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ज्ञानार्जन में गतिशीलता

आवश्यकता है कि हर अध्यापक इस सिद्धांत को अपने प्रशिक्षण काल में आत्मसात कर ले कि कोई भी किसी को सिखाता नहीं, सभी अपने को स्वयं सिखाते हैं। यह समझ आसान नहीं है, इसके लिए अध्यापक का यह जानना आवश्यक है कि वह स्वयं सीख रहा है, और लगातर सीख रहा है।

Educationपश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले के शांतिनिकेतन में विश्व-भारती विश्वविद्यालय के वार्षिक दीक्षांत समारोह के दौरान राज्यपाल जगदीप धनखड़ के साथ केंद्रीय शिक्षा मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक। (फोटो-पीटीआई)

जगमोहन सिंह राजपूत

वर्तमान पीढ़ी परिवर्तन की जिस तेजी में जी रही है वह अप्रत्याशित है। परिवर्तन हर तरफ है, लेकिन हर परिवर्तन प्रगति का द्योतक हो, आवश्यक नहीं। ज्ञान संपदा की वृद्धि, नए-नए कौशलों की निर्मिति तथा उपयोग प्रकृति ने केवल मनुष्य के हिस्से में आबंटित किए हैं। यह मनुष्य के ऊपर है कि वह उत्तराधिकार में मिली ज्ञान-कौशल संपदा को कितना आगे बढ़ाता है। उससे भी अधिक महत्त्वपूर्ण है कि वह उसका सदुपयोग करता है या दुरुपयोग। आगे के समय में वही देश वास्तविक प्रगति कर पाएंगे, जो ज्ञान का सम्यक उपयोग करने की क्षमता विकसित कर सकेंगे, वैश्विक भाई-चारे के मूल मंतव्य को समझ कर अपनी शिक्षा-व्यवस्था को गतिशील बनाए रख सकेंगे। मानव सभ्यता की विकास-प्रक्रिया में यह स्पष्ट हो गया है कि मनुष्य की प्रवृत्ति सदैव आगे बढ़ने की ही रहेगी, वह जितना भी आगे जाए, कभी संतुष्ट होकर नहीं रुकेगा। नया ज्ञान, नई खोज और उसके उपयोग से निकला हर परिवर्तन उसे और अधिक परिष्करण के लिए प्रोत्साहित करता रहा है।

परिणामस्वरूप परिवर्तन की गति लगातार बढ़ती रहेगी। समय के साथ मनुष्य की जिज्ञासा की प्रवृत्ति तथा अपने आसपास घटित हो रही सामाजिक, सांस्कृतिक और प्राकृतिक घटनाओं और क्रियाओं को समझने की उत्सुकता लगातार विस्तृत होती गई, जिसके लिए योजनबद्ध ढंग से संचित ज्ञान को नई पीढ़ी के लिए संजोने और उसमें वृद्धि करने की प्रेरणा देने की आवश्यकता का अनुभव हुआ। आज मनुष्य के पास जो ज्ञान-कौशल भंडार संचित हो गया है उसे खोजने, सजाने-संवारने में हजारों वर्ष और अनगिनत पीढ़ियों का अनथक परिश्रम- शारीरिक और बौद्धिक, चिंतन, मनन और अध्ययन लगा है, आज की पीढ़ी विरासत के रूप में उसका लाभ उठा रही है।

हर सभ्यता में ज्ञानार्जन की परंपरा उसके संयोजन, उपयोग और भावी पीढ़ी के लिए हस्तांतरण को ध्यान में रख कर विकसित हुई। भारत में गुरुकुल और आश्रम स्थापित हुए। प्रकृति के सान्निध्य में और मनुष्य-प्रकृति की पारस्परिकता का अवलोकन करते हुए अध्ययन-अध्यापन की विधा विकसित की गई। मनुष्य और प्रकृति के संबंधों की संवेदनशील पारस्परिकता को संवारने-संजोने और स्वस्थ बनाए रखने का दायित्व मानव का था। सभ्यता का विकास मनुष्य के लगातार बढ़ते ज्ञान-भंडार के समांतर ही चलता रहा है। ज्ञान प्राप्त करना आवश्यक है, लेकिन उसका समुचित उपयोग संभवत: उससे भी अधिक आवश्यक है।

ज्ञान का ‘आविष्कार’ कहीं भी हो, उसकी सार्वभौमिकता और विस्तार निर्विवाद है। गीता में श्रीकृष्ण ने समझाया था कि ज्ञान से पवित्र कुछ भी नहीं है। स्वामी विवेकानंद ने कहा कि ‘मनुष्य की अंतर्निहित पूर्णता की अभिव्यक्ति ही शिक्षा है। वे यही प्रेरणा दे रहे थे कि मनुष्य के विकास की प्रक्रिया आगे भी चलती रहेगी, मनुष्य के सीखने और ज्ञान के विराट सागर से रत्न निकालने की कोई सीमा नहीं है। नवीन ज्ञान की खोज, उसके मानव कल्याण में संभावित सदुपयोग की समझ मनुष्य को असीमित आत्म-तुष्टि और आनंद प्रदान करती है। आज ‘लाइफलांग लर्निंग’ की आवश्यकता सारे विश्व में स्वीकार्य है, और यह भी माना जाता है कि प्रारंभ से विद्यार्थी ‘लर्निंग टू लर्न’- नया सीखने का कौशल अवश्य सीख ले।

