता की बढ़त पर ध्यान देना जरूरी होता है। कहीं का ईंट और कहीं का रोड़ा लेकर उन पर मंत्र फूंकने से नई छवि जादुई तौर से हाजिर नहीं हो जाती है। फारूक अब्दुल्ला और उनके बेटे उमर शायद आज तक इस सच को नहीं समझ सके हैं। पर देश के बाकी सत्ताधीशों को इसे तुरंत समझ लेना चाहिए।

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