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बकबक का नशा

भगौने का भविष्य तय हो गया था। बेसुर बकबक का नशा परोसने की भट्टी उसकी जीभ में जन्मजात लगी हई थी। उसको भड़काते रहना था। उसके पास राजनीति का देवता बनने के लिए डेढ़ गज की जुबान थी, जो और सारे भगौनों को लबालब कर सकती थी।

बोलना अच्छा होता है, लेकिन बहुत बोलना कभी-कभी मुसीबत बन जाता है। (प्रतीकात्मक फोटो- इंडियन एक्सप्रेस)

माता-पिता पूत के पांव पालने में ही पहचान गए थे, इसलिए उसका नाम भगौना रख दिया था। जब वह रोना शुरू करता था, तो दादी खीज कर कह उठती थीं- ‘अरे, रो-रो कर घर-घर के भगौने भर देगा क्या?’ आते-जाते रिश्तेदार भी मजाक में पूछ लेते थे कि क्या सब भगौने भर गए, जो घर में सन्नाटा है आज? बच्चा प्यारा-सा था, साथ में उसकी अथक रोने की खूबी भी थी, इसलिए दुलार में उसको घरवाले भगौना बुलाने लगे थे।

कुछ अरसे बाद जब उसने बोलना शुरू किया तो वह ऐसा बोला की चुप कराना नामुमकिन हो गया था। भगौना भरने वाली प्रवृत्ति खत्म नहीं हुई थी, बल्कि मजबूत हो गई थी। स्कूल में जब नाम लिखाने का मौका आया, तो उसके पिताजी ने नाम को लेकर मगजमारी नहीं की थी। ‘इसका नाम भगौना दास लिख दो’, उन्होंने कहा था। स्कूल के लिपिक ने नाम सुन कर बांई भौं प्रश्नचिह्न की तरह उठाई थी, पर तब तक बच्चे ने बोलना शुरू कर दिया था। आधे-एक मिनट उसने नए विद्यार्थी की धराप्रवाह वाक् प्रतिभा का मूल्यांकन किया था और फिर जल्दी से उसका नाम अपने रजिस्टर में लिख लिया था। भगौना दास जो रायता फैला रहा था उसको समेटना उसके वश के बाहर था। नाम लिख कर उसने बड़े प्यार से कहा था, ‘बेटा, अपनी तशरीफ का भगौना अब क्लास में ले जा कर रखिए।’ उसने जानबूझ कर नए विद्यार्थी को उस अध्यापक की कक्षा में भेजा था, जिससे उसकी पुरानी रंजिश थी। अब अध्यापक से उसका हिसाब बराबर हो गया था। भगौना उसे खूब चाटेगा।

भगौना दास इस बात से अनजान थे कि लोग उनकी बकबक से परेशान हो जाते थे। जब वे बोलना शुरू करते थे तो अपने में ही मस्त हो जाते थे। सामने बैठे व्यक्ति की उबासियां उन तक नहीं पहुंचती थीं। अपनी जुबान का जायका उनको इस कदर पसंद था कि चटखारे ले ले कर वे बातों के पत्तलों का कूड़ा हर तरफ फैला देने से बाज नहीं आते थे। सुबह से देर रात तक भगौना दास खनकते थे। कई लोग तो यहां तक कहते थे कि वे नींद में भी बड़बड़ाते थे। ‘मित्रो’, वे स्कूल कैंटीन में अक्सर कहते थे, ‘मेरे पास कहने को बहुत कुछ है, इसलिए मेरी जीभ चलती रहती है। इसका मेरे दिमाग से सीधा कनेक्शन है। मुझे आपकी तरह बोलने से पहले सोचने की जरूरत नहीं है। मैं सोचता नहीं हूं, क्योंकि मेरी सोच मेरी जुबान में है। मुझे ऊपरवाले गोडाउन में जाने की जरूरत नहीं है, क्योंकि प्राकृतिक रूप से मेरी जीभ पर मेरा दिमाग खिसक आया है। मैं जीभजीवी हूं।’