उसे विस्तार देकर ही वह ‘सर्वभूत हिते रत:’ को चरितार्थ करने को प्रयत्नशील हो सकेगा। जिज्ञासा और सर्जनात्मकता हर मनुष्य को जन्म से मिले हुए दो ऐसे वरदान हैं, जो उसे उसकी सामाजिकता, संस्कृति और सभ्यता के मार्ग पर आगे ले जाते हैं, मानव के ज्ञान भंडार में सतत वृद्धि करने में उत्प्रेरक बनते हैं। जो ज्ञानार्जन परंपराएं और व्यवस्थाएं प्रारंभ से ही बच्चों की जिज्ञासा और सर्जनात्मकता को विकसित करने में सहायता करती हैं, उनमें मनुष्य द्वारा प्रकृति के रहस्यों की खोज का परिमाण अन्य से अग्रणी रहता है।

स्वामी विवेकानंद के शब्दों में- ‘ज्ञान मनुष्य में स्वयं सिद्ध है; कोई भी ज्ञान बाहर से नहीं आता है; सब अंदर ही है। हम जो कहते हैं कि मनुष्य जानता है, यथार्थ में, मानस शास्त्रसंगत भाषा में हमें कहना चाहिए कि वह ‘आविष्कार’ करता है, ‘अनावृत’ या प्रकट करता है। आविष्कार का अर्थ है- मनुष्य की अपनी अनंत ज्ञानस्वरूप आत्मा के ऊपर से आवरण को हटा लेना। हम कहते हैं कि न्यूटन नें गुरुत्वाकर्षण का आविष्कार किया, तो क्या वह आविष्कार कहीं एक कोने में न्यूटन की राह देखते बैठा था? नहीं, वह उसके मन में ही था। जब समय आया, तो उसने उसे जान लिया या ढूंढ़ निकाला। संसार को जो कुछ ज्ञान प्राप्त हुआ है वह सब मन से निकला है।’ शिक्षा कुल मिला कर अज्ञान के अंधकार-आवरण को हटाने की विधा है।

भारत के शिक्षा दर्शन में यह सदा से दोहराया जाता रहा है कि प्रकृति के रहस्यों के उद्घाटन की जो बात कही जाती है, उसमें भी यह समझना आवश्यक है कि ज्ञान का असीम भंडार तथा उसे उजागर करने का कौशल मनुष्य के अंतरतम में ही पूरी तरह निहित है, मनुष्य की आत्मा से ही सारा ज्ञान आता है। ऐसे में ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि कोई किसी को कुछ भी सिखा नहीं सकता, बाहर के गुरु तो केवल सुझाव या प्रेरण देने वाले कारण मात्र हैं। गुरु मार्ग दिखाता है, शिष्य को उस पर चलने के लिए प्रेरित करता है, आवश्यकता पड़ने पर साथ-साथ चलता है, साथ-साथ खोजता, आविष्कार करता, नए ज्ञान का सृजन करता है।

गुरु का महत्त्व सदा बना रहा है, आगे भी अध्यापक का महत्त्व कम नहीं होगा, भले संचार तकनीकी के प्रभाव से सीखने वाले को आवश्यकता से अधिक अध्ययन सामग्री तथा अनेक प्रश्नों के उत्तर यंत्रों से सुलभ हो जाएं। आवश्यकता है कि हर अध्यापक इस सिद्धांत को अपने प्रशिक्षण काल में आत्मसात कर ले कि कोई भी किसी को सिखाता नहीं, सभी अपने को स्वयं सिखाते हैं। यह समझ आसान नहीं है, इसके लिए अध्यापक का यह जानना आवश्यक है कि वह स्वयं सीख रहा है, और लगातर सीख रहा है। अपने विद्यार्थियों के लिए वह एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण उद्दीपक है, प्रेरणा स्रोत है, सहयोगी है।

मूर्धन्य विचारक स्वामी रंगनाथनंदजी ने कहा था कि अध्यापक एक मासूम बालक या व्यक्ति को व्यक्तित्व में बदल देता है। एक चरित्रवान मनुष्य अपना जीवन सार्थक करता है, परिवार समाज और समुदाय के लिए संबल बनता है, परहित, सेवाभाव और मानवीय मूल्यों तथा सिद्धांतों के प्रति पूर्णरूपेण समर्पित होता है। चरित्रवान व्यक्ति में अंतर्निहित ‘पूर्णत्व’ के प्रगटीकरण की अपार संभावनाएं सामने आती हैं। ऐसे व्यक्ति का अनुसरण पीढ़ियां करने लगती हैं। साम्राज्यवादी शक्तियों ने सुनियोजित ढंग से परतंत्र राष्ट्रों की शिक्षा-व्यवस्था, विरासत, संस्कृति, मूल्यों और परंपराओं से दूर करने का हर संभव प्रयास किया।

आरोपित भाषा, संस्कृति तथा वैचारिकता थोपने का अनथक प्रयत्न किया। किसी भी देश को नियंत्रण में रखने का रास्ता वहां के लोगों के आत्मसम्मान को नष्ट करना ही इस नीति का आधार था। बीसवीं शताब्दी ने यह भी देखा कि भारत जैसे देश की सशक्त संस्कृति को बाहरी दबाव या प्रभाव से समाप्त नहीं किया जा सकता। अगर ज्ञान संवर्धन और नई पीढ़ी के लिए उसके हस्तांतरण की परंपरागत व्यवस्था की गतिशीलता बनाए रखी जाए, यानी शिक्षा-व्यवस्था सशक्त तथा समयानुकूल बनी रहे, तो राष्ट्र, समाज और संस्कृति सदा अग्रसर होते रहेंगे। इसके लिए आवश्यक है कि प्रारंभ से ही शिक्षा-व्यवस्था बच्चों को उनकी संस्कृति और मानवीय मूल्यों से जोड़े, साहित्य और सदाचरण से जोड़े और इन सबके प्रति बच्चों के दायित्वबोध को लगातार उत्प्रेरित करती रहे।

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