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पलों के बीज फिर फूटेंगे

कैलेंडर बदल जाने से समय नहीं बदल जाता है। समय की गति बारह पेज के कैलेंडर में सिमटी नहीं होती है। काल इससे बाहर घटित होता है। इसका नया साल वास्तव में पुराना साल होता है। कलैंडर को पढ़ा जा सकता है और तीन सौ पैंसठ दिन बाद नए साल की शुरुआत तय की जा सकती है। समय को पढ़ना आमतौर से हमारे वश की बात नहीं है।

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देश में बढ़ रहे हैं कोरोना के मामला (एक्सप्रेस फोटो)

हर पल में बहुत सारी संभावनाएं होती हैं, पर हर संभावना को कुछ पल मिल जाएं, संभव नहीं है। संभावनाएं क्षण भंगुर होती हैं, वे पल के साथ विलुप्त हो जाती हैं। इसके साथ यह भी सच है कि एक पल की संभावनाएं दूसरा पल बनाती हैं। वस्तुत: मुरझाई हुई संभावनाएं क्रमात्मक तरीके से पलों का बीज बन कर एक काल खंड को अंकुरित कर देती हैं।

हर संभावना को क्रियान्वित नहीं किया जा सकता है, पर हर क्रिया उसके फल की संभावना से उपजती है। क्या मुमकिन है और क्या मुमकिन नहीं है का फैसला क्रिया की सोच और समय का स्वभाव करता है। अक्सर समय की ऊर्जा या उसकी निष्क्रियता क्रिया पर निर्णायक प्रभाव डालती है। जब समय अच्छा होता है तो कम प्रयास से बहुत कुछ हासिल हो जाता है। इसके विपरीत बुरा वक्त कर्म को लड़खड़ा देता है। समय को पहचान कर प्रयास को उसके अनुसार ढाल देने से रोजाना की कुंठा से बचा जा सकता है।

कैलेंडर बदल जाने से समय नहीं बदल जाता है। समय की गति बारह पेज के कैलेंडर में सिमटी नहीं होती है। काल इससे बाहर घटित होता है। इसका नया साल वास्तव में पुराना साल होता है। कलैंडर को पढ़ा जा सकता है और तीन सौ पैंसठ दिन बाद नए साल की शुरुआत तय की जा सकती है। समय को पढ़ना आमतौर से हमारे वश की बात नहीं है। उसको सिर्फ महसूस किया जा सकता है, क्योंकि काल दीवार पर चिपका कैलेंडर नहीं है।

वह आसपास घुमड़ता अदृश्य बादल है, जो कभी यकायक बरस जाता है तो कभी गरज कर अपने मिजाज की चेतावनी दे जाता है। समय के संकेतों को पकड़ने के लिए कान लगाना पड़ता है। अपने को उसकी ध्वनि पर केंद्रित करना होता है। क्रिया अविरल बहते हुए झरने की तरह है, जिसकी कुछ बूंदें समय की किरण पड़ जाने से उज्ज्वल हो जाती हैं, जबकि अन्य ओट में होने की वजह से मटमैली ही रहती है। शायद इसलिए कहते हैं कि किस्मत वक्त आने पर चमकती है।

बुरे वक्त में सब्र से मित्रता श्रेष्ठ होती है, क्योंकि बुरा वक्त संयम की परीक्षा लेता है- उसको खींचता है, तानता है। हमें अधीर बना कर छटपटा देता है। तनाव बुरे समय की पहली पहचान है। दूसरी पहचान मन में पनपती कुंठा है। कुंठा आत्मविश्वास पर घुन की तरह काम करती है। वह हमें खोखला कर देती है। हमारा सयम भुरभुरा कर बैठ जाता है। उसके खत्म होते ही हम समय के विपरीत आचरण करने लगते हैं। समय बलवान हो जाता है और मनुष्य के सारे गुणों का संहार एक क्षण में कर देता है। मनुष्य को समय इस तरह से बर्बाद कर देता है।

कहा जाता है कि समय से डरो। पर डर ठीक नहीं होता है। डर पंगु बना देता है। क्रियावान व्यक्ति पंगु नहीं हो सकता है। वह इसलिए वक्त से डरता नहीं है, सिर्फ सतर्क रहता है। जरा-सी भी सुगबुहाट उसको होशियार कर देती है कि वक्त का मिजाज बदल रहा है और वह अपने यत्न बदलाव के अनुसार ढाल दे। वह समय से लड़ता नहीं है और न ही उसे बदलने की कोशिश करता है। वह वक्त को लगातार अपनाता जाता है। उसके प्रवाह में बहते हुए किनारा पाने का प्रयास करता है।

कैलेंडर के हिसाब से नया साल आ गया है। 2021 अब 2022 में तब्दील हो चुका है। पर अगर देखा जाए तो 2019 और 2022 के बीच में कुछ नहीं बदला है। महामारी का खतरा अभी जारी है। स्वस्थ रहने की चुनौती रूप बदल-बदल कर हमारे सामने खड़ी हुई है। जीवन और आजीविका के सवाल मुंह बाए सामने खड़े हैं। पिछले दो सालों में कैलेंडर बदले हैं, पर समय नहीं बदला है। आगे भी ऋतुएं आती जाती रहेंगी, पर शायद स्थिति जल्दी नहीं बदलनी है। एक तरह से कह सकते हैं कि समय करवट ले रहा है और हम उसकी करवट के बीच में फंस गए हैं। सांस में सांस तब आएगी जब उसकी करवट पूरी हो जाएगी और नई स्थिति में हम अपने लिए काल की खाट पर फिर से जगह बना पाएंगे।

नए कैलेंडर के आने से बहुतेरी संभावनाएं जरूर बनती हुई दिखती हैं, पर वे सब मृग तृष्णा से ज्यादा कुछ नहीं हैं। वही पुराना सूनापन चलता रहेगा। पलों की संभावनाएं चुनौतियों की तपिश में भाप होती रहेंगी। कहीं न कहीं जिंदगी का एक हिस्सा, किसी के लिए बड़ा तो किसी के लिए छोटा हिस्सा, इस करवट के बीच में दब कर दम तोड़ देगा।

2022 की शुरुआत निराशाजनक जरूर है, पर उससे हताश होने की भी जरूरत नहीं है। सब्र और विश्वास से इस प्रताड़ना को सहा जा सकता है। मनुष्य का साहस उसकी सबसे बड़ी पूंजी है। साहस जुटा कर अगर फिर से समय के प्रति सतर्क हो जाएं, तो आने वाले समय में हमारे प्रयासों की बूंदें दुबारा चमक उठेंगी। हम खुल कर जी सकेंगे।

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