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संवाद में शोर

आज यह बहस का मुद्दा है कि मीडिया की खत्म होती साख को पत्रकार कैसे बचा सकते हैं। तरह-तरह के उपाय सुझाए जा रहे हैं। पर अगर समाज को वास्तव में उसकी साख को सुरक्षित करना है तो मीडिया के प्रथम हिस्सेदार यानी आम नागरिक को आगे आना होगा।

farmer movementकिसानों का आंदोलन। (फोटो- इंडियन एक्सप्रेस फाइल)

किसी भी देश के नागरिक लोकतांत्रिक प्रक्रिया द्वारा चुनी गई सरकार की आत्ममुग्धता के कायल नहीं हो सकते हैं। खासकर तब जब सरकार आईने के सामने खड़े हुए बिना अपने को निहार रही हो या अंधेरे बंद कमरे में बैठ कर अपने आकर्षण का बखान कर रही हो। आत्ममुग्धता से उपजा अहंकार स्वत: धारणा के बल पर जल्द ही सार्वजनिक धारणा को बेदखल कर देता है। उसके लिए अपने सुर के अलावा कोई और ध्वनि अर्थहीन हो जाती है। सरकारें अपने बोले को ही सुनती हैं, अपने कहे पर इतराती हैं। उसके लिए कहना करने से ज्यादा महत्त्वपूर्ण है। ऐसी स्थिति उत्पन्न होते ही लोकसत्ता स्वयंसत्ता में परिवर्तित हो जाती है। हां में हां मिलाने वाले सरकारी पिट्ठू की प्रतिध्वनि जनसंवाद का स्थान ले लेती है।

हर सरकार त्रुटिसंपन्न होती है, और प्रतिभा संपन्न भी। क्योंकि वह सत्ता में आई है, इसलिए उसमें प्रतिभा तो निहित होती ही है। वह पिछली सत्ता की कमियां उजागर करके मतदाताओं को अपनी खूबियों की ओर रिझा कर गद्दी पर आती है। उसको अच्छी तरह से मालूम है कि अगर उसकी कमियां लोकसंवाद का बड़ा हिस्सा बन गई तो वह मुश्किल में पड़ जाएगी। सूचना, विचार और विश्लेषण पर अंकुश रखने का सिलसिला यहीं से शुरू हो जाता है। सरकार सार्वजनिक संवाद की घेराबंदी करने के चक्कर में अपने ईको चैंबर में बंद हो जाती है।

ईको चैंबर को ध्वस्त करने में मीडिया की बड़ी भूमिका रही है। भारत के गणतंत्र होने के बाद से ही मीडिया मुस्तैदी से लोकतांत्रिक मूल्यों का प्रहरी रहा है। साथ में जब-जब इन मूल्यों पर हमला हुआ है, तो उसने इनकी जोरदार पैरवी भी की है। कुछ सालों में मीडिया पर्यावरण में तेजी से परिवर्तन आया है। स्वतंत्र सोच, लेखन और संवाद किनारे लग गया है। बड़े मीडिया घराने अपने हिसाब से समाचार संकलन और प्रसारण करने लगे हैं। इससे मीडिया की साख लगभग खत्म हो गई है।

मीडिया के अवमूल्यन होने के बावजूद पत्रकार अपनी निर्भीक भूमिका आज भी निभा रहे हैं, जबकि अपनी बात कहने के लिए उनके मंच उखाड़ लिए गए हैं। वैसे भी एक स्तंभ दूसरे के सहारे मजबूत होता है। पार्लियामेंट्री डेमोक्रेसी तब मजबूत होती है जब उसके पास सक्षम कार्यपालिका और न्याय व्यवस्था हो, जो आम लोगों के पक्ष में खड़ी हो। प्रेस की भूमिका इन तीन स्तंभों पर टिकी है। यह इसके बेहद महत्त्वपूर्ण स्टेकहोल्डर, हिस्सेदार हैं।
हर सरकार अपनी प्रतिध्वनि अखबारों, न्यूज चैनेलों, सोशल और डिजिटल मीडिया पर सुनना चाहती है। पर यह ध्वनि शोर में परिवर्तित न हो जाए, इसकी लक्ष्मण रेखा संसद खींचने में सक्षम है। बड़ा बहुमत आ जाने से उसकी कार्यकुशलता कुछ कम जरूर हो जाती है, पर अगर सांसद अपने दायित्व निभाते हैं तो प्रेस पर अंकुश लगाना टेढ़ी खीर हो जाता है। इसी तरह कार्यपालिका और न्यायपालिका अपना संवैधानिक कर्तव्य निभाते रहते हैं तो उससे प्रेस को विशेष बल मिलता है।

