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जिंदगी की तस्वीर

मैंने कहा- ‘पर देखो, माली बहुत सारे फूलों को बेवक्त तोड़ कर लिए जा रहा है। उसको रोको।’ उसने कहा- ‘बहुत सारे उसकी पहुंच के बाहर भी तो हैं। वे खिले रहेंगे, बगीचे को खुशनुमा बनाए रहेंगे। प्रकृति से कोई माली नहीं जीत सकता है।

जिंदगी का सफर भी कितना अजीब है। फूलों में सुख है और सुख में ही दुख है। (फोटो- Unslplash.com)

वह देखो, मेरी मां जा रही है। एक फोटो ले लो, लड़के ने छायाकार का हाथ जोर से पकड़ कर अपनी तरफ खींचा। छायाकार लड़के के कातर भाव से एक क्षण के लिए विचलित हो उठा था। भोपाल के श्मशान घाट में दूर तक जलती चिताओं की तस्वीरें लेते हुए उसका मन वैसे भी परेशान था। कोरोना का तांडव अपने सबसे भयावह रूप में उसके सामने प्रस्तुत था।

छायाकार ने दिलासा देने के लिए सहानभूति से लड़के के कंधे पर हाथ रखा। लड़के ने रुंधी हुई आवाज में फिर दरख्वास्त की, मां जा रही है… फोटो ले लीजिए न, प्लीज। उसने श्मशान के कोने से एक ऊंची चिमनी से उठते हुए काले धुएं की तरफ इशारा किया था। विद्युत शवदाह गृह से गहरा काला धुआं आसमान की तरफ अपनी अंगुलियों से चित्र उकेरते हुए तेजी से उठ रहा था। छायाकार ने धुएं की तस्वीर उतार ली। लड़का बिलख पड़ा था।

मैं नहीं जानता कि वह लड़का कौन था, पर उसका दर्द मेरे सीने में अंदर तक पैठ गया है। हर तरफ लोग अपनी बेबसी पर बिलख रहे हैं। जो कल थे, वे आज नहीं हैं। ऐसे जा रहे हैं जैसे कोई उनको धकेल रहा है, बलपूर्वक श्मशान की तरफ हांक रहा है। शायद ही कोई ऐसा परिवार बचा है, जिसमें मौत न हुई हो या फिर इस महामारी में बीमार न हुआ हो। साथ ही जान बचाने के सभी साधन खत्म हो गए हैं- न दवा है, न आॅक्सीजन है और न अस्पताल में भर्ती होने की सुलभ व्यवस्था है। हर व्यक्ति भयभीत है। उसके दरवाजे पर कोरोनारूपी काल कभी भी दस्तक दे सकता है।

अशांत मन लिए मैं पार्क की बेंच पर जा बैठा था। खुली हवा और कोयल की कूक मुझे घर से बाहर खींच लाई थी। बहुत से पौधों पर नए फूल खिल रहे थे- लाल, गुलाबी, सफेद, पीले रंग की छटा वे अपने दायरे में बिखेर रहे थे। पास से देखा तो सभी मुस्करा भी रहे थे। शायद उन्हें मालूम था कि उनका जीवन क्षणभंगुर है। वे आज कली से फूल बने हैं और कल मुरझा कर गिर जाएंगे, जिस मिट्टी से निकले हैं, उसी में फना हो जाएंगे। पर वे सहमे हुए नहीं थे। अपने दिए हुए वक्त की गर्माहट को जज्ब करके अपनी छटा फिजाओं पर निसार कर रहे थे। वे सुबह की धूप और रात की चांदनी को अपने में भरपूर समेट रहे थे। दो पल जीने का सोलह शृंगार किए हुए गीली बयार में झूम रहे थे।

वह आकर मेरे पास बैठ गई। ‘फूल सुंदर हैं न!’ उसने मुस्करा कर कहा।
‘हां, बहुत सुंदर है। नजर नहीं हट रही है!’ मैंने कहा।
‘बिल्कुल आपकी तरह!’ वह तपाक से बोली।
मैं झेप गया था- ‘मैं कहां सुंदर हूं?’

