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संवाद से शक्ति

स्कूली बच्चों से राजनेताओं की भेंट एक सामान्य बात रही है। ऐसी भेंटें तस्वीरों, दुलार-प्यार तक सीमित रही हैं। ऐसे मौकों पर बच्चों से बातचीत साधारणतया उदेशात्मक होती है। उन्हें सपने दिखाना, उनके सपनों को समृद्ध करना, उन्हें कर्त्तव्य का ज्ञान कराना ही अनौपचारिक या औपचारिक भेंटों में विषय-वस्तु रहता है।

संवाद से शक्ति

राकेश सिन्हा

बच्चों की पहचान परीक्षा में प्राप्त अंक या कक्षा में मिली सफलता बन जाती है। और यह उनके बीच अनेक स्तरों पर विभाजन पैदा करता है। ये विभाजन श्रेणियों में प्रकट होते हैं। प्रतिभावान और पढ़ाई में पिछड़े छात्रों की दो श्रेणियों के अतिरिक्त मानसिक विभाजन भी स्पष्ट दिखाई पड़ता है।

यही कारण है कि स्कूली बच्चों में मानसिक तनाव, बीमारियां और यहां तक कि आत्महत्या की घटनाएं दुनिया के प्राय: सभी देखों में कमोबेश हो रही हैं। ऐसी समस्या सिर्फ बच्चों तक सीमित नहीं रहती है। अभिभावक भी तनाव से गुजरते हैं। उनकी समस्या बच्चों को अपने सपने की परिधि में समेटना और उसी के अनुकूल उन्हें ढालने की रहती है।

जिस अनुपात में उन्हें इस कार्य में असफलता मिलती है उसी अनुपात में उनका अपना व्यक्तित्व भी प्रभावित होता है। इस प्रक्रिया में शिक्षकों के समक्ष न सिर्फ बच्चों को अच्छे अंकों की पात्रता गढ़ने की होती है, बल्कि अभिभावकों का भी सामना करना पड़ता है। यह त्रिकोण सुलझने की जगह जटिलता की ओर बढ़ता जा रहा है।

इन समस्याओं पर कुछ वर्षों पहले तक वैश्विक स्तर पर शोध और अध्ययन पर आधारित लगभग दो हजार शोध-पत्र प्रकाशित हो चुके हैं। ब्रिटेन में तेरह वर्ष से उन्नीस वर्ष के बीच एक लाख नब्बे हजार बच्चों की भागीदारी काउंसिलिंग या उन पर सर्व में 2017 में रही।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक अध्ययन के अनुसार मानसिक तनाव का औसत सैंतीस फीसद है, तो आस्ट्रेलिया में बढ़ कर सैंतालीस फीसद तक पहुंचता है। संयुक्त राज्य अमेरिका में सत्रह वर्ष की उम्र से नीचे के बच्चों में आत्महत्या की दर में 2016 से 2019 के बीच बासठ प्रतिशत की वृद्धि देखी गई है, जबकि 1995 से 2015 के बीच इसमें बयालीस फीसद वृद्धि हुई थी। भारत में 1995 से 2020 के बीच पौने दो लाख बच्चों ने आत्महत्या की, जिसमें स्कूल, महाविद्यालय के छात्र और शोधार्थी शामिल हैं।

इस संदर्भ में प्रधानमंत्री द्वारा ‘परीक्षा पे चर्चा’ का महत्त्व और उसकी उपयोगिता दिनोंदिन बढ़ती जा रही है। प्रधानमंत्री ने 2018 में स्कूली परीक्षार्थी बच्चों से खुल कर चर्चा शुरू की, जो एक वार्षिक कार्यक्रम बन गया है। यह चर्चा रोचक, जीवंत और उपयोगी इसलिए है कि उपदेशात्मक नहीं है। प्रधानमंत्री का वैशिष्टय है कि वे जिन लोगों से मुखातिब होते हैं, उनके अनुकूल न सिर्फ खुद को ढालते हैं, बल्कि उनकी संवाद की विषय-वस्तु और शैली भी सहज रूप से उसी के अनुकूल हो जाती है। यही बात ‘परीक्षा पे चर्चा’ को मौलिक और बच्चों के मनोनुकूल बना देता है। बच्चों का खुल कर बोलना, उनकी बातों में परेशानियों, वेदना, उत्साह का प्रकटीकरण इस कार्यक्रम की खासियत है।

