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अथ बकरी-बैल कथा

एक बात मैं तुम्हें बता दूं- बकरियों को बैल बनाने के आश्वासन पर राज चलता है। मुझे राज करना है। मैं इन्हें बैल बनाता और पेड़ की छांव में बैठा रहूंगा। मेरी बकरियां अगर तुम्हारा पूरा खेत भी चर जाएं, तो मुझ पर कोई फर्क नहीं पड़ता है।

चारों तरफ कोरोना का कहर है। जनता परेशान है, परन्तु प्रभावशाली लोग बेखबर हैं।

दोनों एक गांव में पले-बढ़े थे। साथ स्कूल जाते थे और साथ खेलते थे। एक का नाम राजा था तो दूसरा राजू था। राजा गड़ेरिया था। राजू खेत मजदूर। राजू स्कूल से आने के बाद जमींदार के खेत में जुट जाता था। राजा पेड़ की छांव में बैठ कर घास चरती बकरियों की निगहबानी करता था और राजू से बात करता रहता था। राजू के खेत में उतर कर राजू की मदद करने का खयाल उसको कभी नहीं आया था। वह आराम से छांव में बैठ कर इधर-उधर की लंतरानी हांका करता था। फावड़ा चलाता हुआ राजू हांफते हुए राजा की बात का हूं-हां में जवाब देता था। प्यास लगने पर लोटा लेकर नहर से जल ले आता था। राजा गला तर करने के लिए बकरी के थन से मुंह लगा देता था। बकरी का दूध सेहत के लिए बहुत अच्छा होता है, वह थन से मुंह अलग करके राजू से हर बार कहता था, पर राजू को लोटा भर दूध निकाल लेने की पेशकश कभी नहीं करता था।

जब भी वह राजू को बकरी की तरफ आस भरी नजर लगाए देखता था, तो मुस्करा कर कहता था, ‘काश तू भी गड़ेरिया होता। दूध पीता। तेरी भी बकरियां किसी दूसरे राजू के खेत में मुंह मार आतीं और बढ़िया दूध तुझे देतीं।’ राजा की बात सुन कर राजू चुपचाप खेत से खर-पतवार निकालने के काम में लग जाता था। खेत उसका नहीं था, फसल भी किसी और की थी, पर वह अपनी जिम्मेदारी निभाने में कोताही नहीं बरतता था। राजा राजू की इस आदत पर अक्सर हंसता था।
राजा ने अपनी बातों से बकरियों को इतना प्रभावित कर लिया कि उन्होंने दूर-दूर बसे अपने झुंडों को भी राजा से जोड़ दिया। पेड़ के नीचे बैठा राजा उनसे खूब हांकता था और उनको खूब हांकता था। कभी उनके विशाल झुंड को मौज में बाएं हांक देता था तो कभी दाएं। बकरियों को विश्वास था कि राजा उन्हें किसी बड़े प्रयोजन के अंतर्गत दिशा परिवर्तन करवाता है। उसमें दिव्य दृष्टि है, जिसकी वजह से बकरियों की योनि बदल जाएगी। वे बैल बन जाएंगी। राजा ने उनको समझाया था कि वह अत्यधिक मैं-मैं इसलिए करता है, क्योंकि बकरियों को मैं-मैं न करना पड़े। उनके लिए बैल माफिक नथुने फैलाना ही काफी है। सब बकरियां राजा के कहे अनुसार नथुने फैला कर घूमने लगी थीं और धरती को अपने खुरों से खोदने लगी थीं। उनकी आवाज गायब हो चुकी थी। गूंगी बकरियों के दूध पर राजा फल-फूल रहा था।

दूसरी तरफ, राजू अपने काम में मेहनत से लगा हुआ था। दुबला जरूर होता जा रहा था, पर अपने संकल्प पर अडिग था। राजा की बकरियां उसका खेत चरने के लिए आतुर रहती थीं और उनको भगाते-भगाते वह थक जाता था। राजा से उसने कहा भी कि अपनी बकरियों को खेत से दूर रखे, पर राजा ने हंस के कहा था, ‘यार, बकरियां हैं, मुंह तो मारेंगी ही। मैं क्या कर सकता हूं। तू अपना खेत बचा सकता है तो बचा ले। मुझे बीच में मत ला।’
‘क्यों न लाऊं? इनको तूने जमा किया है। अब इनकी जिम्मेदारी तो ले।’

