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बरास्ते राग दरबारी

स्थिति यह है कि पीड़ित, प्रताड़ित, शोषित और अपमानित व्यक्ति को संरक्षण और न्याय पाने के विधिक रास्ते तो अनेक हैं, मगर व्यवहार में इतने भंवर एकत्रित हैं कि उनसे पार पाने के प्रयत्नों का हश्र हर कोई देख या अनुभव कर चुका है।

कोरोना काल में सुरक्षा और संरक्षा की भावना विकसित करना बहुत जरूरी था, लेकिन इसकी स्वेच्छाचारिता विकसित हुई। (फोटो- पीटीआई फाइल)

श्रीलाल शुक्ल ने अपने उपन्यास ‘राग दरबारी’ में भारत के ग्रामीण जीवन का अद्भुत, मर्मस्पर्शी, सटीक, सहज और सार्थक वर्णन किया है। यह उपन्यास आजादी के करीब पंद्रह-सोलह वर्ष बाद लिखा गया था। उतने समय में ही विकास, प्रगति, समता, समानता, जनता, अधिकारी, योजना, कोआपरेटिव, कचहरी, जांच, पुलिस, सुविधा शुल्क, थाना जैसे शब्द गांव-कस्बे तक हर रहवासी के जीवन के इर्द-गिर्द घूमने लगे थे। सबकी अपनी-अपनी समझ थी, अनुभव थे, समझने की ललक थी। कमाई, शोषण, दबंगई के नए-नए रास्ते खोज लिए गए थे। जमीनी स्तर पर प्रजातंत्र की व्यावहारिक व्याख्या कर लोग उसके प्रयोग में प्रवीणता प्राप्त कर चुके थे। यह सतत प्रक्रिया है, आज भी अपने समसामयिक स्वरूप में जारी है। कोरोना के घोर संकट के समय; ठीक पचास साल बाद राग दरबारी फिर से प्रासंगिक हो उठा है।

हर तरफ और हर स्तर पर कोरोना के बाद के परिवर्तनों पर चर्चा हो रही है, इसका विस्तार गांव से लेकर डब्ल्यूएचओ तक ही नहीं, बहुराष्ट्रीय कंपनियों के उन बोर्ड रूम तक पहुंच चुका है, जहां ऐसे निर्णय लिए जाते हैं, जो क्रेमलिन और वाइटहाउस को भी मानने पड़ते हैं। यह धारणा समय के साथ अत्यंत दृढ़ होती जा रही है कि यहीं तो विश्व को बाजार मान कर भावी नीतियां निर्धारित की जाती हैं, जिन्हें सरकारों और सत्तासीनों को अपना स्वतंत्र निर्णय घोषित कर लागू करना पड़ता है। इस समय यही वर्ग कोरोना के टीके को पेटेंट और लाइसेंस से मुक्त करने की भारत और दक्षिण अफ्रीका द्वारा उठाई गई मांग को लेकर चिंतित है। इसमें एक दिन की देरी भी हजारों लोगों की जान लेती है, मगर विचार-विमर्श चल रहा है, बैठकें हो रही हैं, कौन जाने तीसरी लहर कितनी मारक हो, और टीके की देरी कितनों के जीवन पर भारी पड़े!

आज भी भारत में परंपरागत ढंग से चलने वाली दुकानों पर ‘शुभ लाभ’ सम्मान पूर्वक लिखा रहता है। प्रगति ने वैश्विक बाजार में शुभ लाभ को विस्थापित कर उसे केवल लाभांश में बदल दिया है। वैसे अब शुभ लाभ और लाभांश के अंतर को अगर कोई समझ भी ले, तो कोई अंतर नहीं पड़ने वाला है। अंतरराष्ट्रीय कंपनियों की प्राथमिकता सदा लाभांश रही है, वही आगे भी बनी रहेगी, भले लोगों को टीके मिलें या न मिलें। टीका भी तो व्यापार का अंश है, इजराइल तीन गुने मूल्य पर खरीद लेता है, जो ऐसा नहीं कर सकते, वे प्रतीक्षा करें!
भारत में दूसरी लहर में स्वास्थ्य और प्रशासनिक व्यवस्था चरमरा गई, विश्व स्वास्थ्य संगठन भी असमंजस में रहा! लालफीताशाही केवल भारत की तहसील, ब्लॉक या जिले की कलेक्टरी तक सीमित नहीं है।

वह संयुक्त राष्ट्र तक अपना दखल और शानो-शौकत बनाए हुए है। कोरोना के टीके को लेकर विश्व में जो लेन-देन इतने ऊंचे स्तर पर हो रही है, उसमें राग दरबारी का क्या संदर्भ हो सकता है, जो उत्तर प्रदेश के एक गांव पर ही पूरी तरह केंद्रित है! उसमें एक मामूली पात्र है, जिसका एक पैर कटा हुआ है, लाठी लेकर चलता है, जिसका नाम लंगड़ है। उसका परिचय वैद्य जी की बैठक पर उन्हीं के शब्दों में होता है: ‘भाई तुम धर्म की लड़ाई लड़ रहे हो, लड़ते जाओ। उसमें मैं क्या सहायता कर सकता हूं!’

