अंग्रेजी दुर्ग में दस्तक

भारतीय भाषाओं में पढ़ने-पढ़ाने का अर्थ अंग्रेजी समेत किसी भी विदेशी भाषा का विरोध नहीं है। भाषा के रूप में हर विद्यार्थी को उन्हें पढ़ने की आजादी है, लेकिन जब माध्यम के रूप में उस पर लादी जाती है तो उससे पूरी शिक्षा व्यवस्था बर्बाद होती है।

Jansatta Story
क्षेत्रीय भाषाओ में इंजीनियरिंग की पढ़ाई होने से उच्च शिक्षा में विद्यार्थियों की संख्या बढ़ेगी।

महामारी के इस दौर में शिक्षा के क्षेत्र में अच्छी खबर यह है कि आने वाले सत्र में इंजीनियरिंग कॉलेजों में भारतीय भाषाओं में भी पढ़ने-पढ़ाने की सुविधा मिलेगी। पिछले साल एआईसीटीई ने आईआईटी और देश भर के इंजीनियरिंग कॉलेजों से अनुरोध किया था कि वे ऐसे कॉलेजों को चुनें, जो भारतीय भाषाओं में तकनीकी शिक्षा दे सकते हैं। अभी देश भर के चौदह कॉलेज इस सत्र में हिंदी, तेलुगू, तमिल, बांग्ला, मराठी भाषाओं में इंजीनियरिंग शुरू करने के लिए सामने आए हैं। उम्मीद की जा रही है कि जल्दी ही आठवीं अनुसूची की दूसरी भाषाओं में भी इंजीनियरिंग की पढ़ाई शुरू हो जाएगी। भारतीय शिक्षा व्यवस्था के लिए यह बहुत क्रांतिकारी कदम साबित होगा।

दौलत सिंह कोठारी आयोग ने 1964-66 में अपनी सिफारिश में कहा था कि ‘न केवल स्कूली शिक्षा, बल्कि उच्च शिक्षा भी अपनी भाषाओं में ही दी जानी चाहिए।’ संसद में इस पर विचार हुआ था और इसी की अगली कड़ी के रूप में सिविल सेवा परीक्षा में भी आठवीं अनुसूची में शामिल भारतीय भाषाओं में परीक्षा देने की शुरुआत वर्ष 1979 में हुई थी। इसके परिणाम बहुत सुखद रहे। भारतीय भाषाओं में देश की सर्वोच्च नौकरशाही में गरीब, दलित, आदिवासी चुने गए हैं, जो पहली पीढ़ी के शिक्षित हैं यानी जिनके मां-बाप पढ़े-लिखे नहीं थे। इस पृष्ठभूमि में इंजीनियरिंग शिक्षा में अपनी भाषाओं का प्रवेश और उम्मीद जगाता है। अगर इंजीनियरिंग की पढ़ाई अपनी भाषाओं में होगी, तो इनके लिए यूपीएससी या राज्य सेवाओं के द्वार भी खुलेंगे। अभी तक तो यह कह कर हाथ खड़े कर दिए जाते हैं कि जब इंजीनियरिंग, डॉक्टरी की पढ़ाई अपनी भाषाओं में हो ही नहीं रही, तो वे परीक्षाएं कैसे दे पाएंगे। निश्चित रूप से इसमें कुछ समय लगेगा, लेकिन अंग्रेजी के दुर्ग पर दस्तक हो गई है।

दरअसल, भारतीय लोकतंत्र में अंग्रेजी के आतंक ने लोकतंत्र को लगभग विफल कर दिया है। आजादी के वक्त शिक्षा व्यवस्था में ऐसा नहीं था। कोठारी आयोग के सदस्य सचिव रहे जेपी नायक ने 1980 में एक महत्त्वपूर्ण शोध किया था- ‘कोठारी आयोग और उसके बाद’। 1980 में वह पुस्तक प्रकाशित हुई थी। उसमें निष्कर्ष था कि आजादी के वक्त भले साक्षरता कम थी, लेकिन भारतीय भाषाओं में शिक्षा आज के मुकाबले कहीं ज्यादा थी। कहां तो कोठारी आयोग के बाद अपनी भाषाओं को और आगे बढ़ना चाहिए था, लेकिन जैसे-जैसे नौकरशाही और प्रशासनिक व्यवस्था में अंग्रेजी हावी होती गई, निजी स्कूल आगे बढ़ते गए, वैसे-वैसे अंग्रेजी का धंधा और तेज होता गया। यहां तक कि उदारीकरण ने सबसे ज्यादा नुकसान भारतीय भाषाओं का किया है। उदारीकरण ने यूरोप में तो अंग्रेजी को नहीं बढ़ाया और न चीन, सिंगापुर से लेकर दक्षिण पूर्व के दूसरे देशों में। अगर अंग्रेजी बड़ी है, तो ब्रिटिश उपनिवेश और भारत में सबसे आगे है। यह अचानक नहीं है दुनिया में अंग्रेजी में छपने वाली किताबों की संख्या सबसे ज्यादा भारत में है।

