सूरज का डूबना

पर आकाश में तुरपे सूरज को मालूम नहीं था कि उसके चढ़ने से नीचे की हवा और धूल आपस में मिल गए थे, जिससे गरम धरातल पर छोटे-छोटे चक्रवात आ गए थे। खामोशी की लंबी सास आंधी की तरह छूटी थी और जमीन की मिट्टी आसमान पर हावी हो गई। उसने सूरज की चौंध पर कालिख पोत दी। सूरज अवाक् रह गया। यह क्या हुआ, उसने किसी से पूछा।

भोर के समय किसी ने सूरज से कह दिया कि तुम्हारा प्रताप अब बढ़ता ही जाएगा। तुम खूब चमकोगे। गोया की क्योंकि तुम उग गए हो, इसलिए अब तुम्हें कोई रोक नहीं सकता है। सूरज मुस्कराया। उसको बात अच्छी लगी। हालांकि वह जानता था कि असंख्य सूर्योदय और सूर्यास्त उससे पहले हो चुके थे, पर इस सुबह का नया सूर्य तो वह था- आज के समय का प्रत्यक्ष कारक, जिसके आगे-पीछे सारी दुनिया को घूमना था। उसको किसी ने यकीन दिलाया था कि वह बढ़ कर मध्याह्न में ही टिक जाएगा। उसका तीसरा और चौथा पहर नहीं आएगा।

वैसे भी समय बदलता रहता है, आज सुबह उसके साथ बदल गया था। नई रीति शुरू हो गई थी। किसी के कहने को नए वक्त का नया सत्य मानकर आज का सूरज आसमान पर चढ़ने लगा। सूर्य ने क्षितिज से थोड़ा उठते ही भोर की धुंध पर नजर घुमाई। पृथ्वी पर जीव-जंतु सुबह की हल्की-सी नमी में दिनचर्या की शुरुआत कर रहे थे। कुछ लोग हल्की-सी चादर शरीर पर डाले हुए काम पर निकल रहे थे। सुहावनी बेला थी। उगते सूरज को देख लोगों ने सर्वप्रथम उसको प्रणाम किया, सूर्यवंदना की, ऊर्जा और स्फूर्ति की कामना की। सूरज को अच्छा लगा। वह और दूर तक अपनी अर्चना को देखना चाहता था, पर धुंध अवरोध पैदा कर रही थी। उसने अपना तेज बढ़ा दिया। धुंध गायब हो गई। सूरज को अपने पराक्रम पर गर्व हुआ।

सूरज के तेज से वातावरण कुछ गरम हो गया। हवा चलने लगी। प्रात: काल में बयार आनंद देती है। वह युवतियों से अठखेलियां भी करती है। कभी बालों में अपनी उंगलियां पिरो कर उनके केश उलझा देती है, तो कभी दुपट्टा झटकने की कोशिश में युवतियों को खिलखिला देती है। बयार शरारती होती है। खेल खिलाती है और खुद भी खेल-खेल में मर्यादाओं को अपने झोंके में बहा ले जाती है। बयार जवानी की शोखी है। वह अल्हड़ है, मस्त है, फिक्र से आजाद है। मनचली है।

सूरज कुछ देर उसका निरीक्षण करता रहा। मर्यादा का मापदंड उसके हाथ में था। पता नहीं किसने, पर किसी ने तो जरूर, मापदंड उसके हाथ में तभी थमाया था। उसने बयार के आगे उसे रख दिया और आस्मां में थोड़ा और चढ़ गया। बयार थम गई। उसकी शोखी सूखने लगी। उसने जल्दी से अपने को समेटा और झोपड़ी में जा छुपी। वक्त की मर्यादा स्थापित कर के सूरज संतुष्ट हुआ।

किसी ने आकर सूरज को उसके प्रताप पर बधाई दी। कहा कि बीते हुए कल का सूरज प्रभावहीन था। सुबह हो या शाम, हवा अपने हिसाब से चलती थी और जीव अपना दामन संभालते हुए दिनचर्या करते थे। हवा पर लगाम लगाना जरूरी था, क्योंकि हवाखोरी की आदत ठीक नहीं थी। वैसे भी हवा सूर्य के प्रताप से जंतुओं का ध्यान हटा देती है। वे सूरज की गर्मी भूल जाते हैं।

