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झूठ का तिलिस्म

देखिए, सच क्या है और झूठ क्या, इस पर चर्चा करने से कोई लाभ नहीं है। वैसे, सब कुछ झूठ ही तो है- माया है, भ्रम है। सौ फीसद सच बोल कर माया को भेदने की जरूरत क्या है?

jansatta aricaleाच क्या है और झूठ क्या, इस पर चर्चा करने से कोई लाभ नहीं है। वैसे, सब कुछ झूठ ही तो है- माया है, भ्रम है। सौ फीसद सच बोल कर माया को भेदने की जरूरत क्या है?

मैं झूठ नहीं बोल पाता हूं। मन तो बहुत करता है, मौके भी कई आते हैं, बोलने की भी कई बार कोशिश की है, पर बोल नहीं पाया हूं। अगर बोला है तो हर मर्तबा पकड़ा गया हूं। पता नहीं मुझमें क्या कमी है कि मुंह से जैसे ही झूठ निकलता है, सामने वाला उसे पहचान कर तुरंत जता देता है कि भई, तुम सत्य मार्ग से उतर कर असत्य की कीचड़ में खेल रहे हो। ऊपर वाले की रहमत मानूं या अपनी बदनसीबी कि झूठ बोलते ही मेरा चेहरा कीचड़ हो जाता है। मुझे अपनी शक्ल पर गंदगी पसंद नहीं है, इसलिए झूठ न बोलने का मैंने प्रण कर लिया है।

मेरे एक मित्र कहते हैं कि वे भी झूठ नहीं बोलते हैं। झूठ बोलना पाप है, मैं पाप का भागीदार नहीं बनता हूं, वे कहते हंै। हां, अगर कभी जरूरत पड़ती है तो गोली दे देता हूं। गोली देना झूठ बोलना नहीं है। झूठ बोलना दार्शनिक अपराध है, धार्मिक पाप है, जबकि गोली देना सहज व्यावहारिक क्रिया है। जैसे, अगर मैं घर बैठा हूं और आपका फोन आ जाए और मेरा आपसे से मिलने या बात करने का मन नहीं है, तो ऐसी स्थिति में मैं सच कह नहीं सकता हूं। आप बुरा मान जाएंगे।

मैं आपको गोली दे देता हूं- कहता हूं, बात करने का मन तो बहुत है, पर मैं अभी व्यस्त हूं। वैसे अगर आप देखें तो मैंने अनकहे रूप में सच बोला है, पर थोड़ा लपेट कर। बहाना बनाना झूठ नहीं है। यह एक गोली है। ठीक वैसी जैसी दर्द कम करने के लिए डॉक्टर गोली देता है। बहाना ऐसी गोली है, जो सच सुनने के दर्द को दबा देती है।

देखिए, सच क्या है और झूठ क्या, इस पर चर्चा करने से कोई लाभ नहीं है। वैसे, सब कुछ झूठ ही तो है- माया है, भ्रम है। सौ फीसद सच बोल कर माया को भेदने की जरूरत क्या है? विशेषकर जब मीठी गोली देकर दुनिया सुचारु रूप से चल रही हो। बड़ी मजबूरी का क्षण वह होता है, जब झूठ में सच का थोड़ा-सा छौंक लगाना पड़ जाता है। पर ऐसे मौके जिंदगी में दो-चार बार ही आते हैं। उनको हम झेल लेते हैं। बाकी वक्त तो गोली ही एकमात्र उपचार है; जीवन का सच है।

हां, उन्होंने आगे कहा, याद आया कि हमारे आदि विद्वान कह गए हैं कि अप्रिय सच से प्रिय झूठ अच्छा होता है। मैं अनवरत बहती अपनी प्राचीन संस्कृति के प्रवाह का हिस्सा हूं। मैं अपनी पुरानी रिवायतें निभा रहा हूं।
अप्रिय सच वाली बात एक संदर्भ में कही गई थी… मैंने टोका। कही तो गई थी न? उन्होंने तपाक से कहा, वे कह कर चले गए। हमको उसको संदर्भ देने से कोई रोक सकता है क्या? वैसे भी, हम बात पर जाते हैं। संदर्भ आप जैसे बुद्धिजीवी तलाशते हैं। भाई साहब, अगर आप इतने ही सच्चे हैं, तो जब पत्नी पूछे कि मैं सुंदर दिख रही हूं, तो न कह कर दिखाइएगा।