इसमें केंद्र सरकार की नीतियों का भी उतना ही योगदान रहा है। ज्ञान आयोग का उद्देश्य ज्ञान को बढ़ाना होना चाहिए था, लेकिन वह पूरी तरह अंग्रेजी को बढ़ाने में ही लगा रहा। उसके नीति नियंता सैम पित्रोदा तो यह तक कहते थे कि अंग्रेजी के बूते भारतीयों को विदेशों में लाखों रोजगार मिलेंगे। निश्चित रूप से शिक्षा पर इसका असर होना ही था। निजी स्कूल तो अंग्रेजी के बूते आगे बढ़ते ही रहे, सरकारी स्कूलों पर भी इसकी गाज गिरी है। रेलवे के अधीन लगभग चार सौ स्कूल हुआ करते थे और ज्यादातर भारतीय भाषाओं के साथ-साथ अंग्रेजी भाषा भी पढ़ाते थे। लेकिन धीरे-धीरे माध्यम भाषा की होड़ में वहां से बच्चे महंगे निजी स्कूलों की तरफ बढ़ते गए। नतीजा अस्सी फीसद रेलवे के स्कूल बंद हो गए हैं और शेष भी बंद होने के कगार पर हैं।

हर सरकारी कर्मचारी, जिसके पास थोड़े-बहुत पैसे हैं, वह अंग्रेजी स्कूलों में ही अपने बच्चों को भेजता है। पिछले वर्ष उत्तर प्रदेश सरकार ने पांच हजार स्कूलों में अंग्रेजी माध्यम शुरू करने का फैसला किया। ऐसा ही फैसला उत्तराखंड और राजस्थान सरकार ने भी किया। इसी कारण इन सभी राज्यों में हजारों सरकारी स्कूल बंद कर दिए गए हैं। दिल्ली के कारपोरेशन स्कूलों में भी पिछले वर्ष सौ स्कूलों में अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा देने की शुरुआत की गई। वे बच्चे, जो अपनी भाषा भी ठीक से नहीं जानते, उन पर विदेशी भाषा लाद देना मनोवैज्ञानिक रूप से इतना आतंक पैदा करता है कि वे स्कूल ही छोड़ देते हैं।

इसलिए पिछले कुछ वर्षों में भारतीय भाषाओं के लिए जो कदम उठाए गए हैं उनका स्वागत किया जाना चाहिए। मेडिकल प्रवेश परीक्षा जिसे ‘नीट’ कहते हैं, पहले केवल अंग्रेजी में होती थी, पिछले वर्ष वह आठ भाषाओं में शुरू हुई और इस वर्ष वह तेरह भाषाओं में होगी। आईआईटी आदि के लिए प्रवेश परीक्षाओं में भी भारतीय भाषाओं की शुरुआत हो गई है। दो वर्ष पहले केंद्र सरकार ने एक और घोषणा की थी- राष्ट्रीय भर्ती परीक्षा की। इसके अंतर्गत कर्मचारी चयन आयोग, रेल भर्ती बोर्ड और बैंक भर्ती बोर्ड तीनों को मिलाकर एक एजेंसी ही परीक्षा लेगी और शुरुआत के तौर पर इसमें बारह भाषाओं में परीक्षा कराने का फैसला किया गया है।

जाति और धर्म से कहीं ज्यादा समाज का विभाजन अंग्रेजी ने किया है। जो अंग्रेजी जानते हैं वे अमीर हैं, अच्छी फीस दे सकते हैं, दिल्ली के महंगे कॉलजों में पढ़ सकते हैं। कोचिंग संस्थानों में लाखों की फीस दे सकते हैं और इसी के बूते दो फीसद अंग्रेजी जानने वाले भारतीय प्रशासनिक सेवा के अट्ठानबे फीसद पदों को हथिया लेते हैं। दुनिया भर के शिक्षाविद यह कहते आए हैं कि बच्चों की रचनात्मकता उनकी अपनी भाषा में ही सामने आती है। बावजूद इसके जिस दिल्ली विश्वविद्यालय में सत्तर के दशक में लगभग बीस फीसद अपनी भाषाओं में स्नातकोत्तर पढ़ाई उपलब्ध थी, आज लगभग शून्य हो चुकी है। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में भी भारतीय भाषाओं को माध्यम नहीं रखा गया। जबकि मानविकी के विषय जैसे इतिहास, राजनीति विज्ञान, समाज विज्ञान, मनोविज्ञान, अर्थशास्त्र आदि की किताबें भारतीय भाषाओं में पर्याप्त उपलब्ध हैं और उतनी ही उत्कृष्ट भी। मगर पिछले तीस सालों में ये किताबें चलन से बाहर हो गई हैं।

तकनीकी विषयों में पढ़ाने की चुनौती तो बहुत बड़ी है, लेकिन असंभव नहीं है। साठ-सत्तर की उम्र तक पहुंचे लगभग सभी प्रोफेसरों की पढ़ाई बारहवीं तक अपनी भाषाओं में हुई है। केंद्र और राज्य सरकारों को तुरंत ऐसे विद्वानों को जोड़ने की जरूरत है, जिससे विद्यार्थियों को उत्कृष्ट सामग्री उपलब्ध हो। राजनीतिक विचारधारा इसमें आड़े नहीं आनी चाहिए। सरकार को संसाधन तो जुटाने होंगे ही शिक्षकों के शिक्षक प्रशिक्षण और उनकी मानसिकता को भी बदलने की जरूरत है। भारतीय भाषाओं में पढ़ने-पढ़ाने का अर्थ अंग्रेजी समेत किसी भी विदेशी भाषा का विरोध नहीं है। भाषा के रूप में हर विद्यार्थी को उन्हें पढ़ने की आजादी है, लेकिन जब माध्यम के रूप में उस पर लादी जाती है तो उससे पूरी शिक्षा व्यवस्था बर्बाद होती है। देश भर के दर्जनों इंजीनियरिंग कॉलेजों से आत्महत्या की खबरें आ चुकी हैं। पता नहीं देश के कर्णधार बुद्धिजीवियों की संवेदना भाषा के मसले पर कब जागेगी?

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