‘मैं क्यों लू?’ राजा ने एक बकरे की दाढ़ी पर दुलार से हाथ फेरते हुए कंधे उचकाए, ‘ये इस इलाके की बकरियां हैं, इनकी जिम्मेदारी इलाके की है। मुझसे क्या मतलब है? यह खेत तेरा है, इसलिए तू देख क्या करना है। मैं अपनी हांकता हूं, ये सुनती हैं। अपने थन भेंट करती हैं। मैं भेंट स्वीकार कर लेता हूं। बाकी वे जानें, तुम जानो और तुम्हारा काम।’

राजा को अपनी दलील सुन कर खुद मौज आ जाती थी। अपनी बुद्धि पर इतराने की इच्छा दिल में मचल उठती थी। तब वह दो बकरों को बुलाता था और दोनों हाथों से उनकी दाढ़ी सहलाने लगता था। राजू हताश होकर खेत में पानी लगाने के लिए चला जाता था। उसको मालूम था कि पौध निकलते ही चर ली जाएगी, पर बीज डालना, पानी लगाना, निराई करना और खेत की सुरक्षा करना उसका कर्त्तव्य था। राजा की बकरियों की वजह से वह उससे नहीं हट सकता था। राजा उसकी परेशानी पर पेड़ के नीचे बैठा हंसता था। थन चूसते हुए भी वह कनखियों से राजू को देखता था। राजू का दुख राजा को सुख देता था।

बकरियों की संख्या रोज बढ़ती जा रही थी। उनकी भीड़ इतनी हो गई थी कि कुछ राजा की गोदी में घुस जाती थीं, कुछ कंधों पर चढ़ जाती थीं और कुछ तो सिर पर चढ़ कर खुर पटकने लगती थीं। वह परेशान हो जाता था और बकरियों का ध्यान बंटाने के लिए और लंबी-लंबी हांकने लगता था। सिर से उतर कर कुछ देर वे हांक पर ध्यान देती थीं, पर फिर चढ़ जाती थीं। राजा का हांकते-हांकते दम फूल जाता था, पर वह मजबूर था। जैसे भी गला गीला करने के लिए थन में मुंह लगाता था, दो-चार बकरियां उसके कंधों को खुरों से खरोंच देती थीं। कई बकरियां अब राजा से सवाल भी करने लगी थीं कि नथुने फैलाने के बावजूद हम अभी तक बैल क्यों नहीं बनी हैं? राजा इस सवाल के जवाब में और हांकने में जुट जाता था। वह नई-नई कहानियां बनाता था, जिससे बकरियां बैल बनना कुछ देर के लिए भूल जाएं और वह उनका दूध पीकर आराम कर ले।

राजू दूर से राजा की हालत देखता था। दोस्त के लिए उसके मन में प्रेम था और सहानुभूति भी। एक दिन उसने राजा से कहा कि खूब दूध पी लिया है तुमने, अब क्यों यह जिल्लत उठा रहे हो। बकरियों से हट लो। उन्हें बता दो कि बैल वाली बात जुमला थी। बकरी बैल नहीं बन सकती है। और फिर तुम अपने गड़ेरिया वाले काम पर वापस आ जाओ। उसमें मेहनत करोगे तो तुम्हें झूठ-फरेब की जिल्लत नहीं उठानी पड़ेगी। बकरियों को गुमराह करने से क्या फायदा? उनका जीवन तुम नरक कर रहे हो। गड़ेरिए का धर्म निभाओ। यह एक सुर में हांकना छोड़ो।’

राजा ने अट्टहास किया, ‘मैं राजा गड़ेरिया था, अब राजा राजा हूं।’ उसने गर्व से छाती पीटी, ‘मेरा स्वभाव गड़ेरिए वाला नहीं, राजा वाला है। राजा का धर्म अपना राज कायम रखना है। मैं कुछ खुरों की चोट से विचलित नहीं हो सकता हूं। वैसे राजनीति की एक बात मैं तुम्हें बता दूं- बकरियों को बैल बनाने के आश्वासन पर राज चलता है। मुझे राज करना है। मैं इन्हें बैल बनाता और पेड़ की छांव में बैठा रहूंगा। मेरी बकरियां अगर तुम्हारा पूरा खेत भी चर जाएं, तो मुझ पर कोई फर्क नहीं पड़ता है।’

‘अगर यह अनाज चर गईं तो तुम खाओगे क्या?’
‘हवा’, राजा ने तपाक से कहा, ‘राजा का राज हवा पर चलता है। जब तक हवा ठीक है, राजा राजा बना रहेगा।’

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