देश के प्रधानमंत्री द्वारा बच्चों के साथ इस तरह का संवाद कई आयामों को अभिव्यक्त करता है। अभी तक बच्चे स्कूल और घर के अनुशासन के हिस्से रहे हैं। प्रधानमंत्री ने उन्हें गणतंत्र से जोड़ कर और उन्हें विमर्श का सक्रिय और मुख्य हिस्सा बना कर एक नई पहचान दी है। राज्य एक शुद्ध राजनीतिक संस्था होने के कारण लोगों को मत देने की आयु के बाद उन्हें पहचानता है।

बच्चों को गैर-चिंतन श्रेणी और गैर-भागीदारी की श्रेणी का हिस्सा माना जाता रहा है। राज्य के मुखिया के रूप में प्रधानमंत्री ने इसका सीमोल्लंघन कर स्कूली बच्चों के मन, मानसिक संरचना, राय और इच्छाओं को गणतांत्रिक वैधानिकता दी है। स्कूली बच्चे राजनीतिज्ञ से अपने दायरे, अपनी रुचि और अपनी समस्याओं के साथ मुखातिब होते हैं। ‘आज का बच्चा कल का नागरिक’ का मुहावरा इस कार्यक्रम की बुनियाद है।

परीक्षा से पूर्व और बाद में बच्चों की परेशानियों, अभिभावकों की मानसिकता और शिक्षकों की क्षमता का सार्वजनिक तौर पर अभिव्यक्तिकरण बच्चों को परिवार तथा स्कूल की लक्ष्मण रेखा से बाहर सामाजिक-सांस्कृतिक विमर्श का अंग बनाता है।

परीक्षा का अपना महत्त्व है, पर यह वात्सल्य, बचपना और बच्चों की मौलिकता को रौंदने वाला नहीं होना चाहिए। ‘परीक्षा पे चर्चा’ उसे खुलापन देने और अभिभावकों और शिक्षकों को व्यापकता के दायरे में सोचने के लिए एक रास्ता खोलता है। ‘परीक्षा पे चर्चा’ कार्यक्रम समाजीकरण और इसमें व्यापक भागीदारी, शोधकर्ताओं और शिक्षा नीति निर्माताओं को शिक्षा, परीक्षा, परिणामों में सूक्ष्म और स्थूल दोनों प्रकार के सुधार के लिए अवसर भी देता है।

सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि बच्चों में आत्मविश्वास का सृजन होता है। प्रधानमंत्री ने सफल और सार्थक जीवन के प्रकारों, प्रकृति और प्रवृत्तियों को ‘परीक्षा-योद्धा’ पुस्तक में दिखाया है। इस क्रम में जनप्रतिनिधियों का स्थानीय स्तरों पर बच्चों के साथ तनाव, उत्साह और परीक्षा के अन्य आयामों से जुड़े विषयों पर कला और चित्रांकन प्रतियोगिता कराना ‘परीक्षा पे चर्चा’ का विस्तार है।

पश्चिम के विकसित देशों में परीक्षा से उत्पन्न मानसिक बीमारियां और तनाव एक बड़ी समस्या के रूप में उपस्थित हैं और वे गैर-सरकारी स्वयंसेवी संस्थाओं की मदद से इसके निदान खोज रहे हैं।

इस संदर्भ में प्रधानमंत्री की पहल न सिर्फ अनूठी है, बल्कि समस्या की जड़ तक पहुंचने का रास्ता भी है। इस ‘परीक्षा पे चर्चा’ कार्यक्रम का एक और लोकतांत्रिक लाभ है। बच्चों की राजनीतिज्ञों से दूरी और राजनीति के प्रति अनास्था का भाव सर्वविदित है। आयु के साथ-साथ राजनीतिक वातावरण भी इसके लिए जिम्मेदार है।

‘परीक्षा पे चर्चा’ राजनीति के सामाजिक और सांस्कृतिक पक्ष को प्रगतिशील तरीके से परोसता है। इससे बच्चों को न सिर्फ पहचान मिलती है, बल्कि वे चिंतनशील वर्ग के रूप में उभर कर भारतीय गणतंत्र के प्रमुख हिस्सेदार बन कर सामने आ रहे हैं।
(लेखक भाजपा के राज्यसभा सांसद हैं)

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First published on: 22-01-2023 at 05:25:00 am
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