पर अगर ये तीनों व्यवस्थाएं किन्ही कारणों से अपना दायित्व नहीं निभाती हैं और अपनी अक्षमता का ठीकरा प्रेस पर फोड़ती हैं, तो उनका यह कृत्य ठीक नहीं है। प्रेस लचर व्यस्थाओं के चलते मजबूर हो जाती है। उसकी जवाबदेही तभी तक है जब तक दूसरी संस्थाओं के समकक्ष जवाबदेही चलन में है। दूसरे शब्दों में, स्वस्थ पत्रकारिता की स्टेकहोल्डर ये तीनों व्यवस्थाएं है- शायद उतनी ही जितनी मीडिया की सहभागिता उनमें है। फर्क सिर्फ इतना है कि मीडिया स्वत: रिपोर्ट करने के आलावा कुछ और नहीं कर सकता है, जबकि संसद, कोर्ट और बाबूशाही मुद्दों पर अपने कार्य आदेशित कर सकते हैं।

पर सबसे बड़ी भूमिका आम लोगों की है। लोकतंत्र में सब कुछ उनकी वजह से है और उनके लिए है। लोकतांत्रिक सत्ता व्यक्ति या पार्टी सत्ता नहीं है, बल्कि जनसत्ता है। लोग क्या चाहते हैं और क्या नहीं चाहते, इसकी सरकार और नागरिकों के बीच मध्यस्थता हाल तक प्रेस करता आया है, जिसमें पत्रकार की अहम भूमिका थी।
सोशल और डिजिटल प्लेटफॉर्मों के आने से मध्यस्थता का लोकतंत्रीकरण हुआ है। आम आदमी को अपनी मांग और राय रखने के लिए विभिन्न प्रकार के मंच उपलब्ध हो गए हैं। मुद्दों पर वर्चुअल मतगणना अब हर रोज हो रही है। वैसे सोशल मीडिया की वजह से पत्रकार को भी फायदा हुआ है। वह इस मीडिया के जरिए व्यापक आॅडियंस तक पहुंच गया है। इसलिए सरकार अपने संसाधनों के बल पर सोशल मीडिया पर भी अपना ईको चैंबर बना रही है। संवाद में शोर घोल रही है।

मीडिया का सबसे बड़ा और प्रभावशाली हिस्सेदार आम आदमी है। पूंजीपति राजनीतिक गुट के साथ मिल कर कुछ समय के लिए जनमानस को भरमा तो सकता है, पर उस पर स्थायी रूप से काबिज नहीं हो सकता है। पूर्ण मीडिया नियंत्रण का मतलब तानाशाही है। आधुनिक व्यवस्था में तानाशाही चल नहीं सकती है, क्योंकि दमन की राजनीति की अल्पकाल में कुंभला जाने की प्रवृत्ति है। प्रेस पर अस्वाभाविक नियंत्रण पर अंकुश सिर्फ आम आदमी ही लगा सकता है।

आज यह बहस का मुद्दा है कि मीडिया की खत्म होती साख को पत्रकार कैसे बचा सकते हैं। तरह-तरह के उपाय सुझाए जा रहे हैं। पर अगर समाज को वास्तव में उसकी साख को सुरक्षित करना है तो मीडिया के प्रथम हिस्सेदार यानी आम नागरिक को आगे आना होगा। पत्रकार पत्रिकारिता को नहीं बचा सकते हैं और न ही राजनीतिक समूह। सरकार से अपेक्षा करना बेमतलब है। प्रेस की स्वतंत्रता और उसका तेवर कैसे हों यह आम लोग क्या पढ़ते हैं, क्या देखते हैं और क्या सुनते हैं के जरिए निर्धारित होता है। पाठक की पसंद सर्वप्रथम पत्रकारिता के मानकों का निर्धारण करती है और तदुपरांत उसका प्रसार। वास्तव में पत्रकारिता उतनी ही बड़ी और सक्षम है जितना बड़ा और विचारवान उसका आडियंस है।

पत्रकारिता आम लोगों के लिए और आम लोगों के जरिए होती है। पत्रकारिता से जब लोग गुम करा दिए जाते हैं और उसमें राजसत्ता प्रकट हो जाती है तो वह पत्रकारिता के आलावा कुछ और हो जाती है। पत्रकार इस प्रकार लुप्त हुए लोगों को स्वयं वापस नहीं ला सकते हैं, क्योंकि पत्रकारिता का तंत्र पत्रकारों के वश में नहीं है। प्रथम हिस्सेदार को आगे आना होगा और बिगड़ती साख को अपनी पसंद के निवेश से उभारना होगा। सरकारी आत्ममुग्धता से उसका फोकस जनमुग्धता पर लाना होगा।

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