कुछ लड़के उनकी बातों से प्रभावित हो जाते थे। भगौना दास ऐसे समर्थकों का बड़ा सम्मान करते थे। ‘तुम लोग मेरी प्राणवायु हो’, वे उनकी पीठ थपथपातेहुए कहते थे, ‘मेरी बातें सुनने में जो तुमने शौर्य प्रदर्शित किया है वह पिछले कई सौ सालों में असंख्य नस्लों ने नहीं किया है। तुमने मेरी बातें सुन कर जो मुझे हवा में महल-दर-महल बनाने की हिम्मत दी है वैसा मेरे प्यारे मित्रों हजारों सालों में पहली बार हुआ है। हर रोज जब तुम मेरे सामने बैठते हो तो क्या तुम सिर्फ कैंटीन की टूटी हुई कुर्सी पर बैठते हो? नहीं। हर रोज तुम मेरी बातों के एक नए महल में आसीन होते हो। याद करो, जब तुम घर जाते हो तो तुम्हे ऐसा नहीं लगता जैसे तुम टूटी कुर्सी से उठ कर नहीं आए हो, बल्कि तख्तेताउस की चमक से रुबरु होकर आए हो? मेरे उवाच वे ईंट-गारा हैं जिनसे हमारे स्कूल की नई इमारत तैयार हो रही है।’
अक्सर जब वे यह कह रहे होते थे तो कोई नामाकूल बेरुखी से कुर्सी खिसका उठ पड़ता था।
‘कहां जा रहे हो?’ वे हड़बड़ा कर पूछते थे।
‘मेरा भगौना भर गया है। सिर पर लाद कर घर जा रहा हूं। इसमें से कुछ प्रसाद रास्ते में भिखारियों को बांटता जाऊंगा।’
भगौना दास बात सुन कर प्रसन्न हो जाते थे। व्यंग पहचानने की बुद्धि उनकी जुबान में नहीं थी। उनको लगता था कि मित्र उनकी जुबानी हरकत से इतने प्रभावित थे कि दूर-दूर तक उनका प्रचार और प्रसार करने का संकल्प ले चुके थे। उनकी जुबान पर अपने बारे में बहुत से खयाल आ रहे थे, दिमाग जीभ की नोक पर बैठा था।

वे बोले, ‘गरीबों में जरूर बांटना, मित्र। उन्हें नए-नए शब्दों की भूख हमेशा रहती है। मैं जानता हूं, एक स्वस्थ समाज में रोटी से ज्यादा बकलोल जल्दी गले उतरता है। ऐसे में रोटी देने से थोड़ा परहेज बरतना चाहिए। जबरन मुंह खोल कर बस मुट्ठी भर शब्द अंदर धकेल दो, उनका पेट भर जाएगा।’

मित्र मुस्कराए थे। एक बोला, ‘भगौना, गरीबों को छोड़ो, कम से कम हम लोगों को तो बन-मक्खन और समोसा खिला दो।’

‘हां, हां बिलकुल। तुम्हारे पेट की भूख भी मैं जानता हूं। जब तक मक्खन नहीं उड़ाओगे तब तक तुम्हें चैन नहीं आएगा। वैसे भी जो मेरी मित्रों वाली पुकार पर हाजिर होते हैं उनके लिए मेरा मक्खन, बन, समोसा परोसना लाजमी है।’
भगौना दास ने वेटर को बुलाया था और बड़ा-सा आर्डर दे दिया था। साथ में उसे आंख भी मार दी थी। पुराना चेला था, समझ गया आर्डर नहीं लाना है। बन-मक्खन के आने के लालच में मित्र बैठे रहेंगे और भगौना जी बकबक करते रहेंगे, भगौने पर भगौने भरते रहेंगे, जुबान-सुख पाते रहेंगे।

दादी का भगौना जवान होकर देग हो गया था। गहरा हो गया था। अजमेर शरीफ वाले देग की तरह, जिसमें से चावल निकालने के लिए सीढ़ी लगा कर खिदमतगार को अंदर उतरना पड़ता है। बातों की बिरयानी उसमें दिन-रात पक रही थी। दो बोटी पाने के चक्कर में लोग भगौने के इर्द-गिर्द मक्खियों की तरह भिनभिना रहे थे। भगौना दास नहीं रहा था, मालिक बन चुका था। उसकी करछुल जब भगौने में टनटनाती थी तो सारे स्कूल की भूख जग जाती थी। शब्द-व्यंजन उनको तर कर देते थे।

भगौने का भविष्य तय हो गया था। बेसुर बकबक का नशा परोसने की भट्टी उसकी जीभ में जन्मजात लगी हई थी। उसको भड़काते रहना था। उसके पास राजनीति का देवता बनने के लिए डेढ़ गज की जुबान थी, जो और सारे भगौनों को लबालब कर सकती थी।

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