लंगड़ को तहसील से एक दस्तावेज की नकल लेनी है। उसने कसम खाई है कि मैं रिश्वत नहीं दूंगा और कायदे से ही नकल लूंगा। उधर नकल बाबू ने कसम खाई है कि मैं रिश्वत नहीं लूंगा और कायदे से ही नकल दूंगा। इसी की लड़ाई चल रही है। परिणाम अपेक्षित ही रहा, लंगड़ आता रहा, जाता रहा, सरकारी बाबू हर बार अगली तारीख देता रहा! कोई न कोई त्रुटि रह ही जाती, कभी उसे लगता कि बस अब मिलने ही वाली है, मगर नकल मिली नहीं। हर बार कोई न कोई उसे समझाता कि पैसे दे दो, मगर वह डिगा नहीं। हर बार यही कहता था- ‘यह सिद्धांत की बात है बाबू, तुम नहीं समझोगे।’ उपन्यास के अंत में लंगड़ बीमार होकर सत्रह दिन बिस्तर पर रहता है, फिर दफ्तर जाने पर मालूम पड़ता है कि पंद्रह दिन नकल तैयार रखी रही, सूचना पट्ट पर सूचना दे दी गई थी, वह नहीं आया, अत: नियमानुसार फाड़ कर फेंक दी गई। बात सिद्धांत की थी, लंगड़ को स्वीकार करने में कोई हिचक नहीं हुई! नकल तो उसके जबरन हथियाए गए खेत के मुकदमे के लिए चाहिए थी। अब तो एक ही रास्ता है, फिर से नकल मांगने की दरख्वास्त लगा दी जाए।

लंगड़ समाज के लगातार बढ़ते उस वर्ग का प्रतिनिधित्व करता है, जिसके उद्धार के लिए सारा तंत्र आज भी लगा हुआ है! गांव का किसान, शहर का मजदूर, रिक्शेवाला, खोमचेवाला, बड़ी-बड़ी अट्टालिकाओं के निर्माण में हाड़तोड़ मेहनत करने वाला। तंत्र का छोटे से छोटा अधिकारी भी इनकी हंसी उड़ाने तक ही सीमित नहीं रहता, इनके हर प्रकार के शोषण का अधिकार वह स्वत: ही- परंपरागत मान कर- ग्रहण कर लेता है। पंक्ति के अंतिम छोर पर खड़े आदमी को शोषण के साथ-साथ जिस अपमान का सामना करना पड़ता है, वह गांधीजी के उस पत्रांश की याद दिलाता है, जो उन्होंने 1922 में लिखा था : स्वराज आने पर चार चीजें मेरे लोगों पर भारी पड़ेंगी- चुनावों के दोष, अन्याय, प्रशासन का बोझ और अमीरों के कपट!

यह प्रशासन अब इतना विस्तार पा गया है कि असहनीय हो गया है। बाकी तीनों पर भी उनकी आशंकाएं शब्दश: सही निकली हैं। स्थिति यह है कि पीड़ित, प्रताड़ित, शोषित और अपमानित व्यक्ति को संरक्षण और न्याय पाने के विधिक रास्ते तो अनेक हैं, मगर व्यवहार में इतने भंवर एकत्रित हैं कि उनसे पार पाने के प्रयत्नों का हश्र हर कोई देख या अनुभव कर चुका है। इसके बाद भी अगर कोई साहस और प्रयास करता है तो उसे हर स्तर पर अपने प्रति दुराव ही हासिल होता है।

छतीसगढ़ में एक किशोर अपनी दादी कि दवाई लेने निकलता है, डॉक्टर का पर्चा उसके पास है, मगर जिलाधीश महोदय को यह कोरोना नियमों का उल्लंघन लगता है। वे उसे थप्पड़ मारते हैं, उसका मोबाइल और पर्चा फेंक देते हैं, एक अनुचर को इंगित करते हैं, वह पूर्ण आज्ञाकारिता से उस किशोर को कुछ लाठियां लगा देता है। अगले दिन मुख्यमंत्री ने संज्ञान लिया, कलेक्टर को सचिवालय भेज दिया, बच्चे को मोबाइल देने का निर्देश दिया।

आमतौर पर ऐसे मामलों में कुछ भी नहीं होता हैं। पर सवाल केवल कुछ मामलों का नहीं है। जिस प्रजातंत्र में जनता का पग-पग पर अपमान होता हो, उसमें स्वतंत्रता, संविधान और मानवधिकारों का अर्थ क्या रह जाता है?

कोरोना काल में हमने पुलिस द्वारा जनता पर लाठियां भांजते हुए कितने ही दृश्य देखे हैं। पिछले दो-तीन दशकों में सबसे आधिक लाठियां संभवत: उन अध्यापकों ने खाई हैं, जो थोड़े से मानदेय पर अनियतकालीन नियुक्ति पर राज्यों में कार्यरत हैं। प्रशासन जब चाहे उन्हें स्कूल से निकाल कर चुनाव, जनगणना, दवा वितरण या किसी अन्य अशैक्षणिक कार्य में लगा दे, बच्चों और उनके समय की चिंता कोई क्यों करे?

समाज में हर किसी को याद रखना होगा कि एक मछली सारे जलाशय को अनुपयोगी बना सकती है। जहां इनकी उपस्थिति हर ओर हो- कालाबाजारी, मुनाफाखोरी, भ्रष्टाचार, नकली दवाइयां और भी बहुत कुछ- वहां हर नागरिक को अपने कर्तव्यबोध पर गहन विचार करना आवश्यक होगा।

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