मुझे उनकी बात पर हंसी आ गई। देखिए, आप खामखा हंस रहे हैं। हंसी का असल उपयोग तब है जब आपका झूठ पकड़ा जाए। अमूमन आप जैसे लोग पकड़े जाने पर खिसिया जाते हैं। आपको खिसियाना नहीं चाहिए, बल्कि जोर से ठहाका लगाना चाहिए। झूठ ठहाके के साथ घुल कर लतीफा बन जाता है। लतीफे सबको पसंद हैं। झूठ-सच पर विवेचना किसी को नहीं, क्योंकि हम लोग दूसरे का झूठ हंसी में उड़ा देते हैं, क्योंकि हम औरों से अपने झूठों के बारे में ऐसी ही अपेक्षा रखते हैं। झूठ बोल कर मुस्करा देने की अदा हरदिल अजीज है।

और अगर कोई आपकी बात पकड़ ही ले, तो उससे पिंड छुड़ाने का भी एक कारगर तरीका है। निहायत संजीदगी के कह दीजिए- जुमला था यार, अब जाने भी दो उसे। यह शब्द सुनते ही सामने वाला नतमस्तक हो जाता है, क्योंकि जुमले की श्रेणी वाला झूठ बहुत कम लोग बोल पाते हैं। उसके लिए बरसों गोली वाले झूठ का अभ्यास करना होता है। सिद्धहस्त गोलीबाज आगे चल कर जुमलेबाज बनता है। जुमलेबाज गुरु घंटाल होता है। सारे पेशेवर झूठे उसकी तहेदिल से इज्जत करते हैं।

उन्होंने मेरे कंधे पर सहानुभूति का हाथ रखा। मान्यवर, आपकी समस्या है कि झूठ बोलने पर जब आप पकड़े जाते हैं, तो आप शर्मसार हो जाते हैं। पर शर्म किस बात की? दुनिया में जब आप नंगे आए थे, तो मारे शर्म के लौट गए थे क्या? नहीं, न? तो अब क्यों शर्मा जी हो रहे हैं आप? अरे, बेशर्मी तो मानव जात की प्रकृति है। यह जो नैतिकता, सही और गलत का दुइ ठो पत्ता आप बांधे घूम रहे हैं, उसे आज फिर टटोल कर देखिए। निर्लज्ज लोकभाव ने उन्हें इतना ताका है कि वे झुलस कर पापड़ हो गए हैं। आप जहां जाते हैं, बस अपने पापड़ बिखरा आते हैं। जमाने की हवा में इनको उड़ा दीजिए।

बेशर्म हो जाइए। नंगे हो जाइए। नंगा क्या सच-झूठ पहनेगा और क्या निचोड़ेगा? नंगई यथार्थ है, उसे स्वीकारने में इतनी दिक्कत क्यों आ रही है आपको? बेबाकी से गोली दीजिए, जुमलेबाजी करिए, बिना हकलाए सफेद झूठ बोलिए, दो चेहरे और तीन जुबानें रखिए। यानी कि बड़ी बेतकल्लुफी से बेशर्मी बरतिए। नंगई का एक खास तिलिस्म है, जो किसी भी शख्सियत में जादू भर देता है। झूठ बोलिए, जादूगर बनिए। आपकी लंबी काली टोपी में एक खरगोश छिपा है। निकालिए उसे और अस्सी-नब्बे-पूरे सौ का झूठामूठा मंत्र मार कर वाहवाही लूटिए। भाई साहब, झूठ के गणतंत्र का झंडा फौरन से पेश्तर अपने हाथ में उठा लीजिए। भीड़ आपका बड़ी बेसब्री से इंतजार कर रही है।

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