सूर्य को उपेक्षित कर देते हैं। किसी ने कहा कि सूरज सिर्फ सूरज नहीं है, बल्कि परम देवता है जिसके ध्यान से संसार जब भी विचलित हो, उसे अपनी ग्रीष्मता दिखला देनी चाहिए। यह दैविक विशेषता है जिसके उपयोग के बिना देव जंतु की गति प्राप्त करते हैं। पिछले वाले सूरज ने ऐसे नहीं किया था, इसलिए वह देव से आम हो गया था। भरी दोपहर में डूब गया था।

सूरज देवता के प्रताप से जीव-जंतु पसीने-पसीने हो गए थे। उनके गले सूख गए थे, थोड़े से श्रम से निढाल थे, पर आसमानी प्रकाश पुंज प्रसन्न था। उसने पहले पहर में ही अपना तेज ऐसा स्थापित कर दिया था कि जंतु हर कुछ क्षण के बाद आकाश की ओर मुंह उठा कर तकते थे। वे आपस में कुछ कहते भी थे, पर किसी ने सूरज को नहीं बताया कि वे क्या बुदबुदा रहे हैं। दूर बैठे सूरज को उनका आंख उठा कर उसको देखना जरूर समझ में आ रहा था- लोग सूर्य शक्ति निहार रहे हैं।

मध्याह्न में सूरज का संपूर्ण शौर्य बरस रहा था। उसके सामने जीव चित हो गए थे। कुछ झोपड़ियों में घुस गए थे, तो कुछ पेड़ के साये में निर्जीव से पड़े थे। किसी ने सूरज से कहा कि उसने सबकी हेकड़ी निकाल दी है। देखिए, सब आप के आगे नतमस्तक हैं। किसी की बात सुन कर सूरज और खिल गया। गर्मी और बढ़ गई। जीव औंधे पड़ गए। देखिए सूर्य देवता, जीव शाष्टांग प्रणाम कर रहे हैं, उसी किसी ने भरपूर प्रसन्नता से कहा। सूरज और चढ़ गया।
पर उसको शाम की चिंता भी थी। उसने बीते हुए सूरजों की यात्रा के बारे में किसी से सुना था। उसने बताया था कि पिछले सूरजों की चौंध कम हो गई थी और इसलिए वे शाम में ढल गए थे। सारा खेल चौंध का है। अगर नया सूरज अपनी चौंध बनाए रखे तो उसकी शाम होने का सवाल ही नहीं पैदा होता है। और हां, थोड़ा चांद को भी समझाना पड़ेगा कि वह उगने की कोशिश न करे। अगर हम ऐसा कर लेते हैं तो आज का सूरज कल का सूरज भी होगा और परसों का भी। कोई नया सूरज फिर आएगा ही नहीं, किसी ने समझाया था।

किसी की बात सूरज को तर्कनिष्ठ लगी। सबसे पहले उसने अपनी बारी की तैयारी करते चांद को धमकाया। तारों को भी आड़े हाथों लिया। जब मैं चमक रहा हूं तो तुम किस खेत की मूली हो? सौर्य ऊर्जा की महत्ता देखो, जीवों पर उसका प्रभाव देखो। हमारा तुम्हारा कोई जोड़ है? बेवजह ही टिमटिमा रहे हो। बंद करो अपना दीया-बाती। अब मैं हूं न, तुम सब जाओ वरना पिघला दूंगा।

पर आकाश में तुरपे सूरज को मालूम नहीं था कि उसके चढ़ने से नीचे की हवा और धूल आपस में मिल गए थे, जिससे गरम धरातल पर छोटे-छोटे चक्रवात आ गए थे। खामोशी की लंबी सास आंधी की तरह छूटी थी और जमीन की मिट्टी आसमान पर हावी हो गई। उसने सूरज की चौंध पर कालिख पोत दी। सूरज अवाक रह गया। यह क्या हुआ, उसने किसी से पूछा। किसी और से पूछो, उसने तड़ाक से कहा और चांद के साथ जा बैठा।
चांद निकलने का वक्त आ गया था और नए सूरज के डूबने का।

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