‘क्यों नहीं हैं आप? फूलों और आपमें क्या फर्क है? अगर वे सुंदर हैं तो आप भी हैं।’ उसने कहा और खिलखिला कर हंस पड़ी।
‘हंस क्यों रही हो?’ मैंने तर्क के लहजे में पूछा।
‘आप पर नहीं हंस रही हूं। खुशमिजाज हूं, इसलिए चाहते, न चाहते हुए भी मेरी हंसी फूट पड़ती है। पर अगर आप देखें तो आप सुंदर हैं, पर आप देख नहीं रहे हैं।’

‘क्या देखूं? हर तरफ त्राहि-त्राहि मची हुई है। नहीं मालूम कौन आज है और कल नहीं होगा। उफ्फ, यह दुख बर्दाश्त से बाहर है।’
वह एक पल के लिए मुझे ताकती रही और फिर बोली- ‘पर जब आप बाहर आए तो फूलों में उलझ गए। अच्छा बताइए, आपकी तेरहवीं मंजिल वाले फ्लैट से क्या ये फूल आपको दिखते हैं?’

मैंने कहा- ‘नहीं। दूर से सिर्फ झाड़ नजर आते हैं।’ उसने धीरे से कहा- ‘फूल देखने के लिए झाड़ों से नजदीकियां बनानी पड़ती हैं। और जो फूल आज आप देख कर जाएंगे, वह क्या आपको कल मिलेगा?’
मैंने एक लंबी सांस ली। उदास निगाह से फिर अपने सामने खिले हुए चेहरों को देखा। हां, यह सच था कि मैं फूलों से जुड़ा हुआ था पर किसी एक फूल से नहीं। और उनसे ज्यादा उस तरु से जुड़ा था, जिस पर ये फूल जगमगा रहे थे। वह पेड़ मेरे लिए ज्यादा जरूरी था जो हर बार मौसम आते ही बहुत सारे फूल खिला देता था।

मैं अपने विचारो में खो गया था। उसने धीरे से मेरा हाथ दबाया और मुस्करा कर कहा- ‘इसमें इतना सोचने की क्या बात है। हर पेड़ अलग-अलग तरह के फूल न्योछावर करता है। और हर फूल अलग है। ठीक वैसे ही, जैसे हम और आप अलग-अलग हैं। वे अपनी तरह से सुंदर भी हैं। कुछ में खुशबू होती है, कुछ में नहीं। पर हरेक की क्रिया एक ही है- वे खुद कुछ देर बाद मुरझा जाते हैं, पर बीज छोड़ जाते हैं, जिसमें एक पूरा पेड़ समाया हुआ होता है। फूल पेड़ों के जनक हैं। वे सुख देते हैं और जाने से पहले एक नया जीवन छोड़ जाते हैं। फूल वास्तव में कितने सुंदर होते है!’ उसने आह भरी और फिर हंस दी।

मैंने कहा- ‘पर देखो, माली बहुत सारे फूलों को बेवक्त तोड़ कर लिए जा रहा है। उसको रोको।’ उसने कहा- ‘बहुत सारे उसकी पहुंच के बाहर भी तो हैं। वे खिले रहेंगे, बगीचे को खुशनुमा बनाए रहेंगे। प्रकृति से कोई माली नहीं जीत सकता है। आज आप फूलों को पास से देख रहे हैं, इसलिए एक-एक पर रंज कर रहे हैं। पर कल तक तो ये सब आप दूर से देखते थे। जिंदगी को भी हम हमेशा दूर से ही देखते आए हैं। आज आमना-सामना हुआ है तो हम हड़बड़ा गए हैं।’

मैं उसकी तरफ देर तक एकटक देखता रहा। उसने मेरे उलझे हुए बालों को संवारा। ‘यह फूल बहुत खुशबूदार है। इसकी फोटो ले लीजिए!’ उसने धीरे से इल्तिजा की। मैंने चौंक कर पूछा- ‘खुशबू की फोटो?’

‘हां, उस काले धुएं की तरह, जिसमें लिपट कर एक मां अहसास की तरह हर तरफ फैल गयी थी। मां मुरझा कर गिर गई थी, पर उसका बीज तरु बन चुका था। काले धुएं की फोटो में उसकी मौजूदगी का सबूत था, मां की खुशबू का अहसास था। फोटो लेना उस लड़के के लिए बहुत जरूरी था। लोग मर जाते हैं, पर उनके प्रति भाव कभी नहीं मरते हैं। वे फोटो की तरह हमेशा हमारे साथ रहते हैं।
वह उठ कर खड़ी हो गई और कहा- ‘अच्छा, मैं चलती हूं।’
मैंने कहा- ‘अपना नाम नहीं बताओगी?’
‘क्यों नहीं बताऊंगी?’ वह खिलखिला कर हंस पड़ी- ‘मैं जिंदगी हूं।’

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